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पौराणिक फिल्मों पर लगा हजारों करोड़ का दांव, सिनेमा की तकदीर बदलेगा 'सनातन' का नया फॉर्मूला

By Smita SrivastavaEdited By: Ashish Rajendra
Published: Fri, 30 Oct 2026 12:40 PM (IST)

रामायणम् के बाद आने वाले समय में भी बड़ी लागत के साथ कई माइथोलॉजिकल फिल्मों को बनाया जाएगा और रिलीज किया जाएगा।

अपकमिंग माइथोलजॉकिल मूवीज (फोटो क्रेडिट- एक्स)

अपकमिंग माइथोलजॉकिल मूवीज (फोटो क्रेडिट- एक्स)

HighLights

  1. सिनेमा में दिखेंगी सनातन धर्म की कहानियां

  2. मोटे बजट में बन रही हैं पौराणिक फिल्में

  3. रामायणम् से होगी नए सिनेमा की शुरुआत

स्मिता श्रीवास्‍तव, मुंबई: हाल के वर्षों में मूल रुप से कन्नड़ में बनी ऋषभ शेट्टी अभिनीत फिल्म कांतारा की सफलता ने साबित किया कि स्थानीय लोककथाओं, परंपराओं और आस्था से जुड़ी कहानियां भी देशभर के दर्शकों को आकर्षित कर सकती हैं।

अब रामायणम् (Ramayana), वाराणसी (Varanasi), जय हनुमान (Jai Hanuman), नाम ब्रह्मास्त्र पार्ट 2: देव और महावतार जैसी बड़े बजट की फिल्मों के जरिए मेकर्स पौराणिक कथाओं को बड़े पर्दे पर भव्य रूप में पेश करने की तैयारी में हैं।

पौराणिक फिल्मों पर ट्रेड एनालिस्ट की सोच

पौराणिक कहानियों पर आधारित फिल्मों को बड़े बजट में बनाने के जोखिम पर ट्रेड एनालिस्‍ट अतुल मोहन कहते हैं कि हर तरह की फिल्म में जोखिम होता है। फिल्म अच्छी बनेगी तो कमाई होगी और अच्छी नहीं बनी तो नुकसान उठाना पड़ेगा। निर्माता भी समझ रहे हैं कि दर्शक बॉलीवुड के पुराने फार्मूले से ऊब रहे हैं।

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RAMAYANA (6)

ऐसे में उन्हें पौराणिक कहानियों के रूप में एक नया फार्मूला नजर आ रहा है। हर कोई जल्द से जल्द इस तरह की फिल्म बनाने और अपनी घोषणा को बड़ा दिखाने में जुटा है। वहीं ट्रेड एनालिस्ट तरण आदर्श का मानना है कि पौराणिक फिल्मों पर बड़ा दांव लगाने के पीछे वैश्विक बाजार में भारतीय सिनेमा की बढ़ती पहुंच एक अहम वजह है।

वह कहते हैं, ‘कोई निर्माता बड़े पैमाने पर फिल्म बनाना चाहता है, तो उसे रोका नहीं जा सकता। भारतीय सिनेमा को वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बनाने के लिए बड़े स्तर पर सोचने और कोशिश करने की जरूरत है। फिल्म का बजट कितना होगा, यह उसकी कहानी की मांग पर निर्भर करता है।

RAMAYANA (7)

उसी के हिसाब से निर्माता और निर्देशक तय करते हैं कि फिल्म को किस पैमाने पर बनाया जाए। फिल्ममेकर्स जानते हैं कि कमाई के नए रास्ते खुल रहे हैं। हाल की बात करें तो धुरंधर और पुष्पा जैसी फिल्मों ने उन बाजारों में भी कारोबार की संभावनाएं बढ़ाई हैं, जहां पहले भारतीय फिल्मों की पहुंच सीमित थी। रामायणम् भी ऐसे अंतरराष्ट्रीय बाजारों में रिलीज होगी, जहां शायद पहले हिंदी फिल्में नहीं पहुंची हैं। अगर हमें आगे बढ़ना है, तो जोखिम लेना ही होगा।

रिस्क नहीं लेंगे तब तक आगे कैसे बढ़ेंगे?

पौराणिक फिल्मों का यह दौर भारतीय सिनेमा के विस्तार के लिहाज से अच्छी बात है। जब तक हम एक रिस्क नहीं लेंगे तब तक आगे कैसे बढ़ेंगे? रामायणम् से शुरुआत हो रही हो, उसके बाद कई और फिल्में आएंगी और ये बहुत अच्छी निशानी है क्योंकि हमें कहीं न कहीं ग्रो होना चाहिए। एक दायरे में रहकर हम अपनी सोच बड़ा नहीं करते हैं। ‘फिल्मों के बढ़ते बजट पर पूर्ण पुरुषोत्तम कृष्णावतारम् : पार्ट 1 द हार्ट (हृदयम्) फिल्‍म के निर्देशक हार्दिक गज्जर कहते हैं-

MOVIE

सबसे पहले यह समझने की जरूरत है कि फिल्में इतनी महंगी क्यों दिखाई देती हैं। मुझे व्यक्तिगत तौर पर लगता है कि फिल्म निर्माण की वास्तविक लागत उतनी ज्यादा नहीं है, जितनी बताई जाती है। कलाकारों की फीस और दूसरे खर्चों में काफी अंतर होता है। फिल्म निर्माण की लागत के अलावा मार्केटिंग, प्रमोशन और अन्य खर्च भी कुल बजट को बढ़ाते हैं। इसलिए फिल्म की वास्तविक निर्माण लागत और उसके कुल बजट को अलग-अलग समझना जरूरी है। 

4000 करोड़ की रामायणम्

नए कलाकारों के साथ इस तरह के विषय को कम बजट में बनाया जा सकता है, और तब फिल्म के सफल होने की उम्मीद और उसकी विश्वसनीयता, दोनों कहीं ज्यादा होती हैं। साथ ही, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और नई तकनीक की मदद से अब फिल्म निर्माण की लागत को अधिक कुशलता से नियंत्रित करना भी संभव हुआ है। दो पार्ट में बन रही रामायणम् का चार हजार करोड़ रुपये का बजट काफी चर्चा में रहा है।

RAMAYANA (2)

हालांकि फिल्‍म के निर्माता और अभिनेता यश ने स्‍पष्‍ट किया कि यह एक गलतफहमी है।चार हजार करोड़ रुपये का बजट दोनों फिल्मों का संयुक्त बजट है। इसमें फिल्म की रिलीज और प्रमोशन का खर्च भी शामिल है। हॉलीवुड में भी इसी तरह बजट की गणना की जाती है। निर्माता नमित मल्होत्रा ने सभी खर्चों को जोड़कर यह आंकड़ा बताया है। 

वहां फिल्म के निर्माण पर खर्च होने वाली रकम के बराबर, और कभी-कभी उससे भी ज्यादा पैसा प्रमोशन पर खर्च किया जाता है, क्योंकि फिल्म को वैश्विक स्तर पर रिलीज किया जाना होता है, लेकिन उससे होने वाली कमाई भी वैश्विक होती है। हालांकि बड़ा बजट होने पर दर्शकों की अपेक्षाएं भी बढ़ जाती है।

रामायणम् को लेकर नमित की सोच

नमित मल्‍होत्रा का कहना है कि मेरे लिए दर्शकों की सराहना और बॉक्स ऑफिस की सफलता एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। मैं ऐसा नहीं मानता कि दर्शक किसी फिल्म को दिल से पसंद करें, उसकी सराहना करें और फिर उसका असर बाक्स आफिस पर दिखाई न दे। इसलिए हमारा लक्ष्य सिर्फ बाक्स आफिस पर कमाई करना नहीं, बल्कि सबसे पहले दर्शकों की स्वीकार्यता और उनका विश्वास हासिल करना है।

कुल मिलाकर पौराणिक फिल्मों की सफलता का दारोमदार सिर्फ उनकी भव्यता और भारी-भरकम बजट पर नहीं, बल्कि कहानी कहने के अंदाज और दर्शकों से जुड़ाव से होता है। इसमें दोराय नहीं कि आस्था इन फिल्मों के लिए दर्शक जुटा सकती है, लेकिन लंबे समय तक उनकी स्वीकार्यता बनाए रखने के लिए कंटेंट का दमदार होना जरूरी है।

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