'लोग कश्मीर की दो-तीन कहानी...', एमी नॉमिनेशन पर मानव कौल ने जताई खुशी; Tribhuvan Mishra 2 के सवाल पर हुए दुखी
मानव कौल ने वेब सीरीज 'रियल कश्मीर फुटबॉल क्लब' के एमी अवॉर्ड्स में नॉमिनेशन पर खुशी जताई। उन्होंने भारतीय कंटेंट ...और पढ़ें
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मानव कौल से खास बातचीत/फोटो-इंस्टाग्राम
HighLights
'रियल कश्मीर फुटबॉल क्लब' एमी अवॉर्ड्स के लिए नॉमिनेट
मानव कौल भारतीय कंटेंट की वैश्विक पहचान से बहुत खुश
कश्मीर की अनकही कहानियों और 'त्रिभुवन मिश्रा 2' पर चर्चा
दीपेश पांडेय, मुंबई। पिछले साल प्रदर्शित वेब सीरीज रियल कश्मीर फुटबॉल क्लब इस साल टीवी की दुनिया में सबसे प्रतिष्ठित माने जाने वाले एमी अवॉर्ड्स में सर्वश्रेष्ठ अंतरराष्ट्रीय ड्रामा सीरीज के वर्ग में नामित की गई है। कश्मीर के एक वास्तविक फुटबॉल क्लब पर आधारित सीरीज में अभिनेता मानव कौल ने शिरीष खेमू की भूमिका निभाई है। अभिनय के साथ लेखन और निर्देशन में भी सक्रिय मानव से उनके शो, सिनेमा और आगामी प्रोजेक्ट पर बातचीत।
एमी पुरस्कारों के लिए नामित होने को कितनी बड़ी उपलब्धि के तौर पर देखते हैं?
जब किसी भारतीय शो को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इतनी बड़ी पहचान और सम्मान मिलता है तो नए फिल्मकारों में आत्मविश्वास बहुत ज्यादा बढ़ जाता है। जो निर्माता-निर्देशक नया और अलग कंटेंट बनाना चाहते हैं, उनको इससे बहुत ज्यादा हिम्मत मिलती है। एमी अवॉर्ड्स के लिए दुनिया भर से हजारों शो आते हैं। उसमें से सिर्फ चार शो चुनकर नामित किए जाते हैं। जो अपने आप में बहुत बड़ी उपलब्धि है।

पिछले कुछ समय में अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बढ़ रही भारतीय वेब सीरीज और फिल्मों की पहुंच का क्या कारण मानते हैं?
पिछले कुछ वर्षों में दुनिया भर में लोगों की वैश्विक कंटेंट के प्रति पहुंच काफी बढ़ी है। अब दुनिया भर का हर शो, हर फिल्म दर्शकों के सामने होता है। हमारी डॉक्यूमेंट्रीज तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अक्सर सराही जाती रही हैं, लेकिन हम फिक्शनल (काल्पनिक) प्रोजेक्ट उतना अच्छा नहीं बना पाते थे। अब हमारे फिक्शनल प्रोजेक्ट्स की भी वैश्विक मंचों पर पहुंच काफी बढ़ती दिख रही है, ये बहुत अच्छा बदलाव है। इसके अलावा अब नए फिल्मकार पूरी दुनिया का कंटेंट देख रहे हैं, तो वो भी उसी स्तर का बनाने का प्रयास करते हैं।
कश्मीर तो आपका पैतृक स्थान रहा है। वहां से जुड़ी और किसी तरह की कहानियां आप सिनेमा में दिखाना चाहेंगे?
कश्मीर पर बहुत सारी किताबें लिखी गई हैं और वहां बहुत सारी कहानियां भी हैं। कश्मीर से जुड़ी हर तरह की कहानियां कही जानी चाहिए। कश्मीर को लेकर हम अक्सर घूम फिरकर वही एक दो कहानियां ही कह रहे होते हैं। जबकि, मुझे लगता है कि कश्मीर में बहुत ज्यादा अनकही कहानियां हैं। जो कश्मीर को जैसे देखना चाहेगा, जिस तरह की कहानी कहना चाहेगा, उसके लिए अलग-अलग कहानियां हैं।
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अभिनय के साथ लेखन और निर्देशन भी करते हैं। क्या कभी सेट पर कोई एक दूसरे पर हावी होते हुए दिखा?
ऐसा नहीं हैं। इस शो के सेट पर तो हम लोग एक दूसरे के साथ मिलकर, एक दूसरे के सहयोग और सुझाव से काम कर रहे थे। मैं सुझाव देता हूं, लेकिन ऐसा सुझाव नहीं कि आपका काम खराब है और मेरा सुझाव अच्छा। हर सेट पर निर्देशक और लेखक का ही अंतिम निर्णय होता है, जो वो कहेंगे वही किया जाता है।
फिल्म तथागत के बाद कोई दूसरी फिल्म या वेब सीरीज नहीं निर्देशित की?
हाल ही में मैंने एक फिल्म का निर्देशन किया है। इसके अलावा मैं अपनी उपन्यास लिखने में खुद बहुत ज्यादा व्यस्त था। वो जल्द ही आपके सामने आएगा। इस फिल्म में निर्देशन के साथ मैंने अभिनय भी किया है।
अभिनय के साथ निर्देशित करते समय क्या स्वयं के लिए कट या रीटेक बोलना आसान होता है?
इस फिल्म में हमारी मुख्य असिस्टेंट डायरेक्टर मानसी पारेख थी। जब मैं अभिनय करता था, तो निर्देशन की जिम्मेदारी वही संभालती थी और वही सीन के हिसाब से कट और रीटेक का निर्णय लेती थी। जब मैं अभिनय करता था तो मुख्य असिस्टेंट डायरेक्टर ही डायरेक्टर बन जाता था।

आपकी वेब सीरीज त्रिभुवन मिश्रा सीए टॉपर काफी पसंद की गई थी? उसके दूसरे सीजन का क्या अपडेट है?
यह सवाल तो नेटफ्लिक्स के अधिकारियों से पूछा जाना चाहिए। मुझे इस शो के दूसरे सीजन को लेकर इतने सवाल आते हैं कि पूछिए मत। मैं तो दुखी हो गया हूं कि मेरे पास इसका कोई आधिकारिक जवाब नहीं है। इस मामले में तो निर्माता भी कुछ नहीं कर सकते हैं, सारे निर्णय नेटफ्लिक्स के हाथों में है। अगर उनकी तरफ से हरी झंडी मिलती है, तो हम दूसरा सीजन बनाना शुरू कर देंगे।
बदलते सिनेमा के इस दौर में स्वयं को समय के अनुसार बतौर अभिनेता और निर्देशक आपडेट रखने की क्या प्रक्रिया होती है?
मेरी ऐसी कोई प्रक्रिया नहीं होती है। मैं बस अच्छा जीना चाहता हूं। मैं सिर्फ एक ही काम नहीं करता हूं तो जीवन में करने के लिए बहुत सारी और भी चीजें हैं। सिर्फ अभिनेता के तौर पर बहुत ज्यादा काम नहीं करना चाहता हूं, थोड़े में ही खुश हो जाता हूं। मैं साल या दो साल एक काम करता हूं। इस बीच जो चीजें अच्छी लगती हैं, वो देखता हूं। जो किताबें अच्छी लगती हैं, उन्हें पढ़ता हूं। बाकी प्राथमिकताएं यही होती हैं कि अगर अच्छी स्क्रिप्ट आई तो करता हूं, नहीं मिलती तो मैं थिएटर तो करता ही रहता हूं। इसके साथ ही लिखता और घूमता हूं।
