Exclusive: जागरण फिल्म फेस्टिवल में Amole Gupte ने बांधा समां, सिनेमा की बारीकियों और बदलते दौर पर की खुलकर बात
जागरण फिल्म फेस्टिवल मुंबई के दूसरे दिन मशहूर अभिनेता और फिल्ममेकर अमोल गुप्ते ने शिरकत की।
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फिल्ममेकर और एक्टर अमोल गुप्ते (फोटो क्रेडिट- जागरण)
HighLights
फेमस एक्टर और डायरेक्टर अमोल गुप्ते
जागरण फिल्म फेस्टिवल मुंबई में की शिरकत
इन फिल्मों के लिए मशहूर हैं अमोल गुप्ते
एंटरटेनमेंट डेस्क, नई दिल्ली। सिनेमा की दुनिया से चर्चित फिल्म समारोह जागरण फिल्म फेस्टिवल का आगाज मुंबई में हो गया है। जेएफएफ (JFF 2026) के दूसरे दिन मशहूर फिल्ममेकर अमोल गुप्ते (Amole Gupte) ने शिरकत की और कई अहम पहलुओं पर चर्चा की।
जागरण फिल्म फेस्टिवल में शामिल होने पर अमोल गुप्ते की राय
निर्देशक अमोल गुप्ते से जागरण फिल्म फेस्टिवल में शामिल होने और सेशन के अनुभव के बारे में सवाल पूछा गया तो उन्होंने बताया- कमाल का सेशन उन्होंने नहीं, बल्कि बच्चों ने किया है, जिनके बुलावे पर वह वहां आए हैं। उन्होंने कहा कि वे बच्चे उनसे बहुत बड़े हैं, क्योंकि जिस खुले दिल से वे अपने आपको दुनिया के सामने जाहिर करते हैं, वह काबिल-ए-तारीफ है। दुनिया अगर उन्हें समझ नहीं पाती, तो इसमें उनकी क्या गलती है।
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उन्होंने कहा कि जब भी उन्हें ऐसे बच्चों के साथ जुड़ने का मौका मिलता है, वे जरूर जुड़ते हैं। जब वे चालीस से पैंतालीस बच्चों को एक साथ गाते, नाचते और खुशी से अपनी प्रतिभा दिखाते देखते हैं, तो उनके मन में सवाल उठता है कि आखिर लोग इतने अंधे क्यों हैं और इन बच्चों को उनकी क्षमताओं के बावजूद डिसेबल क्यों समझते हैं, जबकि उनकी एबिलिटी हमसे कई गुना ज्यादा हो सकती है।
मास एंटरटेनर फिल्मों की मांग बढ़ गई है?
इस सवाल पर अमोल गुप्ते ने कहा- यह बात सही है, लेकिन लोगों को अपनी आंखें खुली रखनी चाहिए। उन्होंने 26 सितंबर 2011 का एक किस्सा साझा किया, जब वे दिल्ली में जागरण फिल्म फेस्टिवल में शामिल हुए थे। उस दौरान स्टैनली का डब्बा को क्रिटिक्स बेस्ट फिल्म अवॉर्ड मिला था।

उन्होंने कहा कि इसका मतलब था कि उस समय भी कोई ऐसा व्यक्ति था, जिसे यह फिल्म दिल को छूने वाली लगी थी। इसलिए अच्छी फिल्मों को देखने और समझने के लिए दर्शकों को खुला नजरिया रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि कुछ फिल्में केवल बड़े-बड़े एक्शन सीक्वेंस, आइटम सॉन्ग और अलग-अलग मनोरंजक दृश्यों के सहारे बनाई जाती हैं, लेकिन सिनेमा का असली उद्देश्य इससे कहीं बड़ा हो सकता है।
बच्चों के लिए बनाएं फिल्में
अमोल गुप्ते ने आगे बताया कि जब वे चिल्ड्रन्स फिल्म सोसाइटी के चेयरपर्सन बन रहे थे, तब उन्हें इस बात का बहुत दुख था कि बच्चों के लिए फिल्में तो बनाई जा रही हैं, लेकिन उन्हें दर्शकों तक पहुंचाने का उचित माध्यम नहीं है। उन्होंने कहा कि अक्सर माता-पिता अपने बच्चों को यूए सर्टिफिकेट वाली फिल्मों में ले जाते हैं, क्योंकि उनमें एक्शन, आइटम नंबर और कॉमेडी जैसी चीजें होती हैं, जो पूरे परिवार का मनोरंजन करती हैं।
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लेकिन बच्चों के लिए विशेष रूप से बनाई गई फिल्मों को पर्याप्त दर्शक नहीं मिलते। उन्होंने स्कैंडिनेवियाई देशों का उदाहरण देते हुए कहा कि वहाँ बच्चों की फिल्मों को प्रोत्साहित किया जाता है और वे अच्छा कारोबार भी करती हैं। उनका मानना है कि बच्चों के लिए अच्छी फिल्में बनाना और उन्हें देखने के लिए प्रोत्साहित करना बेहद जरूरी है।
धार्मिक और ऐतिहासिक फिल्मों का चलन
इस पर अमोल ने कहा कि इसमें कोई नई बात नहीं है, क्योंकि धार्मिक फिल्में भारतीय सिनेमा का हिस्सा हमेशा से रही हैं। उन्होंने 1975 का उदाहरण दिया, जब शोले के साथ जय संतोषी मां जैसी फिल्म भी दर्शकों के बीच बेहद लोकप्रिय हुई थी और मुनाफे के मामले में बड़ी सफलता हासिल की थी।
उन्होंने बताया कि उनकी नानी उन्हें बचपन में भक्त प्रह्लाद और संपूर्ण रामायण जैसी फिल्में दिखाने ले जाती थीं। आज वे चौंसठ साल के हैं, लेकिन धार्मिक फिल्मों का सिलसिला पहले भी था और आज भी जारी है। उनके अनुसार, किसी की आस्था और धर्म को सिनेमा से अलग नहीं किया जा सकता।
अभिनेता और निर्देशक, क्या करना है पसंद?
जब उनसे पूछा गया कि उन्हें अभिनेता के रूप में काम करने में ज्यादा मजा आता है या निर्देशक के रूप में, तो उन्होंने मजाकिया अंदाज में कहा- उन्हें सबसे ज्यादा मजा खाना पकाने और चाय बनाने में आता है। उनके अनुसार, अगर कोई अच्छी चाय बना सकता है, तो वह अच्छी फिल्म भी बना सकता है और अच्छा अभिनय भी कर सकता है। उन्होंने बताया कि वे बचपन से ही स्टेज पर एक चाइल्ड एक्टर के रूप में काम करते रहे हैं।
फिल्म इंस्टीट्यूट में उन्होंने अभिनेता के तौर पर लगभग 110 फिल्मों में काम किया। दूसरी फिल्मों और मास्टरपीस को देखते हुए धीरे-धीरे उनके मन में भी फिल्में बनाने का विचार आया। उन्होंने कहा कि अभिनेता बनना बेहतर है या निर्देशक, यह तुलना का विषय नहीं है, क्योंकि उनके लिए सबसे ज्यादा खुशी खाना पकाने में है। उन्होंने यह भी बताया कि उनके बेटे को उनके हाथ का बना खाना बहुत पसंद है।
सायना में किसकी करते कास्टिंग?
इस पर उन्होंने बताया कि श्रद्धा कपूर ने इस किरदार के लिए लगभग एक साल तक मेहनत की थी। वह सुबह साढ़े पांच बजे धारावी के सायन पंजाब क्लब में प्रैक्टिस करने आती थीं, जहां एसी की सुविधा भी नहीं थी। उन्होंने श्रद्धा के साथ चार दिन तक शूटिंग भी की थी। लेकिन बाद में श्रद्धा को डेंगू हो गया, जिससे उनकी शारीरिक ताकत काफी कम हो गई। इसके बाद उनके प्रोड्यूसर और फंडर टी-सीरीज ने पूछा कि वे कितना इंतजार कर सकते हैं। अंततः परिणीति चोपड़ा को इस भूमिका के लिए चुना गया।
