स्मिता श्रीवास्तव, जेएनएन। आलिया भट्ट और वरुण धवन स्टारर फिल्म ‘हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया’ से शशांक खेतान ने निर्देशन में कदम रखा था। यह फिल्म अंबाला और दिल्ली की गलियों के उन किरदारों की कहानी है जो दिल से सोचते हैं और प्रेम में यकीन रखते हैं। फिल्म से जुड़ी यादों को साझा कर रहे हैं निर्देशक शशांक खेतान...

पहले इस फिल्म का टाइटल था ‘हंप्टी शर्मा- द लव स्टोरी’, लेकिन बाद में क्रिएटिव चीजों को देखते हुए इसका नाम बदलकर ‘हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया’ कर दिया गया। मुझे हमेशा से लगा है कि रोमांटिक फिल्मों के किरदारों के नाम प्यारे होने चाहिए जो लोगों को हमेशा याद रहें। इस फिल्म के शुरुआती दौर में मैंने नायक की एक बैकस्टोरी तैयार की थी कि एक लड़का है जिसका नाम राकेश शर्मा है। वह बचपन में मोटा था और बड़ा होने के बाद पतला हो गया है। मोटे होने के कारण लोग उसे हंप्टी डम्टी कार्टून के नाम पर हंप्टी बुलाते थे। इस तरह से मेरे किरदार हंप्टी का जन्म हुआ।

काव्या नाम मुझे बहुत पसंद था। मैंने सोचा था कि फिल्म बनाऊंगा तो किरदार का नाम काव्या जरूर रखूंगा। लव स्टोरी लिखते वक्त मेरी कोशिश यही रहती है कि जोड़ियों का नाम सुनने में अच्छा लगे, हंप्टी और काव्या की जोड़ी सुनने में अच्छी लग रही थी। वरुण की उस समय तक सिर्फ एक फिल्म रिलीज हुई थी। पहली मुलाकात के दौरान ही हम दोनों ने समझ लिया कि हम दोनों के बीच कुछ खास होने वाला है। वरुण इतने ऊर्जावान हैं कि उनके साथ शूटिंग बहुत दिलचस्प होती है। जब पूरा शाट खत्म हो जाता था तो वो अंत में कहते कि यार एक टेक मैं अपने आप करना चाहता हूं।

वो ठहरे डेविड धवन के बेटे तो उनमें ओवर एक्टिंग हमेशा से ही रही है। जब वो अपने अंदाज में ओवर एक्टिंग के साथ वह सीन करते तो पूरा सेट हंसता। मैंने उनसे इसके बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि मेरे अंदर ओवरएक्टिंग की जो भड़ास है वह निकल जाए ताकि अगले दिन सीन में न आए। वरुण और आलिया दोनों मुंबई में पले-बढ़े हैं। किरदारों की बोली में ढलने के लिए दोनों ने इतनी मेहनत की जिससे लगने लगा कि हंप्टी दिल्ली और काव्या अंबाला की ही है। इसके लिए हमने करीब साढ़े चार-पांच महीने तक रीडिंग की।

आशुतोष राणा मुझे हमेशा से बेहतरीन एक्टर लगते हैं। मैं कुछ इस तरह दिखाना चाहता था कि लोगों को पहली नजर में लगे कि पिता ही फिल्म का विलेन है, लेकिन बाद में पता चलता है कि वह बेटी से बहुत प्यार करता है। आशुतोष जी ने एक ही मीटिंग में किरदार के लिए स्वीकृति दे दी थी। इस फिल्म के गाने ‘दैंगड़ दैंगड़’ की शूटिंग के दौरान हर दो घंटे के अंतराल पर बारिश होती थी। बारिश होने लगती तो सब लोग भागते और ग्राउंड को ढकते। सटर्डे-सटर्डे गाना फिल्म रिलीज होने से डेढ़-दो साल पहले ही पंजाब में रिलीज हो चुका था, लेकिन पापुलर नहीं हुआ था। जब मैंने इसे सुना तो हमारी फिल्म के लिए यह उपयुक्त लगा। हमारी फिल्म के निर्माता करण जौहर समेत जिसको भी मैंने यह गाना सुनाया, उन्होंने कहा कि यह तो बहुत कमाल का गाना है। फिर हमने इसके राइट्स खरीदे और प्रमोशनल वीडियो शूट किया।

फिल्म में मनीष मल्होत्रा का डिजाइन किया लहंगा भी आकर्षण का केंद्र रहा। मैं जब भी परिवार सहित शादियों में जाता था तो देखता कि लड़के शेरवानी-कुर्ते को लेकर इतना शौकीन नहीं होते, जितनी लड़कियां लहंगे को लेकर। उच्च मध्यमवर्गीय या मध्यमवर्गीय परिवार की लड़कियों के लिए शादी में मनीष मल्होत्रा का लहंगा पहनना गर्व की बात होती है। मैंने समाज के इसी हिस्से को दिखाने की कोशिश की। क्लाइमेक्स सीन में आलिया को ट्रक के ऊपर चढ़कर हंप्टी को बुलाना था। उससे ठीक पहले आलिया के पांव में मोच आ गई थी, पर उन्होंने अपनी हिम्मत और क्रू के सहयोग से सीन पूरा किया।

 

Edited By: Nazneen Ahmed