नई दिल्ली, मनोज वशिष्ठ । हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री की यह विडम्बना है कि हिंदी फ़िल्में बनाने वाली इस इंडस्ट्री के कामकाज और बोलचाल की भाषा अंग्रेजी है। कुछ कलाकारों और फ़िल्मकारों को छोड़ दें तो ज़्यादातर लोग हिंदी फ़िल्मों की बात अंग्रेजी में ही करते नज़र आते हैं। यहां तक कि फ़िल्मों की स्क्रिप्ट और डायलॉग तक देवनागरी के बजाए रोमन लिपि में लिखे जाते हैं। बहरहाल, हिंदी दिवस (14 सितम्बर) पर हम ऐसी फ़िल्मों की बात करेंगे, जिनमें हिंदी भाषा कहानी का एक ख़ास पहलू बनी और किरदार के मज़ेदार रंगों को उभारा। 

ऐसी फ़िल्मों के बारे में सोचने पर सबसे पहले ज़ेहन में ऋषिकेश मुखर्जी की फ़िल्म 'चुपके चुपके' का नाम आता है। हिंदी सिनेमा की इस क्लासिक कॉमेडी फ़िल्म में धर्मेंद्र के किरदार के ज़रिए हिंदी भाषा का इस तरह इस्तेमाल किया गया था कि एक-एक दृश्य यादगार बन गया। 1975 में आयी फ़िल्म में धर्मेंद्र के किरदार को फ़िल्म में हिंदी प्रेमी दिखाया गया था। हालांकि वो एक प्रैंक के तहत होता है, जो ओम प्रकाश के किरदार के साथ खेला जाता है। 

धर्मेंद्र ने ट्विटर पर फ़िल्म का एक सीन शेयर करके लिखा- हर भाषा से मोहब्बत है। आपके धर्म ने हिंदी का भी जी भर के आनंद लिया।

अमिताभ बच्चन ने हिंदी दिवस की शुभकामनाएं देते हुए लिखा- सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा।

इसके लगभग 40 साल बाद धर्मेंद्र के बेटे बॉबी देओल भी कुछ ऐसे ही किरदार में दिखे। श्रेयस तलपड़े निर्देशित कॉमेडी फ़िल्म 'पोस्टर बॉयज़' में बॉबी देओल हिंदी टीचर के रोल में थे और फ़िल्म में वो शुद्ध हिंदी में बात करते हुए दिखायी दिये।

इस रोल की तैयारी के लिए बॉबी की श्रेयस और फ़िल्म के लेखक बंटी राठौड़ ने मदद की। दोनों ने बॉबी को हिंदी क्लासेज़ दीं, जो गायत्री मंत्र के साथ शुरू होती थीं। बोलचाल की बारीकियां सीखने के लिए बॉबी नियमित रूप से हिंदी के अख़बार पढ़ते थे।

फ़िल्मों में हिंदी-अंग्रेजी की खींचतान

2017 में रिलीज़ हुईं 'हाफ़ गर्लफ्रेंड' और 'हिंदी मीडियम', हिंदी और अंग्रेजी को लेकर चलने वाली वैचारिक खींचतान पर आधारित फ़िल्में थीं। मोहित सूरी निर्देशित 'हाफ़ गर्लफ्रेंड' में अर्जुन कपूर का किरदार माधव झा बिहार मूल का है, जो दिल्ली में पढ़ता है। कॉलेज फ्रेंड श्रद्धा कपूर का किरदार शहरी परिवेश में पला-बढ़ा दिखाया गया और अंग्रेजी भाषा उसकी दिनचर्या का हिस्सा है। उनकी प्रेम कहानी में भाषा की ये खाई एक अहम रोल अदा करती है।

दो किरदारों के बहाने हिंदी और अंग्रेजी की लगभग ऐसी ही कशमकश 'हिंदी मीडियम' में भी दिखायी गयी। इरफ़ान ख़ान का किरदार दिल्ली में रहने वाला मिडिल क्लास बिजनेसमैन है, जो अपनी ज़ुबान हिंदी को लेकर किसी भी तरह के अपराध बोध से मुक्त है, मगर पत्नी बनीं सबा क़मर बच्चे की शिक्षा के लिए अंग्रेजी माध्यम को बेहतर समझती है। महज़ एक भाषा किस तरह से एक मिडिल क्लास परिवार की रोज़-मर्रा की ज़िंदगी को प्रभावित कर सकती है, यही हिंदी मीडियम की कहानी का सार था।

हिंदी-अंग्रेजी की ऐसी ही खींचतान 2012 में आई श्रीदेवी की फ़िल्म 'इंग्लिश विंग्लिश' में भी नज़र आ चुकी है। साकेत चौधरी निर्देशित फ़िल्म में अंग्रेजी भाषा को लेकर लोगों के माइंडसेट को किरदारों के ज़रिए पर्दे पर पेश किया गया। 'इंग्लिश विंग्लिश' में श्रीदेवी ने घरेलू महिला को रोल निभाया था, जो एक बेहतरीन मां और पत्नी होते हुए भी उपेक्षित रहती है, और फिर परिवार की नज़रों में चढ़ने के लिए अंग्रेजी भाषा सीखती है।

वैसे साहबों की भाषा समझी जाने वाली अंग्रेजी को लेकर दुराग्रहों और हिंदी के लिए पूर्वाग्रहों की झलक पुरानी फ़िल्मों में भी दिखती रही है। आपको याद होगी सलमान ख़ान की डेब्यू फ़िल्म 'बीवी हो तो ऐसी', जिसमें रेखा ने फ़ारूक़ शेख की बीवी का रोल निभाया था। सलमान रेखा के देवर बने थे। फ़िल्म में पहले रेखा के किरदार को गांव का दिखाया गया था, मगर क्लाइमेक्स सीन में जब वो फर्राटेदार अंग्रेजी बोलती है, तो घरवालों की आंखें खुली रह जाती हैं। फ़िल्म में रेखा के किरदार को आधुनिक दिखाने के लिए अंग्रेजी भाषा का सहारा लिया गया।

1983 में आई ऋषिकेश मुखर्जी की कॉमेडी ड्रामा 'किसी से ना कहना' की कहानी का ह्यूमर हिंदी और अंग्रेजी के क्लैश से आता है। फ़िल्म में डॉक्टर बनीं दीप्ति नवल को फ़ारूक़ शेख से प्यार हो जाता है, जो एक कंपनी में जनरल मैनेजर हैं, मगर इनकी प्रेम कहानी में आड़े आता है फ़ारूक़ के पिता बने उत्पल दत्त का हिंदी प्रेम और अंग्रेजी से नफ़रत। उत्पल दत्त के किरदार को लगता है कि अंग्रेजी बोलने वाले संस्कृति और संस्कारों से दूर हो जाते हैं।

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