बॉक्स ऑफिस पर 'डिजास्टर' हुई वो फिल्म जो बाद में बनी सिनेमा की 'मास्टरपीस', स्कूलों में पढ़ाई जाती है मूवी
65 साल पहले आई एक फिल्म बॉक्स ऑफिस पर तो फ्लॉप रही, लेकिन बाद में यही फिल्म सिनेमा की वो मास्टरपीस बन गई जिसे स्कूलों में पढ़ाया जाने लगा।
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हिंदी सिनेमा की मास्टरपीस फिल्म
HighLights
बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप हुई थी कल्ट क्लासिक फिल्म
फिल्म की असफलता के बाद डायरेक्टर ने छोड़ा था निर्देशन
6 दशक से सिखाई जा रही है फिल्म की सिनेमैटोग्राफी
एंटरटेनमेंट डेस्क, नई दिल्ली। एक ऐसी फिल्म जिसने एक डायरेक्टर का करियर तबाह कर दिया हो, दर्शकों ने नकार दिया है, पैसे डुबा दिए हों, वो आज सिनेमा की 'मास्टरपीस' कही जाती है। उस फिल्म की बारीकियों को स्कूलों में पढ़ाया जाता है। इस आर्टिकल में बात एक ऐसी ही फिल्म की हो रही है, जो 65 सालों से कल्ट क्लासिक है।
साल 1959 में एक फिल्म रिलीज हुई। फिल्म की कहानी शानदार थी, सिनेमैटोग्राफी दमदार थी, निर्देशन काबिल-ए-तारीफ और संगीत तो दिग्गज संगीतकार एसडी बर्मन (SD Burman) ने तैयार किया था। फिर भी यह सफल हुई। जिस फिल्म की हम यहां बात कर रहे हैं, वो गुरु दत्त (Guru Dutt) स्टारर 'कागज के फूल' (Kaagaz Ke Phool) है।
हिंदी सिनेमा की कल्ट क्लासिक फिल्म
'कागज के फूल' भारत की पहली वाइडस्क्रीन फिल्म थी जिसमें सिनेमास्कोप का इस्तेमाल किया गया था। ऐसा कहा जाता है कि फिल्म गुरु दत्त की जिंदगी पर आधारित थी। वहीं, कुछ लोग मानते हैं कि फिल्म मशहूर डायरेक्टर ज्ञान मुखर्जी की जिंदगी से इंस्पायर्ड है। हालांकि, दोनों ही दावों पर सिर्फ चर्चा ही होती है, इसमें कितनी सच्चाई है? यह कहा नहीं जा सकता है।

गुरु दत्त के दिल के करीब थी फिल्म
गुरु दत्त ने ही फिल्म का निर्देशन किया था। वह बतौर निर्माता-निर्देशक सिनेमा के सबसे सफल हस्ती हुआ करते थे। 'कागज के फूल' उनके दिल के करीब थी। जब उन्होंने यह फिल्म बनाई तो पैसे खर्च करने में जरा भी नहीं सोचे। खुद लीड एक्टर थे और साथ में वहीदा रहमान (Waheeda Rehman), कुमारी नाज, महमद और जॉनी वॉल्कर जैसे अभिनेता अहम भूमिकाओं में थे।
'कागज के फूल' की कहानी
फिल्म की कहानी एक अकेले, बूढ़े और शराब के आदी हो चुके निर्देशक सुरेश सिन्हा की है, जो एक खाली स्टूडियो में बैठकर अपने पुराने दिनों को याद करता है। फिल्म में गुरु दत्त की परफॉर्मेंस दमदार थी। वह निर्देशक के दर्द को बयां करने में सफल रहे। इस फिल्म से बहुत उम्मीदें थीं।
फिल्म की असफलता के बाद छोड़ा निर्देशन
मगर जब फिल्म बड़े पर्दे पर आई तो यह दर्शकों को सिनेमाघरों में खींच पाने में नाकामयाब रही। कहा जाता है कि फिल्म का सैड प्लॉट, फिल्म क्रिटिक्स की आलोचना ने इस फिल्म को असफल बना दिया। फिल्म की असफलता ने गुरु दत्त को इमोशनली और फाइनेंशियली तोड़ दिया। इसके बाद उन्होंने किसी फिल्म का निर्देशन नहीं किया। हालांकि, उन्होंने फिल्म का निर्माण करना जारी रखा।

स्कूलों में पढ़ाई जाती है फिल्म
वक्त के साथ-साथ गुरु दत्त की 'कागज के फूल' कल्ट क्लासिक बन गई। जिस फिल्म को 1959 में ऑडियंस नहीं मिल रही थी, उसे आज फिल्म स्कूलों में पढ़ाया जाता है। यह फिल्म हिंदी सिनेमा में टेक्निकल रिवोल्यूशन लेकर आई थी। यह अपने समय के आगे की फिल्म थी जिसमें पहली बार सिनेमास्कोप का इस्तेमाल किया गया था। स्कूल में फिल्म की धांसू सिनेमैटोग्राफी, स्टोरीटेलिंग का अंदाज और गुरु दत्त के निर्देशन की बारीकियों को पढ़ाया जाता है।
