साहिर लुधियानवी की नज्म से बना Guru Dutt का अमर गीत, मो. रफी ने दी आवाज; अकेलेपन को बयां करता है कालजयी गाना
गुरु दत्त की फिल्म का एक गीत है जो खूब सुपरहिट है। इस गीत को साहिर लुधियानवी ने अपनी एक ...और पढ़ें

दिलचस्प है गुरू दत्त के इस गाने का किस्सा
HighLights
गुरु दत्त की फिल्म 'प्यासा' के अमर गीत का किस्सा
साहिर लुधियानवी की नज्म से बाना गाना
मोहम्मद रफी ने कल्ट गीत को दी थी आवाज
एंटरटेनमेंट डेस्क, नई दिल्ली। संगीत हमारी सभी भावनाओं को व्यक्त करता है। सिनेमा में संगीत के बनने का सिलसिला सदियों पुराना है और कई गाने ऐसे बने हैं, जो कभी रुला देते हैं तो कभी हंसा देते हैं। कुछ गाने मन में प्रेम भी जगाते हैं। आज हम आपको एक ऐसे गाने के बारे में बताने जा रहे हैं, जो असल में अकेलेपन के दर्द को बयां करता है और इस गाने का किस्सा भी काफी दिलचस्प है।
कौन सा है वह गीत?
दरअसल जिस गाने की हम बात कर रहे हैं वो साल 1957 में आया था। यह गाना एक तरह से अकेलेपन और अवसाद की स्थित को दर्शाता है। जी हां, गुरूदत्त की फिल्म प्यासा के गाने यादगार रहे लेकिन फिल्म का गाना 'ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है' (Yeh Duniya Agar Mil Bhi Jaye) दर्शकों के बीच खासा पसंद किया गया।

इस गाने को मोहम्मद रफी (Mohammed Rafi) ने अपनी आवाज दी थी। वहीं गाने का संगीत एस.डी. बर्मन (S.D. Burman) ने तैयार किया था। वहीं गाने के बोल साहिर लुधियानवी (Sahir Ludhianvi) ने लिखे थे। गाने में गुरू दत्त नजर आए थे। गाना लोगों को पसंद भी खूब आया, लेकिन इस गाने के बनने के पीछे की कहानी दिलचस्प है।
दरअसल फिल्म प्यासा (Pyaasa Songs) के सभी गाने यादगार रहे। इस गाने के लिए साहिर लुधियानवी ने अपनी एक खास नज्म का इस्तेमाल किया था।
एक नज्म से बना था गाना?
कहा जाता है कि, यह गाना असल में सीधे फिल्म का हिस्सा नहीं था। गीतकार साहिर लुधियानवी ने मूल रूप से एक नज्म लिखी थी जिसका शीर्षक था 'चकले' जो कि वेश्याघरों पर आधारित नज्म थी, जो उनके 1944 में आए प्रसिद्ध काव्य संग्रह 'तल्खियां' में प्रकाशित हुई थी। वहीं सालों बाद जब गुरु दत्त अपनी फिल्म 'प्यासा' बना रहे थे, तो अपनी इसी फिल्म में समाज के खोखलेपन और कलाकार की लाचारी को पर्दे पर उतारना चाहते थे।

वो फिल्म के क्लाइमेक्स के लिए ऐसा गाना चाहते थे जहां हीरो दुनिया की चकाचौंध को भी ठुकरा दे। साहिर ने गुरु दत्त और संगीतकार एस.डी. बर्मन को अपनी उसी नज्म 'चकले' के भाव पर लिखे कुछ बोल सुनाए, जो उसी नज्म से प्रेरणा लेकर बनाए गए। बस फिर क्या था, इस पर गुरू दत्त साहब ने हामी भर दी और एस.डी. बर्मन ने इसका संगीत तैयार किया और फिर पूरे भाव के साथ इसमें उस दर्द को मिलाकर मोहम्मद रफी ने इसे गा दिया।
प्यासा फिल्म के इस गाने ने लोगों के दिलों में अमिट छाप छोड़ी है। ये गाना फिल्म में इसका बड़े ही अलग और नाटकीय अंदाज फिल्माया गया। गाने के बोल मानो जिंदगी का हर सच बयां कर रहे हैं।
ये महलों, ये तख्तों, ये ताजों की दुनिया
ये इन्सां के दुश्मन समाजों की दुनिया
ये दौलत के भूखे रिवाजों की दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है
आपको जानकर हैरानी होगी कि जब ये नज्म और बोल गुरू दत्त (Guru Dutt Pyaasa) के सामने आए तो उनका निजी जीवन कुछ ठीक नहीं चल रहा था। गीता दत्त से अलग होने के बाद गुरू दत्त गहरे डिप्रेशन में थे और उसी वक्त ये गाना लिखा गया जो गुरू दत्त पर ही फिल्माया गया था। इसी फिल्म के दौरान उन्होंने आत्महत्या करने की कोशिश भी की थी।
फिल्म 'प्यासा' (Pyaasa) सिनेमा की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में से एक रही है। इसमें गुरू दत्त के साथ वहीदा रहमान नजर आईं थीं। फिल्म को गुरू दत्त ने ही प्रोड्यूस-डायरेक्ट किया और वही इसमें लीड हीरो के तौर पर नजर आए थे।
