स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई। भारतीय सिनेमा के स्वर्णिम इतिहास में दर्ज होने वाली फिल्मों में एक है 'मदर इंडिया'। यह प्रतिष्ठित आस्कर अवार्ड के लिए नामित प्रथम भारतीय फिल्म थी। आस्कर अवार्ड में इसकी कांटे की टक्कर इटालियन प्रोड्यूसर डीनो डे लारेन्टिस की फिल्म 'नाइट्स आफ केबिरिया' से हुई थी, जो विजेता रही। आस्कर की दौड़ में 'मदर इंडिया' के 47 साल बाद आमिर खान अभिनीत 'लगान' को यह मौका मिला था।

'मदर इंडिया' के निर्देशक महबूब खान ने फिल्म निर्माण की न तो कोई औपचारिक शिक्षा ली थी न ही उनकी कोई फिल्मी पृष्ठभूमि थी। अपने समय के अधिकतर फिल्मकारों की तरह महबूब ने भी विभिन्न स्टूडियो में काम करके फिल्म निर्माण की कला को समझा। उनकी फिल्में वी शांताराम और राज कपूर की शुरुआती फिल्मों की तरह सामाजिक मुद्दों खास तौर पर अमीर और गरीब के बीच की खाई से जुड़ी होती थीं। यह बात स्पष्ट रूप से उनकी कुछ फिल्मों में दिखी। फिल्म 'रोटी' (1942) पूंजीवादी सभ्यता और वर्ग आधारित समाज पर कटाक्ष करती है। 'आन' (1952) में एक आम आदमी राजा के खिलाफ मोर्चा खोलता है। 'मदर इंडिया' (1957) एक ऐसी हिम्मती औरत की कहानी है जो विषम परिस्थितियों के बावजूद लालची जमींदार की लुभावनी बातों में नहीं आती है। प्रख्यात इतिहासकार गर्ग ने अल्जीरिया में 'मदर इंडिया' को देखने के दौरान अरब की महिलाओं को नरगिस द्वारा निभाए किरदार को देखकर आंसू बहाते देखा था।

साल 1940 में महबूब द्वारा ही बनाई गई फिल्म 'औरत' की रीमेक थी 'मदर इंडिया'। 'औरत' में महबूब की पत्नी सरदार अख्तर ने प्रमुख भूमिका बनाई। यह फिल्म जबरदस्त हिट हुई थी। 'औरत' के बनने के पीछे भी दिलचस्प कहानी है। महबूब के सहयोगी बाबूभाई मेहता उन्हें फिल्म 'द गुड अर्थ' दिखाने ले गए। यह फिल्म नोबेल पुरस्कार विजेता पर्ल एस बक के इसी नाम से लिखे गए उपन्यास पर आधारित थी। चीन की पृष्ठभूमि पर बनी यह फिल्म किसानों के संघर्ष पर थी। इस फिल्म ने महबूब को बहुत प्रभावित किया और उसी की तर्ज पर फिल्म बनाने का फैसला किया। बाबूभाई मेहता ने 'गुड अर्थ' की कहानी को पर्ल के एक अन्य उपन्यास 'द मदर' से जोड़ते हुए कहानी तैयार की जो महबूब को बहुत पसंद आई। 'औरत' की कहानी का श्रेय बाबूभाई मेहता को गया। हालांकि इसकी रीमेक 'मदर इंडिया' की कहानी श्रेय किसी को नहीं गया, लेकिन डायलाग का श्रेय वजाहत मिर्जा और एस अली रजा को गया। कहा जाता है कि 'मदर इंडिया' शीर्षक नरगिस ने ही सुझाया था।

साल 1940 की इस फिल्म का रीमेक महबूब लार्जर दैन लाइफ बनाना चाहते थे। हालांकि उनकी फिल्म मेकिंग आधुनिकता की ओर स्थिर हो गई थी, लेकिन 'औरत' के आदर्श और मूल्य उनके दिल के करीब थे। फिल्म में 'बिरजू' का किरदार निभाने के लिए दिलीप कुमार उनकी पहली पसंद थे, लेकिन नरगिस जिन्होंने दिलीप कुमार की प्रेमिका का किरदार कई फिल्मों में निभाया था वह उनकी मां बनना स्वीकार नहीं कर पाईं। चूंकि फिल्म नरगिस के ईदगिर्द घूमती थी, इसलिए महबूब को बिरजू के लिए दूसरे कलाकार को तलाशना पड़ा। उन्होंने भारत में जन्मे हालीवुड एक्टर साबू दस्‍तगीर को लेना तय किया। मगर स्क्रीन टेस्ट के बाद वह उनकी अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरे। उसके बाद सुनील दत्त के नाम पर सहमति बनी। फिल्म में राजकुमार ने नरगिस के पति और राजेंद्र कुमार ने बड़े बेटे का किरदार निभाया।

कहा जाता है कि महबूब के दिल में कुमकुम के लिए खास जगह थी, उन्हें राजेंद्र कुमार की गर्लफ्रेंड के तौर पर कास्ट किया गया। फिल्म में साहूकार का किरदार निभाने वाले कन्हैयालाल ने 'औरत' में भी यही किरदार निभाया था। इसमें चंचल ने उनकी बेटी रूपा का किरदार निभाया था, जिसकी इज्जत बचाने के लिए राधा (नरगिस) अपने बेटे को ही मार देती है। इस फिल्म को उसी लोकेशन में शूट किया गया था, जहां 17 साल पहले 'औरत' की शूटिंग की गई थी। नवसारी में आउटडोर शूटिंग के दौरान जहां पर नरगिस के दृश्यों की शूटिंग की जा रही थी, वहां आग लग गई थी। नरगिस को बचाने के लिए सुनील दत्त अपनी जान को जोखिम में डालकर उन्हें बचा लाए थे।

'औरत' बनने के बाद महबूब ने फिल्म की नायिका सरदार अख्तर से निकाह किया था। वहीं 'मदर इंडिया' के बाद सुनील दत्त ने नरगिस से शादी की। वर्ष 1957 में दीवाली के दौरान रिलीज हुई 'मदर इंडिया' बाक्स आफिस पर सुपरहिट रही। उस समय फिल्म ने करीब आठ करोड़ की कमाई की थी। यह फिल्म बांबे में लिबर्टी सिनेमा में एक साल तक चली थी। फिल्म में बेजोड़ अभिनय के लिए नरगिस को देश-विदेश में कई अवार्ड से सम्मानित किया गया था। साथ ही संघर्षशील सुनील दत्त और राजेंद्र कुमार के करियर को उड़ान मिली। इस फिल्म को हिंदी सिनेमा का मील का पत्थर करार दिया गया। भारतीय सिनेमा को यादगार फिल्म देने वाले इस महान फिल्ममेकर का 28 मई, 1964 को दिल का दौरा पडऩे से निधन हो गया था।

Edited By: Sanjay Pokhriyal