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'दिल हूम हूम करे' से 'गंगा बहती हो क्यों' तक... संगीत से सिनेमा को सजाने वाले डॉ भूपेन हाजरिका

Published: Sun, 27 Sep 2026 06:30 AM (IST)

भारत रत्न से अलंकृत डॉ. भूपेन हाजरिका (Dr. Bhupen Hazarika) महान गायक और संगीतकार होने के साथ आधुनिक भारतीय संस्कृति के पुनर्जागरण पुरुष थे।

सिनेमा को खूबसूरत गीत देने वाले डॉ. भूपेन हाजरिका

सिनेमा को खूबसूरत गीत देने वाले डॉ. भूपेन हाजरिका

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उत्पल बरपुजारी, असम। इस माह सुधाकंठ-यानी शहद जैसी मीठी आवाज वाले-कहे जाने वाले भारत रत्न और दादा साहब फाल्के पुरस्कार से अलंकृत विजेता स्व. डा. भूपेन हाजरिका के जन्म शताब्दी समारोह का समापन हुआ। 

यदि आप असम और बंगाल से बाहर के किसी व्यक्ति से डा. भूपेन हाजरिका का नाम लें, तो निश्चित रूप से आपको यही प्रतिक्रिया मिलेगी कि वह असम और उत्तर-पूर्व भारत के सबसे महान सांस्कृतिक राजदूत थे या उन्होंने हमें गंगा बहती हो क्यों और दिल हूम हूम करे जैसे कालजयी गीत दिए।

केवल कुछ गिने-चुने संगीत पारखी ही आपको उनके हिंदी एल्बम 'मैं और मेरा साया' (जिसमें उनके कुछ सबसे प्रसिद्ध असमिया गीतों का गुलजार द्वारा हिंदी में अनुवाद किया गया था) और कई हिंदी फिल्मों में उनके मधुर संगीत के बारे में विस्तार से बता पाएंगे।

अद्वितीय संगीत शैली

हाल ही में, असम की सर्वोच्च साहित्यिक संस्था असम साहित्य सभा ने डॉ. हाजरिका द्वारा लिखे गए सभी 346 गीतों का अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित किया। अभी उनके मूल असमिया और बंगाली गीतों के विशाल खजाने का हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद करने की आवश्यकता है। वास्तव में डॉ. हाजरिका की अद्वितीय गहरी, गूंजती हुई बैरिटोन आवाज और उनकी कर्णप्रिय रचनाएं असमिया लोगों के अवचेतन में गहराई से रची-बसी हैं।

एक प्रशिक्षित संगीतकार न होने के बावजूद उन्होंने शास्त्रीय रागों से बारीक सूक्ष्मताओं को महारत से चुना और अपना संगीत तैयार करने के लिए उत्तर-पूर्व भारत के विशाल लोक संगीत के साथ उन्हें सहजता से मिलाया। उनका सांस्कृतिक प्रभाव बंगाली समाज पर भी उतना ही था, क्योंकि उन्होंने अपने जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा कोलकाता में बिताया, जहां उन्होंने बड़ी संख्या में मूल और असमिया से अनुवादित बंगाली गीत गाए और संगीतबद्ध किए।

Bhupen Hazarika Singer

बहुआयामी रचनात्मक व्यक्तित्व

डॉ. हाजरिका की पहचान को केवल एक गायक और संगीतकार तक सीमित रखना सतही समझ होगी। वह आधुनिक भारतीय संस्कृति के सच्चे पुनर्जागरण पुरुष थे। उनकी बहुमुखी रचनात्मकता विधाओं के एक आश्चर्यजनक दायरे में फैली हुई थी। वह एक शानदार गायक, एक दूरदर्शी संगीतकार, एक प्रखर गीतकार, एक अग्रणी फिल्म निर्माता, एक मर्मस्पर्शी चित्रकार, एक समर्पित राजनेता, एक तीक्ष्ण संपादक और सबसे बढ़कर, एक गहरे करुणामयी मानवतावादी थे।

उनका व्यक्तियों और समुदायों के बीच खड़ी की गई कृत्रिम दीवारों को तोड़ने के लिए संचार की शक्ति में जन्मजात विश्वास था। हाजरिका की सामाजिक-राजनीतिक चेतना भी उतनी ही निर्णायक थी। वह इंडियन पीपल्स थिएटर एसोसिएशन (इप्टा) आंदोलन में हेमांग विश्वास, सलिल चौधरी और बलराज साहनी जैसे दिग्गजों के करीबी सहयोगी रहे।

टूटा वामपंथ का भ्रम

एक मिशनरी जज्बे के साथ काम करते हुए, उन्होंने ऐसे गीत लिखे जिन्होंने उत्तर-पूर्व भारत के लगभग हर महत्वपूर्ण सामाजिक और राजनीतिक घटनाक्रम को समेटा, जिसमें भारत के स्वतंत्रता संग्राम से लेकर उल्फा प्रेरित उग्रवाद तक सब कुछ दर्ज था। उनका राजनीतिक सफर बेहद विविधतापूर्ण रहा। 1962 के भारत पर चीनी आक्रमण के बाद उनके पुराने वामपंथी झुकाव वाले विचारों में धीरे-धीरे बदलाव आया।

अपने जीवन के उत्तरार्ध में, उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी और एल.के. आडवाणी के व्यक्तिगत अनुरोध पर गुवाहाटी से भाजपा उम्मीदवार के रूप में लोकसभा चुनाव भी लड़ा, हालांकि वे हार गए। इससे पहले, उन्होंने असम विधानसभा में एक स्वतंत्र विधायक के रूप में काम किया था, और इस पद का उपयोग उन्होंने राज्य में कई सांस्कृतिक संस्थानों की स्थापना के लिए पुरजोर वकालत करने में किया था।

Bhupen Hazarika Music Artist

भारतीय सिनेमा में व्याप्ति

उनकी सामाजिक जिम्मेदारी की गहरी भावना गीत लेखन से लेकर फिल्म निर्माण तक फैली हुई थी। उदाहरण के लिए, अपनी पहली असमिया फिल्म ऐरा बाटोर सुर (रेगिस्तानी रास्ते का गीत) में उन्होंने लुप्त होती लोक संस्कृतियों को उजागर करने वाली एक मार्मिक कहानी बताई, जबकि चिकमिक बिजुली (बिजली की चमक) में उन्होंने एक शांत, छोटे से शहर से एक विशाल, आधुनिक शहर में गुवाहाटी के तेजी से होते बदलाव की नाटकीय पृष्ठभूमि पर आधारित एक कथा बुनी।

डॉ. हाजरिका के कलात्मक पदचिह्न केवल उत्तर-पूर्व या बंगाल तक सीमित नहीं थे। उन्होंने हिंदी फिल्म उद्योग में एक संगीत निर्देशक और पार्श्व गायक के रूप में भारत के दिल में महत्वपूर्ण पैठ बनाई। 'आरोप', 'रुदाली', 'एक पल', 'गज गामिनी', 'साज' और 'दरमियां' जैसी हिंदी फिल्मों के लिए उन्होंने दिल को छू लेने वाला संगीत पेश किया।

उन्होंने 1979 की भोजपुरी फिल्म 'छठ मइया की महिमा' के लिए भी संगीत निर्देशित किया, जो उनकी अविश्वसनीय भाषाई बहुमुखी प्रतिभा और भारत के विविध क्षेत्रों की सांस्कृतिक धड़कन को छूने की क्षमता को प्रदर्शित करता है।

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