मनोज वशिष्ठ, नई दिल्ली। निल बटे सन्नाटा, बरेली की बर्फ़ी और पंगा जैसी फ़िल्मों से एक सुलझी हुई फ़िल्मकार की पहचान बनाने के बाद अश्विनी अय्यर तिवारी अब उपन्यासकार भी बन गयी हैं। अश्विनी का पहला उपन्यास मैपिंग लव स्टैंड्स पर आ चुका है। यह उपन्यास अंग्रेज़ी भाषा में हैं। अश्विनी चाहती हैं कि जल्द यह हिंदी में भी आए। एक फ़िल्मकार से उपन्यासकार तक पहुंचने की कहानी जानने के लिए जागरण डॉट कॉम के डिप्टी एडिटर मनोज वशिष्ठ ने अश्विनी से बात की। पेश है- 

मैपिंग लव किस तरह का नॉवल है?

रोमांटिक नॉवल है। एक लड़के और लड़की की कहानी है। उनकी अपनी-अपनी जर्नी भी है। मां-बाप के साथ उनकी रिलेशनशिप भी है। जैसे मैप (नक्शा) होता है। प्यार में आप कभी पीछे जाते हैं, कभी आगे जाते हैं। फिर टर्न ले लेते हैं। ज़िंदगी भी उसी तरह है। किसी रिलेशनशिप में आप आगे जाते हो। फिर लगता है कि रिलेशनशिप वर्क नहीं कर रहा तो पीछे आ जाते हो। ब्रेकअप भी होते हैं, लेकिन उसे कभी भूल नहीं पाते। सब दिमाग में ही रहता है। मैपिंग लव प्यार में पड़ने और माफ़ करने की कहानी है।

नॉवल लिखने का पहला विचार कब आया? क्या निजी जीवन से प्रेरणा मिली?

 

 

 

 

 

 

 

 

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एक स्टोरीटेलर के तौर पर आपको आइडिया कहीं से भी आ जाते हैं। हर कहानी आपकी निजी ज़िंदगी से जुड़ी नहीं रहती या किसी से प्रेरणा नहीं मिलती है। लेखक काफ़ी उत्सुक होते हैं और जब दिमाग में कोई आइडिया आता है, तो लगता है कि इस पर लिखा जाना चाहिए और जब एक प्लॉट पॉइंट मिल जाता है तो आप उसे आकार देते हो। फिर कैरेक्टर्स बनाये जाते हैं। नॉवल का लेखन एक यात्रा की तरह होता है। जैसे ही प्लॉट पॉइंट आया, मैं निकल पड़ी अपनी जर्नी में और अपनी कहानी को 'मैप' किया।

जैसा कि आपने कहा- प्लॉट पॉइंट आया... तो इस पर फ़िल्म बनाने का मन नहीं हुआ?

मैं अपने आपको एक स्टोरीटैलर (कहानीकार) ही मानूंगी और एक स्टोरीटैलर के पास कई कहानियां होती हैं। फ़िलहाल हम जिस जगह पर हैं और रचनाशीलता की इतनी पहचान हो रही है। कहानियों को बताने के लिए इतने माध्यम हैं। भले ही वो वेब सीरीज़ या पॉप्यूलर फ़िल्म्स हों या थिएट्रिकल फ़िल्म्स हों या पॉडकास्ट हो या शोज़ हों, आप हर जगह किसी भी प्लेटफॉर्म पर अपनी कहानी बता सकते हैं। मुझे ऐसा लगा कि यह कहानी एक किताब की तरह ही लिखी जानी चाहिए, क्योंकि इसमें जितनी भावनाएं गुंथी हुई हैं, हम उसे एक मूवी में समेट नहीं पाएंगे।

 

 

 

 

 

 

 

 

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आगे चलकर फ़िल्म या वेव सीरीज़ में बदलने की कोई योजना?

फ़िल्म या वेब सीरीज़ के बारे में ज़्यादा नहीं सोचा है और मंज़िल के बारे में ज़्यादा नहीं सोचती। सफ़र के बारे में सोचती हूं। अभी इस यात्रा का आनंद लेना चाहूंगी। फिर देखते हैं, अगर किसी को बनाना हो तो वो तब की बात है। (हंसते हुए) इतना आगे का अभी पैनडेमिक में सोचते नहीं हैं।

मैपिंग लव लिखने की शुरुआत कैसे हुई?

तीन साल पहले यह स्टोरी लिखनी शुरू की थी। घर और काम की ज़िम्मेदारियों की वजह से किताब पीछे छूट गयी। मैं जहां जाती हूं, अपनी एक छोटी सी डायरी लेकर जाती हूं। धीरे-धीरे लिख रही थी। काफ़ी चैप्टर्स ख़त्म कर दिये थे मैंने और फिर पैनडेमिक हो गया। पैनडेेमिक में मेरे सामने दो विकल्प थे। अफ़सोस मनाते रहें या हम सकारात्मक बनकर दूसरों के लिए दुआ करें। वो सब दिमाग में रखकर मैंने लिखना शुरू किया।

आपको ऐसा नहीं लगता कि हिंदी साहित्य पर फ़िल्में बनाने में इंडस्ट्री ने अधिक रुचि नहीं दिखायी है?

लेखक, लेखक होता है। वो जिस भाषा में लिखते हैं, वो माध्यम अलग होता है। मैं चाहती हूं कि बहुत सारे लेखक हिंदी में लिखें। मैंने अपने प्रकाशक को बोला है कि इसको (मैपिंग लव) हिंदी में लिखवाइए। अगर हम स्क्रीनप्ले हिंदी में लिख सकते हैं। संवाद हिंदी में लिख सकते हैं तो किताब भी हिंदी में लिख सकते हैं। हिंदी में लेखन का आनंद लेने वाले अधिक लेखकों को देखना सुखद होगा, ताकि भावी पीढ़ी को हिंदी पढ़वा सकें।

आपके पसंदीदा लेखक कौन हैं और उनकी कौन सी रचना आपको पसंद है?

मेरे पसंदीदा लेखक मुराकामी (Haruki Murakami) हैं। जापान के हैं और जापानी में लिखते हैं। फिर उनकी किताबें अंग्रेज़ी में अनुवादित होती हैं और उन अनुवादों को हम यहां पर पढ़ते हैं। 'मैजिक रियलिज़्म' में वो अपनी कहानी को हमसे जोड़ देते हैं। उनकी जो कैट (बिल्ली) है, वो भी हमारे साथ जुड़ जाती है। उनके लेखन का फलसफा और अनुशासन मुझे बहुत अच्छा लगता है। अमिताभ घोष का लेखन भी मुझे अच्छा लगता है, क्योंकि उनका लेखन 'इंटेलीजेंट' होता है। वो प्रोफेसर हैं और पर्यावरण की तरफ़ झुकाव रहता है। इसे वो जिस तरह से फिक्शन में लेकर आते हैं, वो बहुत कठिन है, लेकिन वो उसे भी बेहतरीन ढंग से लिखते हैं।

 

 

 

 

 

 

 

 

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मैपिंग लव के बारे में जानकर नितेश तिवारी की पहली प्रतिक्रिया क्या थी?

नितेश का पहला रिएक्शन यही था कि मैं सोचता रह गया और इन्होंने लिख भी दिया। जैसा कि उन्होंने अपने इंस्टाग्राम एकाउंट के ज़रिए ज़ाहिर किया था।

आपने महिला-प्रधान फ़िल्में निर्देशित की हैं। ऐसी कहानियां चुनने के पीछे क्या वजह रहती है?

बरेली की बर्फ़ी में राजकुमार राव सबसे अधिक चमके थे। वो फ़िल्म एक पुरुष के नज़रिए से थी। पंगा भले ही एक औरत की स्टोरी हो, मगर एक पति की भी कहानी थी। एक पिता है, बेटा है। महिला प्रधान से हमें निकल जाना चाहिए, क्योंकि हम कहानीकार के तौर पर काफ़ी आगे आ चुके हैं। हम मेल सेंट्रिक फ़िल्में क्यों नहीं बोलते? पहले ऐसी फ़िल्में बहुत कम होती थीं, जो फीमेल सेंट्रिक होती थीं। अब तो इतनी सारी कहानियां आ गयी हैं।

मुझे लगता है कि यह जो टैग दिया गया है, वुमन सेंट्रिक फ़िल्मों का, यह जला देना चाहिए। मदर इंडिया जब बनी थी, तो किसी ने नहीं बोला कि वुमन सेंट्रिक फ़िल्म है। लोग थिएटर में यह सोचकर नहीं जाते कि मेल सेंट्रिक है या वुमन सेंट्रिक है। वो सिर्फ़ कहानी देखने जाते हैं। हां एंटरटेनमेंट वैल्यू और एक्टर्स मायने रखते हैं। मैंने कभी नॉवल्स को मेल सेंट्रिक या वुमन सेंट्रिक नहीं देखा। आप महाश्वेता देवी को ले लीजिए, उनकी तो सारी कहानियां अलग-अलग होती हैं। जब हम कहानियों और किताबों के लिए नहीं बोलते तो फ़िल्मों के लिए क्यों बोलते हैं।

आप ब्रेक पॉइंट वेब सीरीज़ से जुड़ी हैं? इसके बारे में क्या बताना चाहेंगी?

ब्रेक पॉइंट डाक्यू-ड्रामा सीरीज़ है। नितेश और मैं पहली बार साथ में निर्देशित कर रहे हैं। ब्रेक पॉइंट पर हमारा काम ख़त्म हो चुका है और अभी पोस्ट प्रोडक्शन में है। लिएंडर पेस और महेश भूपति की कहानी बता रहे हैं, जो देश के युवाओं के लिए महत्वपूर्ण स्टोरी है। उनके अनुभव और कहानी बताना ज़रूरी है। स्पोर्ट्स के लिए और उभरते खिलाड़ियों के लिए। हर पार्टनरशिप के लिए, चाहे किसी क्षेत्र में हों।

 

 

 

 

 

 

 

 

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नारायण मूर्ति और सुधा मूर्ति जी पर प्रोजेक्ट कहां तक पहुंचा?

नारायण मूर्ति और सुधा मूर्ति जी का स्क्रीनप्ले अभी ख़त्म होने वाला है। पैनडेमिक की वजह से हम उनसे अभी मिल नहीं पाए। चूंकि वो बहुत बड़े इंसान हैं। स्क्रीनप्ले पढ़वाने के लिए उनसे मिलना बहुत ज़रूरी है। बेंगलुरु जाने के लिए प्लान करना है और अपॉइंटमेंट लेकर उन्हें स्क्रीनप्ले सुनाना है।

फाड़ू कब तक आ रही है? 

फाड़ू सोनी लिव के साथ आ रही है। अच्छी-अच्छी कहानियां वहां आ रही हैं। भले ही स्कैम 1992 हो या महारानी हो। फाड़ू भी ऐसी कहानी है, जिसके ज़रिए मैं अपने आप को चैलेंज करना चाहती हूं। सौम्य जोशी जी ने कहानी लिखी है, जो अहमदाबाद के बहुत बड़े कवि, लेखक और प्रोफेसर हैं। अभिजात जोशी के भाई हैं। उन्होंने कभी अपने बारे में बोला नहीं है, पर बहुत टैलेंटेड हैं। अभी प्री-प्रोडक्शन में है। पैनडेमिक कुछ कम हो जाएगा तो काम में रफ़्तार आएगी। बाक़ी प्लेटफॉर्म बताएगा कि कब आएगा।

Edited By: Manoj Vashisth