फरीदाबाद (अनिल बेताब)। चुनावी माहौल में धीरे-धीरे गर्माहट आ रही है। मौसम बदला-बदला सा है। धूप निकली हुई है। दोपहर के एक बजे हैं। बादशाह खान अस्पताल के प्रवेश द्वार पर कैंटीन में कुछ लोग चाय की चुस्कियों के बीच चुनावी चर्चा में लगे हैं। बगल में महाराजा अग्रसेन भोजनालय में भी बहुत से लोग थाली में दाल-भात खाने में मसरूफ हैं।

चुनावी चाश्‍नी का ले रहे आनंद

एक तरफ महिलाएं बच्चों के साथ खाना खा रही हैं, तो दूसरी तरफ कुछ युवक चुनावी चाशनी का स्वाद ले रहे हैं। बातचीत से पता चलता है कि यहां भोजन कर रहे अधिकांश लोग अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों के हैं। तीन-चार लोगों में चर्चा चल रही है। एक युवक कहता है कि उनके क्षेत्र के व्यापारियों ने नए नेता जी को जिताने का मन बना लिया है।

हर तरह हो रही चर्चा

पुराने नेता का समर्थन करने का कोई अच्छा अनुभव नहीं रहा। उनकी बात को काटते हुए एक कार्यकर्ता कहता है कि वह तो पार्टी से जुड़ा है, पार्टी का सिपाही है। पार्टी जिसे टिकट देगी, उसका ही साथ दिया जाएगा। यही उसका धर्म है। बातचीत का सिलसिला जारी है। अब पहले वाला युवक कहता है कि बात तो ठीक है, पार्टी के प्रति वफादारी तो होना ही चाहिए, मगर जब कोई नेता काम नहीं करेगा, उसे मजबूत क्यों किया जाए।

हर विधानसभा पर चर्चा

एक अन्य युवक अपनी बात रखता है-कहीं कोई बंधा नहीं है, विधानसभा में तो ऐसे नेता को चुनना है, जो मजबूत सरकार बनाने में मददगार साबित हो। दूसरा जवाब देता है कि हमें तो हर हाल में ऐसे नेता को आगे बढ़ाना है, जो उनके अपने क्षेत्र का हो। बातचीत चल रही है और धीरे-धीरे दाल-भात खत्म हो जाता है। भोजन करने के बाद कुछ युवक वाटर कूलर की ओर बढ़ जाते हैं।

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