जागरण संपादकीय: सरल आयकर, जटिल नियम अब आसानी से समझ पाएंगे
यह सही समय है कि उन लोगों पर निगाह दौड़ाई जाए जो समर्थ होते हुए भी आयकर नहीं देते। आखिर जो संपन्न किसान एक सीमा से अधिक आय अर्जित करते हैं उन्हें आयकर के दायरे में क्यों नहीं लाया जाना चाहिए? इसकी अनदेखी नहीं की जाए कि कृषि आय को टैक्स के दायरे से बाहर रखने के नियम का दुरुपयोग भी किया जा रहा है।
यह सराहनीय है कि 63 वर्ष पुराने आयकर कानून को बदलने के लिए एक विधेयक लोकसभा में प्रस्तुत कर दिया गया। इसके माध्यम से आयकर की भाषा को सरल बनाने के साथ ही अनावश्यक प्रविधानों को हटाया जाएगा। आयकर कानून बदलने और उसे सरल एवं सुस्पष्ट करने के प्रयास किए जा रहे हैं, इसकी पुष्टि इससे होती है कि नया आयकर विधेयक 622 पन्नों का है, जबकि मौजूदा आयकर अधिनियम में 1647 पन्ने हैं।
वित्त मंत्री की मानें तो नए आयकर कानून से कर संहिता अधिक सरल हो जाएगी और वह आयकर अधिकारियों के साथ आयकरदाताओं को भी राहत प्रदान करेगी। इससे अच्छा और कुछ नहीं कि आयकरदाताओं को जटिल नियमों के साथ आसानी से समझ न आने वाली भाषा से छुटकारा मिले।
चूंकि आयकर विधेयक को संसदीय समिति के पास भेजने का निर्णय लिया गया है, इसलिए यह आशा की जाती है कि वहां उस पर व्यापक विचार-विमर्श के दौरान उसे वास्तव में सरल रूप देने में मदद मिलेगी। इस अपेक्षा के साथ ही यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि ऐसा माहौल बनाने की आवश्यकता है, जिससे लोग स्वेच्छा से आयकर देने को प्रेरित हों और उनके मन में किसी तरह का भय न रहे।
जितना आवश्यक आयकर संबंधी नियम-कानून सरल करना है, उतना ही इसकी गुंजाइश खत्म करना भी कि आयकर विभाग लोगों से अनावश्यक रूप से न तो सवाल-जवाब कर सके और न ही किसी भूल-चूक पर उन्हें तंग कर सके। यह तब संभव होगा, जब आयकर अधिकारी आयकरदाताओं को संदेह की दृष्टि से देखना बंद करेंगे। उन्हें यह भी समझना होगा कि आयकर बचाने के उपाय अपनाने का मतलब कर चोरी करना नहीं होता।
आयकर विभाग को उन कारणों का निवारण भी करना होगा, जिनके चलते लोग आय छिपाने के जतन करते हैं। इसी के साथ ऐसी भी व्यवस्था करनी होगी, जिससे आयकर का आकलन करने और उसकी वसूली में भ्रष्टाचार न होने पाए। यह इसलिए जरूरी है, क्योंकि चंद दिनों पहले ही फेसलेस असेसमेंट योजना में सेंधमारी का मामला सामने आया।
इस मामले में आयकर विभाग के एक डिप्टी कमिश्नर को भी लिप्त पाया गया। यह भी समय की मांग है कि सरकार आयकरदाताओं की संख्या बढ़ाने के उपाय करे। यह इसलिए आवश्यक है, क्योंकि वर्तमान में आयकर देने वालों की संख्या चार करोड़ से भी कम है। इनमें मुख्यतः वे ही हैं, जो नौकरीपेशा हैं।
यह सही समय है कि उन लोगों पर निगाह दौड़ाई जाए, जो समर्थ होते हुए भी आयकर नहीं देते। आखिर जो संपन्न किसान एक सीमा से अधिक आय अर्जित करते हैं, उन्हें आयकर के दायरे में क्यों नहीं लाया जाना चाहिए? इसकी अनदेखी नहीं की जाए कि कृषि आय को टैक्स के दायरे से बाहर रखने के नियम का दुरुपयोग भी किया जा रहा है।
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