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    बच्चे, कितने अच्छे?

    By Edited By:
    Updated: Tue, 09 Oct 2012 02:52 AM (IST)

    बच्चे तो अच्छे होते ही हैं। लेकिन जनसंख्या विस्फोट के जमाने में यह सवाल पूछना ठीक लगता है कि बच्चे, कितने अच्छे? सरकारी अभियान में माना गया है कि बच्चे दो ही अच्छे। लेकिन इस अभियान की जब बिहार में पड़ताल की गई तो पता चला कि बहुमत इसके पक्ष में नहीं है। हाल में जारी स्वास्थ्य सर्वे रिपोर्ट का विश्लेषण बताता है कि राज्य में सिर्फ 46.2 फीसद महिलाएं ही इस पक्ष में हैं कि दो ही बच्चे अच्छे होते हैं। शेष महिलाएं दो से अधिक बच्चों को अच्छा मानती हैं। असल में बच्चों को लेकर कई विरोधाभासी धारणाएं एकसाथ चलती हैं। इसका नाता आर्थिक और सामाजिक संरचना से भी है। मसलन, गांव के अशिक्षित और गरीब लोगों के लिए जितने बच्चे, उतने अच्छे की धारणा थी। उनके बच्चे बोझ नहीं माने जाते थे। बच्चों के स्वास्थ्य और शिक्षा को लेकर भी उनमें अधिक चिन्ता नहीं रहती थी। इसलिए कि ये बच्चे लालन-पालन की अवस्था में ही परिवार के लिए साधन जुटाने लायक मान लिए जाते थे। सरकारी शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं के चलते गरीबों की धारणा भी पूरी नहीं तो एक हद तक बदली है। उनके मन में बच्चों को पढ़ाने-लिखाने का हौसला जगा है। शिशु मृत्यु दर अधिक थी तो लोग इस ख्याल से अधिक बच्चे पैदा करते थे कि वंश चलाने के लिए कुछ न कुछ बच्चे बचे रहेंगे। इस सोच में भी थोड़ा बदलाव आया है। आप पाएंगे कि गरीबी-अशिक्षा और जनसंख्या के बीच बहुत सीधा रिश्ता बना हुआ है। जिस घर में जितनी अधिक गरीबी, बच्चों की आमद भी उतनी ही अधिक। दूसरी तरफ समाज के शिक्षित और संपन्न लोगों के बीच यह धारणा लंबे समय से है कि बच्चे अगर कम हों तो उनकी परवरिश ठीक ढंग से होगी। लिहाजा, सामाजिक विषमता के चलते भी बच्चों की संख्या को लेकर विवाद रहा है। एक धारणा और है। यह अमीरों और गरीबों में समान रूप से है। यह है कि लड़का न हो तो मोक्ष की प्राप्ति नहीं होगी। लड़की का कन्यादान नहीं किया, तब भी मोक्ष से वंचित रहना पड़ेगा। मोक्ष के फेर में भी ज्यादा बच्चे आते रहते हैं। किसी को लड़का चाहिए। अगर पहली या दूसरी संतान लड़की पैदा हुई तो लड़के की उम्मीद में बच्चों की संख्या बढ़ती जाएगी। यही सिलसिला कन्यादान से मोक्ष पाने के मामले में भी चलता रहता है और इस सवाल का पूरा जवाब नहीं मिल पाता कि आखिर कितने बच्चे अच्छे माने जाएं। दरअसल, जनसंख्या नियंत्रण में जुटी एजेंसियां भी जड़ पर प्रहार करने से बचती रहती हैं। उनके सामने मजबूरी भी है। लोग बच्चों के मामले में सीधे ऊपर वाले को धन्यवाद देते हैं या कोसते हैं। ऐसी हालत में आम लोगों को विज्ञान की भाषा समझाना भी कम जोखिम का काम नहीं है।

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    [स्थानीय संपादकीय: बिहार]

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