बेवजह न बजाएं हॉर्न
पिछले कुछ वर्षो में राजधानी में सड़कों के विस्तार की तुलना में वाहनों की संख्या में भारी इजाफा हुआ है। यही वजह है कि रेड लाइटों और प्रमुख चौराहों पर अक्सर ट्रैफिक जाम की स्थिति बनी रहती है। खासकर सुबह और शाम के वक्त प्रमुख सड़कों पर वाहन रेंगते नजर आते हैं। मुसीबत तब और बढ़ जाती है जब आगे निकलने की होड़ में कई-कई वाहनों के चालक हॉर्न बजाने लगते हैं। कई बार हड़बड़ाहट में वाहन चालक हादसा भी कर बैठते हैं। गाड़ी के अंदर तेज आवाज में संगीत बजाना भी दुर्घटना की वजह बन जाता है।
वाहनों की बढ़ती संख्या ने दिल्ली में वायु प्रदूषण के साथ ध्वनि प्रदूषण में भी बेहिसाब इजाफा किया है। सत्तर प्रतिशत ध्वनि प्रदूषण की वजह वाहनों के हॉर्न के रूप में निकलने वाली आवाज है। ध्वनि प्रदूषण को लेकर वाहन चालकों समेत आम लोगों को भी जागरूक करने के उद्देश्य से पहली जनवरी को राजधानी में 'नो हॉनकिंग डे' मनाया गया। यह एक सराहनीय एवं अनुकरणीय पहल है। अभियान के तहत लोगों को बताया गया कि बेवजह हॉर्न बजाने की आदत भी एक किस्म की बीमारी है। साथ ही वाहन चालकों को ध्वनि प्रदूषण से होने वाली समस्याओं जैसे सिर दर्द, चिड़चिड़ापन, अनिद्रा, उच्च रक्तचाप और काम में मन न लगना आदि के बारे में जानकारी दी गई। ध्वनि प्रदूषण का सबसे ज्यादा प्रतिकूल प्रभाव छोटे बच्चों पर पड़ता है। इससे उनमें ऊंचा सुनने के साथ बहरेपन की भी समस्या हो सकती है। यातायात के नियमों का पालन कराने के लिए हर चौक-चौराहों और रेड लाइट पर ट्रैफिक पुलिसकर्मियों की तैनाती की जाती है। नियम तोड़ने वालों से जुर्माना वसूला जाता है और कार्रवाई होती है। लेकिन महज कड़े कानून बनाने व पुलिसकर्मियों की मौजूदगी से समस्या का समाधान नहीं होने वाला। जरूरत इस बात की है कि वाहन चालक भी यातायात नियमों का कड़ाई से पालन करें और सड़क पर दूसरे लोगों के अधिकारों का सम्मान करें। मानक से अधिक आवाज करने वाले हॉर्न वाहनों में लगाना कानून का उल्लंघन तो है ही इसकी तेज आवाज सेहत के लिए भी काफी नुकसानदेह है। लोगों को खुद सही लेन चुनकर उसमें वाहन चलाने की आदत डालनी होगी और ओवरटेकिंग के लिए बेवजह हॉर्न बजाना छोड़ना होगा। ऐसा करने से ही सड़क पर यातायात सुगम हो सकेगा और सफर सुहाना।
[स्थानीय संपादकीय: दिल्ली]
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