Trending

    Move to Jagran APP
    pixelcheck
    विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

    विश्वास की बहाली

    By Edited By:
    Updated: Thu, 26 Feb 2015 05:27 AM (IST)

    पिछले साल 20 मई से लेकर इस साल 20 फरवरी तक बिहार की राजनीति में जबरदस्त संक्रमण का दौर रहा है। जनता-

    पिछले साल 20 मई से लेकर इस साल 20 फरवरी तक बिहार की राजनीति में जबरदस्त संक्रमण का दौर रहा है। जनता-जनार्दन के हवाले से सत्ता और सियासत ने इतने अधिक विरोधाभास पैदा कर दिए कि अंतत: विश्वास का संकट खड़ा हो गया। विषम स्थिति यह कि विश्वास का यह संकट दोहरा है। संकट लोक के साथ भी और तंत्र के साथ भी। मुकम्मल तौर पर इसे लोकतंत्र का संकट कह सकते हैं। बहरहाल, संक्रमण का वह दौर टल चुका है, लेकिन संकट से मुकम्मल तौर पर पीछा नहीं छूटा है। अभी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए कठिन चुनौती की घड़ी है। उम्मीद है कि अपने प्रशासनिक अनुभव, राजनीतिक परिपक्वता और जनोन्मुखी कार्यक्रमों के बूते वह बिहार की गाड़ी को यथाशीघ्र सुशासन की पटरी पर ले आएंगे।

    विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

    मौजूदा स्थिति में नीतीश कुमार को तीन मोर्चो पर विश्वास की बहाली करनी होगी। पहला, जनता के साथ; दूसरा, व्यवस्था के साथ और तीसरा, संगठन के साथ। सोचने-समझने में यह जितना आसान कार्य प्रतीत होता है, निर्वहन-निष्पादन में उतना ही दुष्कर। बावजूद इसके नीतीश कुमार के साथ 'सरकार के इकबाल' से जुड़ी एक सापेक्ष स्थिति है, जो कभी उन्हीं की बदौलत हुआ करती थी और जिसके दोबारा उन्हीं की बदौलत कायम होने की उम्मीद है। चौथी बार सूबे की बागडोर संभालते ही अपने तेवरों से उन्होंने इसका अहसास भी करा दिया है, लेकिन विरोधी और बागी खेमे की मोर्चाबंदी से जाहिर होता है कि जनता के एक छोटे समूह के बीच ही सही, भ्रम की स्थिति पैदा होने की गुंजाइश है और उसके नियामक तत्व अति सक्रिय हैं। दरअसल, यह जातीय समीकरणों का घेरा है, जिसके दायरे की राजनीति से आज किसी भी दल को परहेज नहीं। नीतीश कुमार को इस मोर्चे पर बिल्कुल ही सचेत रहना होगा और इस संदर्भ में जनहित से जुड़े निर्णयों से पूर्वाग्रह को दरकिनार रखना होगा। सुखद यह कि सत्ता संभालते ही नीतीश कुमार यह एलान कर चुके हैं कि उनके निर्णय पूर्वाग्रह से परे होंगे। दूसरा मोर्चा व्यवस्था का है। सकारात्मक रुख और सक्रिय योजना के बूते यहां भी इत्मीनान की स्थिति बन सकती है। सचिवालय में तय समय तक सरकार की मौजूदगी उन बाबुओं को भी फाइलों को उलटने-पलटने के लिए बाध्य कर देती है, जो महज जी-हुजूरी के कारण रौब-दाब के हकदार बने हुए हैं। नौ महीने बाद राज्य सचिवालय में ऐसी स्थिति कायम हो रही है। संदेश साफ है कि नतीजा देने वाले खुद्दार अफसर ही व्यवस्था में अग्रणी होंगे। परिणाम और पारितोषिक में कोई अंतद्र्वद्व नहीं होगा। मंगलवार को शीर्षस्थ 23 अफसरों के दायित्वों में परिवर्तन संभवत: इस कड़ी की शुरुआत है। संभवत: आने वाले दिनों में कानून के राज की कुछ और ढीली कड़ियां कसी जा सकती हैं। विधि-व्यवस्था के लिए जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक को सीधे जिम्मेदार ठहराकर नीतीश कुमार ने इस मोर्चे पर अपनी नीयत साफ कर दी है। तीसरा मोर्चा सर्वाधिक संवेदनशील है। यह संगठन से जुड़ा मामला है। अतिरेक के लिए यहां तनिक भी गुंजाइश नहीं होती। मौजूदा स्थिति में तो अतिशयता बिल्कुल ही घातक होगी। नीतीश कुमार इस सच्चाई को बखूबी समझ रहे हैं और इसीलिए सांगठनिक स्तर पर तत्काल ऐसा कोई भी नाजुक निर्णय नहीं लिया जा रहा, जो भविष्य में संभावनाओं के द्वार बंद कर दे। सत्ता को लेकर चली खींचतान में बाजी अंतत: नीतीश कुमार के हाथ लगी है, लेकिन विधानसभा के आसन्न चुनावों में जीत सुनिश्चत करने के लिए उन्हें सत्ताधारी जदयू के साथ जनता दल परिवार की एकता को बरकरार रखना होगा। नीतीश कुमार साइलेंट वर्कर हैं और संभवत: इसीलिए वे कोई भी निर्णय लेने से पहले खामोशी के साथ विरोधियों और बागियों के छल-बल का आकलन कर रहे हैं।

    [स्थानीय संपादकीय: बिहार]