विचार: बच्चों के सीखने का जरिया हैं खेल
ऐसा करके हम केवल बचपन को सुरक्षित ही नहीं करते, बल्कि हम सभी के लिए एक स्वस्थ, खुशहाल और उम्मीदों से भरे भविष्य का निर्माण करने में मदद करते हैं।
HighLights
खेल बचपन में एकाग्रता, धैर्य और आत्मविश्वास सिखाते हैं।
खेल-आधारित शिक्षा मस्तिष्क के विकास और कौशल निर्माण में सहायक।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति बच्चों के लिए खेल को महत्वपूर्ण मानती है।
सचिन तेंदुलकर। हर बचपन कुछ जानी-पहचानी आवाजों से गूंजता है। धूल भरे मैदानों पर गेंद के गिरने की धमक। तंग गलियों में दौड़ते बच्चों की हंसी। रस्सी कूदने की लय, कंचों की खनक और ढेर सारे गीत-कहानियां। खेल-खेल में बच्चों की दुनिया को समझना ही सीखने की प्रक्रिया की सबसे पहली शुरुआत है। मुझे याद है, जब मैं छोटा था, तो घंटों अपने कोच की देखरेख में खेला करता था। वे स्टंप्स पर एक रुपये का सिक्का रख देते थे और गेंदबाजों को मुझे आउट करने की चुनौती देते थे। अगर वे मुझे आउट कर देते, तो सिक्का उनका और अगर मैं नाबाद रहता, तो वह मेरा होता। वे सिक्के आज भी मेरी सबसे अनमोल धरोहर हैं। उन्होंने मुझे एकाग्रता, धैर्य और खुद को बेहतर बनाने का दृढ़ संकल्प सिखाया। स्कोरबोर्ड, बड़े स्टेडियमों और अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की दुनिया में पहुंचने से बहुत पहले, मैंने खेल के जरिये ही सब कुछ सीखा। नेतृत्व को समझने से पहले मैंने टीम के साथ मिलकर काम करना सीखा। खेल में हारकर मैंने मुश्किलों से उबरना सीखा और बार-बार कोशिश करके आत्मविश्वास बढ़ाया।
दुनिया भर के लाखों बच्चों की तरह मैंने भी यह महसूस किया कि खेल सिर्फ मनोरंजन नहीं है, बल्कि यह खुद जीवन की तैयारी है। यूनिसेफ के साथ जुड़ने के बाद मुझे लगता है कि यह संदेश पहले से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है। आज पूरी दुनिया में बचपन बदल रहा है। खुले मैदान कम हो रहे हैं। पढ़ाई के बढ़ते बोझ और आनलाइन बिताए जाने वाले समय की वजह से बच्चों के लिए खुलकर खेलने, खुलकर कल्पना करने और आपस में मिलने-जुलने के अवसर कम होते जा रहे हैं। न्यूरोसाइंस और सीखने का विज्ञान पुष्टि करते हैं कि जब बच्चे खेलते हैं, तो वे जीवनभर के लिए सीखते हैं। खेल के जरिये वे भाषा सीखते हैं, अपनी एकाग्रता बढ़ाते हैं, भावनाओं पर काबू पाना सीखते हैं, समस्याओं को सुलझाने का अभ्यास करते हैं और दूसरों के साथ घुलना-मिलना सीखते हैं।
जीवन के पहले आठ साल मानव विकास के सबसे महत्वपूर्ण चरणों में से हैं। इन वर्षों के दौरान मस्तिष्क का विकास जीवन के किसी भी अन्य चरण की तुलना में सबसे तेजी से होता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ के नर्चरिंग केयर फ्रेमवर्क के शोध से पता चलता है कि मस्तिष्क का 85 प्रतिशत से अधिक विकास छह साल की उम्र से पहले ही हो जाता है। यही शुरुआती साल शारीरिक स्वास्थ्य, भावनात्मक सुरक्षा, भाषा, जिज्ञासा, आत्मविश्वास और सामाजिक समझ की नींव रखते हैं। यही वे वर्ष हैं, जब बच्चों में सुनने, संवाद करने, ध्यान केंद्रित करने, याद रखने, तर्क करने और पढ़ने-लिखने और गणित की बुनियादी समझ जैसी महत्वपूर्ण क्षमताएं विकसित होती हैं। इसी दिशा में भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीति छोटे बच्चों के लिए खेल-आधारित शिक्षा के महत्व को स्वीकार करती है। यह सोच में आया एक बड़ा बदलाव है, जो आंगनवाड़ी और शुरुआती कक्षाओं में खेल को बुनियादी शिक्षा का केंद्र बनाता है। अब कक्षाएं तेजी से ऐसी बनती जा रही हैं, जहां बच्चे गतिविधियों और खेल-खेल में सीखते हैं।
जब गणित के जोड़ को कंचों के साथ खेल-खेल में सिखाया जाता है, तो वह मजेदार हो जाता है। इसी तरह, रोल-प्ले (नाट्य रूप) के जरिये भाषा और आत्मविश्वास बढ़ता है और अपने आसपास की दुनिया को देखकर आकृतियों और रंगों की समझ बेहतर होती है। गीत, कहानियां और शारीरिक गतिविधियां पाठों में जान डाल देती हैं, जिससे कक्षाएं जिज्ञासा, सहभागिता और सीखने के उत्साह से भरी जीवंत जगह बन जाती हैं। खेल-खेल में सीखने का सिलसिला स्कूल के बाद भी जारी रहता है-चाहे घर पर हो, गलियों में हो या खेल के मैदान में। इसके लिए महंगे खिलौनों या बड़े बुनियादी ढांचे की जरूरत नहीं होती। एक मां का बच्चे को खाना खिलाते हुए लोरी सुनाना, दादाजी का पेड़ के नीचे बैठकर कहानियां सुनाना, भाई-बहनों का घर की चीजों से नए खेल खेलना या पिता का अपने बच्चे के साथ टहलते हुए उसे पक्षियों, रंगों और आवाजों के बारे में बताना-ये सभी सीखने के बेहतरीन अवसर हैं। इन पलों में बच्चे अपनी शब्दावली, एकाग्रता, याददाश्त, कल्पना और आपसी रिश्तों को मजबूत करते हैं। यही वह बुनियाद है, जिस पर आगे की शिक्षा टिकी होती है।
अगर हम चाहते हैं कि बच्चे सही मायने में विकसित हों, तो खेल को केवल एक विकल्प नहीं रहने दिया जा सकता। हमें इसे सुरक्षित रखना होगा, बढ़ावा देना होगा और हर बच्चे के जीवन का अनिवार्य हिस्सा बनाना होगा-घर में भी और स्कूल में भी। यह हम सबकी जिम्मेदारी है। हमें बचपन को उसी रूप में देखना होगा, जैसा वह वास्तव में है। एक आनंदमय और कीमती पड़ाव, जिसे देखभाल, सुरक्षा और आगे बढ़ने के अवसरों की जरूरत है। एक ऐसे व्यक्ति के रूप में जिसका जीवन खेलकूद के जरिये गहराई से संवरा है, मैं इसकी शक्ति को भलीभांति समझता हूं। आइए, हम सब मिलकर एक सचेत निर्णय लें। बच्चों को खेलने, नई चीजें खोजने और बस बच्चे बने रहने का समय, स्थान और भरोसा दें। ऐसा करके हम केवल बचपन को सुरक्षित ही नहीं करते, बल्कि हम सभी के लिए एक स्वस्थ, खुशहाल और उम्मीदों से भरे भविष्य का निर्माण करने में मदद करते हैं।
(प्रख्यात क्रिकेटर दक्षिण एशिया के लिए यूनिसेफ के क्षेत्रीय राजदूत भी हैं)


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