[ केसी त्यागी ]: हरियाणा, महाराष्ट्र एवं झारखंड विधानसभा चुनावों के मद्देनजर किसानों के बीच रबी फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्यों यानी एमएसपी में उत्साहजनक बढ़ोतरी को लेकर आस जगी थी, लेकिन कृषि मंत्रालय द्वारा रबी फसलों के लिए प्रस्तावित एमएसपी में पांच से सात फीसद तक की बढ़ोतरी किसानों की उम्मीदों पर पानी फेरने जैसा कदम है।

गेहूं, जौ, सरसों पर एमएसपी में बढ़ोतरी नाकाफी

दरअसल कृषि मंत्रालय द्वारा गेहूं, जौ, सरसों, मसूर तथा सूरजमुखी के एमएसपी में क्रमश: 4.61 फीसद, 5.9 फीसद, 5.35 फीसद, 7.26 फीसद और 5.4 फीसद की बढ़ोतरी की गई है। ज्ञात हो कि पिछले मौसम के दौरान इनका समर्थन मूल्य प्रति क्विंटल क्रमश: 1840 रुपये, 1440 रुपये, 4200 रुपये, 4475 रुपये तथा 4945 रुपये था। गत वर्ष की कीमतों को आधार मानकर देखें तो नि:संदेह मंत्रालय ने इस वर्ष एमएसपी में औसतन चार से सात फीसद तक की बढ़ोतरी की है, लेकिन यह नाकाफी भी है और किसानों की आय दोगुनी किए जाने के प्रधानमंत्री के आश्वासन को धूमिल करती भी प्रतीत हो रही है।

खरीफ फसल के लिए एमएसपी में बढ़ोतरी नाकाफी

वर्ष 2019-20 के लिए खरीफ फसल-धान, मूंग, उड़द तथा कपास के एमएसपी में भी प्रति क्विंटल क्रमश: 65, 75, 100 एवं 100 रुपये की बढ़ोतरी की गई है। खरीफ वर्ष 2018-19 के लिए साधारण धान के एमएसपी में 200 रुपये प्रति क्विंटल का इजाफा नि:संदेह उत्साहित करने वाला रहा था। लंबे अर्से के बाद इसकी कीमत 1750 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित की गई थी जो कि घोषित 1166 रुपये के लागत मूल्य से 50.09 फीसद अधिक थी। इससे पहले के वर्षों में एमएसपी में सिर्फ 50 से 60 रुपये प्रति क्विंटल जैसी सांकेतिक बढ़ोतरी ही प्रचलन में रही थी। नई कीमतों में आंकड़ों के लिहाज से वृद्धि जरूर हुई है, लेकिन प्रति वर्ष लागत मूल्यों में हो रही बढ़ोतरी की तुलना में यह नाम मात्र ही है।

2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने के प्रयासों में ठोस पहल नहीं

प्रधानमंत्री ने 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने का वादा किया है, लेकिन कृषि मंत्रालय के अब तक के प्रयासों में कोई ठोस पहल देखने को नहीं मिली है। फसलों का उचित मूल्य न मिल पाना और साथ ही लागत मूल्यों में निरंतर वृद्धि होते रहना उनकी आमदनी में दोगुनी वृद्धि का संकेत नहीं दे रहे हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार अधिकांश दलहन एवं तिलहनों की थोक कीमत अपनी तीन वर्ष पूर्व की कीमत से लगभग 15 से 30 फीसद के निचले स्तर पर है। फसलों के लिए निर्धारित एमएसपी भी न मिल पाना किसानों के लिए लंबे समय से बड़ी समस्या बनी हुई है। सिरिल की एक रिपोर्ट के अनुसार किसानों को धान, रागी, बाजरा, मूंग, उड़द, अरहर, सोयाबीन, सरसों आदि निर्धारित एमएसपी से कम कीमतों पर बेचना पड़ा है।

मांग में वृृद्धि न होने के कारण कृषि उत्पादों की कीमतों में गिरावट

हालिया वर्षों में देश में फसल उत्पादन में भारी वृद्धि हुई है। इसके अनुरूप मांग में वृृद्धि न होने के कारण कृषि उत्पादों की कीमतों में गिरावट भी देखी गई है। इसके साथ ही खेती में इस्तेमाल होने वाली सभी सामग्रियों की कीमतों में वृद्धि दर्ज हुई है। आरबीआइ की एक रिपोर्ट के अनुसार डीजल का थोक मूल्य सूचकांक यानी डब्ल्यूपीआइ वर्ष 2016 में 65 था जो अब बढ़कर 94 तक पहुंच गया है। कीटनाशकों का डब्ल्यूपीआइ पिछले तीन वर्षों में 110 से 120 तक पहुंच गया है। इसी तरह पिछले तीन वर्षों के दौरान ट्रैक्टर, बिजली, मवेशियों के चारे, मजदूरी आदि की दरों में भी प्रतिवर्ष लगभग पांच से 10 फीसद की बढ़ोतरी देखी गई है। गत वर्षों के दौरान कृषि मजदूरी में भी लगभग 15 फीसद की वृद्धि आंकी गई है। खासकर मजदूरी और खाद के मोर्चे पर बढ़ी महंगाई ने किसानों को सबसे ज्यादा परेशान किया है। इस सूरत में कृषि मूल्य एवं लागत आयोग को जमीनी सच्चाई को समझते हुए लागत मूल्य निर्धारण करने की आवश्यकता है।

स्वामीनाथन आयोग की अनुशंसा पर परहेज 

मौजूदा सरकार ने फसलों की कीमत को डेढ़ गुना करने वाला अपना वादा निभाने का प्रयास भर किया है, लेकिन एमएस स्वामीनाथन आयोग की अनुशंसा अनुसार फसलों का एमएसपी तय करने से अब तक परहेज ही किया है। वर्तमान लागत मूल्य निर्धारण प्रक्रिया के तहत ए-2 एफ-एल को आधार बनाकर फसलों की लागत मूल्य के अनुपातिक एमएसपी बढ़ाया गया है, जबकि किसान संगठनों की मांग रही है कि सी-2 प्रणाली को आधार बनाकर लागत मूल्य निर्धारित किया जाए और इस पर 50 फीसद का अतिरिक्त लाभ दिया जाए। स्पष्ट है कि गतिरोध लागत मूल्य निर्धारण प्रक्रिया को लेकर ही है। प्रक्रिया ए-2 एफ-एल के तहत खेती में उपयोग होने वाली सभी वस्तुएं जैसे-बीज, उर्वरक, कीटनाशक, मजदूरी, मशीनों का किराया तथा पारिवारिक श्रम शामिल होती हैं जबकि सी-2 व्यवस्था में अन्य लागतों के साथ भूमि का किराया भी जोड़ा जाता है। इसके तहत लागत मूल्य निर्धारण से किसानों को मिलने वाले दाम और मौजूदा व्यवस्था के तहत मिलने वाले दाम में बड़ा अंतर है।

किसान को हर हाल में घाटे का सामना करना पड़ता है

अपने यहां एक समस्या यह भी है कि किसान को हर हाल में घाटे का सामना करना पड़ता है। उत्पादन अच्छा हो तब भी और न हो तब भी। लगभग प्रत्येक वर्ष आलू, प्याज, टमाटर, हरी मिर्च और मौसमी सब्जियां आदि औने-पौने दामों पर बेच दी जाती हैं और जब वह दाम भी नहीं मिलता है तो रोष स्वरूप किसान उन्हें सड़कों पर फेंक देते हैैं। वहीं शांता कुमार कमेटी की रिपोर्ट में यह बात कही गई थी कि मात्र छह प्रतिशत किसान ही एमएसपी से लाभान्वित हो पाते हैं। वर्ष 2016-17 की एक रिपोर्ट के अनुसार देश भर में उत्पादित गेहूं एवं चावल का क्रमश: 23 एवं 35 फीसद हिस्सा ही सरकारी एजेंसियों द्वारा खरीदा गया था। कृषि मंत्रालय भी इस तथ्य को स्वीकार करता है कि किसानों को निर्धारित एमएसपी नहीं मिल पाता है। इससे एमएसपी प्रणाली के क्रियान्वयन का अंदाजा लगाया जा सकता है। भंडारण क्षमता एवं भारतीय खाद्य निगम (एफसीआइ) की क्रियान्वयन प्रक्रिया भी सवालों के घेरे में रही है।

प्रतिवर्ष खेती का रकबा घट रहा

इनका प्रतिकूल असर यह है कि प्रतिवर्ष खेती का रकबा घट रहा है। किसान तेजी से मजदूर बन रहे हैं और रोजगार की तलाश में गांवों से पलायन जोरों पर है। चूंकि वैश्विक मंदी के कारण शहर पहले से बेरोजगारी की मार झेलने को मजबूर हैं, ऐसे में एक बार फिर से खेती-बाड़ी में जान फूंकने जैसी कवायद ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था को पुन: पटरी पर लाने में कामयाब हो सकती है जिससे पलायन पर भी काबू पाया जा सकेगा। कुल मिलाकर लाभकारी एमएसपी के निर्धारण एवं क्रियान्वयन, उचित मुआवजा, ऋण, कृषि सब्सिडी, किसान पेंशन आदि सुविधाएं इस दिशा में कारगर साबित हो सकती हैं।

( लेखक जदयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं )

Posted By: Bhupendra Singh

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