जागृति
उपनिषद का महावाक्य है-उत्तिष्ठ! जाग्रत! प्राप्यवरान् निबोधत्! उठो, जागो और श्रेष्ठ ज्ञानी जनों की शरण में जाकर बोध प्राप्त करो। सदियों से हमारे देश के ऋषि-मुनियों ने यही तो किया, नगर-घर द्वार पहुंचकर मानव को जीवन संचेतना का पाठ पढ़ाया, यह बताने का प्रयास किया कि जीवन अस्तित्व से अधिक कर्म है। इसकी पगडंडी पकड़कर इसके सहारे उस अमृत तत्व को प्राप्त करो, जिसे पाने के बाद कुछ शेष नहीं रह जाए। उन्होंने यह बताने का हमेशा ही हर समय, हर युग में प्रयास किया है कि जीवन क्षणभंगुर है, शाश्वत है तो वह परमात्मतत्व, जिसे पाना हमारे जीवन का अंतिम ध्येय होना चाहिए। इसीलिए वेदों में प्रार्थना है कि हे प्रभो! आप हमें बार-बार प्रबुद्ध कर जगाओ। इसलिए अभी उठ खड़े हो जाइए, परमानंद की झलक पाने के लिए जीवन को नियमों में बांध लीजिए। जीवन में अपने लक्ष्य की प्राप्ति भी वही कर पाता है जो जगा होता है। जो सोता है, जो अकर्मण्य है, जिसकी चेतना का विकास नहीं है वह अपना सब कुछ देखते ही देखते खो देता है। यह जानना आवश्यक है कि जगना आखिर है क्या? तो मानस में कहा गया है-''जानिअ तबहिं जीव सब जागा। जब सब विषय विलास विरागा॥'' तभी जानें कि जीव जगा हुआ है- जब वह सब प्रकार के विषयों से, विलास से वैराग्य प्राप्त कर ले। यानी राग-द्वेष-आसक्ति जब सब कुछ मिट जाए अन्यथा नहीं। उद्दालक ऋषि ने अपने पुत्र श्वेतकेतु को ब्रह्मज्ञान का उपदेश करते हुए इसे दोहराया है। इसके बाद श्वेतकेतु के हृदय में ज्ञान का उदय हो गया था। वह परमतत्व शुद्ध, बुद्ध और मुक्त स्वभाव वाला है। वह तो सच्चिदानंद है। अपने जीवन में कुछ सजगता, कुछ सतर्कता लाकर हम उस मंजिल तक पहुंच सकते हैं, क्योंकि यह मानव देह ही है जिसे यह सौभाग्य उसकी अनुकंपा से प्राप्त है। यदि इस बार भी चूक गए तो फिर वही चक्कर, वही चक्र। इसलिए उठो! जागो और उस परमानंद के एक-एक क्षण की झलक पाने के लिए उसे अनुभूत करने के लिए अभी चल पड़ो।
[आचार्य अनिल वत्स]
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