उपनिषद कहते है-चरैवेति, चरैवेति अर्थात् चलते रहो। चलते रहने का नाम जीवन है। हर स्थिति और परिस्थिति में आगे ही बढ़ते जाने का नाम जीवन है। जीवन में निराश और हताश होकर लक्ष्य की प्राप्ति नहीं की जा सकती। जो हमारा समय निकल गया उसकी चिंता छोड़े। जो जीवन शेष बचा है उसके बारे में विचार करे। इस बचे हुए जीवन की धारा को धीरे-धीरे भौतिक जगत से अध्यात्म में लाने की जरूरत है। हममें बहुत से लोग शायद कर्म या भाग्य को न भी मानें, पर हम सबका अधिकार केवल कर्म करना, सदाचार और अनुग्रह करने का ही है। शुभ कर्म करना ही अपने आप में एक तृप्ति है। जब तक हम सोते रहेंगे तो हमारा भाग्य भी सोता रहता है और जब हम उठकर चल पड़ते है, तो हमारा भाग्य भी साथ हो लेता है। गीता का सर्वप्रिय और सर्वविदित उपदेश भी यही है कि फल की चिंता किए बिना सत्कर्मो में प्रवृत्त हो जाएं और अपने इस देव दुर्लभ मानव जीवन को सफल करे।

हमारे मनीषी बताते है कि भाग्य को केवल आलसी कोसा करते है और पुरुषार्थी आलस्यरहित रहना ठीक समझता है। साधारणतया जिसे हम भाग्य या प्रारब्ध कहते है वह हमारे पूर्व-संचित कर्म ही होते है। घर के अंदर पलंग पर पड़े-पड़े हम केवल कमरों को ही देख सकते है। जंगल का शेर भी जब तक अपने भोजन के लिए स्वयं प्रयास नहीं करता, तब तक उसका पेट नहीं भरता। यह संसार तो कर्म करने की भूमि है और हम हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहेगे तो कोई भी काम सिद्ध नहीं होने वाला है। मनुष्य एक विचारशील प्राणी है और मानव जीवन दुर्लभ और अमूल्य माना गया है। जो ईश्वर पर विश्वास रखकर कर्म और पुरुषार्थ करते है उन्हे सफलता मिल जाती है। संसार का बनना-बिगड़ना ईश्वर के ही अधीन है। ईश्वर का हर काम नियमानुसार होता है। ईश्वर का सान्निध्य पाकर, पुरुषार्थी बनकर, कर्म करते हुए हम सुखी रह सकते है।

[लाजपतराय सभरवाल]

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