सामंजस्य
एक सफल और सार्थक जीवन के लिए समझ और समझौता बहुत जरूरी है। व्यक्ति यदि समझौता करना नहीं जानता, तो छोट
एक सफल और सार्थक जीवन के लिए समझ और समझौता बहुत जरूरी है। व्यक्ति यदि समझौता करना नहीं जानता, तो छोटी-छोटी घटनाएं भी विकराल बन जाती हैं। समझौते के बगैर दुनिया में कभी काम नहीं चलता। महायुद्ध होता है, बड़ी-बड़ी लड़ाइयां होती हैं, वहां भी आखिर में समझौते और संधि के लिए टेबल पर बैठना पड़ता है। सामान्य आदमी भी अगर कोई आग्रह लेकर बैठ जाए, किसी और को न सुने, तो समस्या उलझती ही चली जाती है। इसलिए सामंजस्य और समन्वय करना जरूरी है। ऐसा करके ही व्यक्ति परिवार और समुदाय के साथ चल सकेगा। सामंजस्य, समझौता और व्यवस्था-इन तीनों से भी अधिक महत्वपूर्ण सूत्र है सहिष्णुता। यह पारस्परिक सौहार्द और शांतिपूर्ण जीवन का आधार है। समस्या यह है कि आज आदमी एक दूसरे को सहन करना नहीं जानता। बड़ों की बात छोड़ दें, तीन-चार वर्ष का छोटा बच्चा भी सहन करना नहीं जानता। उसके मन के प्रतिकूल बात होती है, तो वह इतना उबल पड़ता है कि शांति भंग हो जाती है। एक-दूसरे को सहन किए बिना दो व्यक्ति साथ कैसे रह सकते हैं? जब तक सहिष्णुता का विकास नहीं होता, तब तक परस्पर शांति के साथ रहने की कल्पना भी नहीं की जा सकती। एक-दूसरे की कमजोरी और असमर्थता को सहन करना, अल्पज्ञता और मानसिक अवस्था को सहन करना, दूसरे की कठिनाई और बीमारी को सहन करना परिवार और समाज की शांति के लिए आवश्यक है। आज सहिष्णुता का अर्थ गलत समझ लिया गया है। सहिष्णुता का अर्थ न कायरता है, न कमजोरी और न दब्बूपन। सहिष्णुता महान शक्ति है। बहुत शक्तिशाली आदमी ही सहिष्णु हो सकता है। कमजोर आदमी कभी सहिष्णु नहीं हो सकता। कमजोर सहन कर ही नहीं सकता। सहन करने का मतलब है विकास, शौर्य और पराक्रम का विकास। अगर घर का मुखिया सहिष्णु नहीं है, तो परिवार बिखर जाएगा। यही स्थिति संस्थाओं, संगठनों, समाज और सरकार के मुखियाओं पर लागू होती है। साथ में कैसे रहा जाए, यह एक बड़ी कला है, जो इस कला को नहीं जानते, वे साथ रहने का आनंद नहीं ले पाते। जो बहुत कुछ पढ़ जाने पर भी इस कला को नहीं पढ़ता, नहीं सीखता, वह शांति के साथ कभी नहीं जी सकता। शांति और सौहार्दपूर्ण जीवन के लिए सहिष्णुता के साथ विनय और वात्सल्य भी आवश्यक है। विनय भारतीय संस्कृति का प्राणतत्व रहा है।
[ललित गर्ग]
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