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    संकल्प

    By Edited By:
    Updated: Tue, 30 Dec 2014 06:00 AM (IST)

    मनुष्य का विकास और भविष्य उसके स्वयं के विचारों पर ही निर्भर है। मनुष्य जैसा सोचता है और जैसा आचरण क

    मनुष्य का विकास और भविष्य उसके स्वयं के विचारों पर ही निर्भर है। मनुष्य जैसा सोचता है और जैसा आचरण करता है, कालांतर में वह वैसा ही हो जाता है। जैसे विचार होंगे उसी तरह से कर्म करेंगे, उसी तरह की परिस्थितियां बन जाएंगी। कहा जा सकता है कि मनुष्य अपनी परिस्थितियों का दास नहीं है, बल्कि वह उनका निर्माता, नियंत्रणकर्ता और स्वामी है। जीवन में प्रत्येक व्यक्ति सफलता प्राप्त करना चाहता है। किसी कार्य में प्राण, मन और समग्र शक्ति के साथ जुट जाना ही संकल्प शक्ति है। आपका कोई भी उद्देश्य क्यों न हो, अपनी संकल्प-शक्ति द्वारा पूर्ण हो सकता है। प्रत्येक व्यक्ति के अंदर एक ऐसा शक्ति केंद्र मौजूद है जो उसे उसकी इच्छानुसार उच्च शिखर पर पहुंचा सकता है। मनुष्य की समस्त शक्ति एक लक्ष्य की ओर लगती है तो फिर सफलता प्राप्ति में संदेह नहीं रह जाता। व्यक्ति को अपनी शक्ति को पहचानना आवश्यक है। अपने लक्ष्यों और उद्देश्यों को एक चुनौती के रूप में स्वीकार करना चाहिए। समय आने पर मात्र पश्चाताप ही बचता है। संकल्प-शक्ति के लिए आवश्यक है-लगन, कर्मण्यता और आत्मविश्वास। जो व्यक्ति किसी की प्रतीक्षा न कर स्वयं पुरुषार्थ में संलग्न होते हैं वे अपनी संकल्प शक्ति से लक्ष्य को अवश्य प्राप्त करते रहते हैं। अपने को असमर्थ, अशक्त और असहाय नहीं समझना चाहिए। शक्ति का स्नोत साधनों में नहीं है, संकल्प में है।

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    संकल्प शक्ति से अल्प साधनों में भी मनुष्य अधिकतम विकास कर सकता है। सतत परिश्रम और लक्ष्य से ही भाग्य बनता है। इच्छा एक प्रबल शक्ति है। संकल्प की मजबूती, धैर्य और साहस से मनुष्य जीतता है। सफलता का मूल मनुष्य की इच्छा शक्ति में सन्निहित रहता है। मनुष्य की वास्तविक शक्ति उसकी इच्छा शक्ति है। अगर इच्छा नहीं है तो कर्म नहीं है और इच्छा है तो कर्र्मों का होना अनिवार्य है। सभी इच्छाएं संकल्प की सीमा का स्पर्श नहींकर पातीं, क्योंकि उनमें पूर्ति का बल नहीं होता, किंतु इच्छाएं बुरे विचार और दृढ़ भावना द्वारा जब परिष्कृत हो जाती हैं तो संकल्प बन जाती हैं। अनेक संकल्प-विकल्प इस जगत में विद्यमान हैं, किंतु उनका लाभ तब मिल पाता है जब वह विशेष मनोयोगपूर्वक किसी एक इच्छा की ओर प्रवृत्त होता है। संकल्प के अभाव में शक्ति का कोई महत्व नहीं है, किंतु शक्ति के अभाव में संकल्प भी पूरे नहीं होते हैं। संकल्प के साथ शक्ति को संयुक्त करना भी एक हुनर है।

    [मृदुल कुमार पांडेय]