नई दिल्ली (मनु त्यागी)। जी हां, केले के तने से तैयार इस ईको फ्रेंडली सैनेटरी पैड को 121 बार या दो साल तक इस्तेमाल किया जा सकता है। इसकी कीमत महज 199 रुपये है। जबकि सब्सिडीयुक्त सामान्य पैड पर दो साल में ग्रामीण महिलाओं को करीब 1800 रुपये खर्च करने पड़ते हैं। बाजार में उपलब्ध ब्रांडेड पैड पर तो यह राशि दोगुने तक पहुंच जाती है।

पैड को जलाने के अलावा नहीं है कोई उपाय

आपको यह जानकर हैरत होगी कि हर साल तकरीबन एक लाख आठ हजार टन कूड़ा सिर्फ सैनेटरी पैड का होता है। इसका जैविक निस्तारण नहीं हो सकता है। जलाने के अलावा कोई और उपाय नहीं है। एक पैड में चार पॉलीथिन के बराबर प्लास्टिक होती है। यह प्लास्टिक मैटीरिटल न केवल महिलाओं बल्कि पर्यावरण की सेहत के लिए भी खतरे का सबब है। वहीं आज भी हमारे देश में ऐसी लाखों महिलाएं हैं, जो महीने के उन दिनों में सैनेटरी पैड का इस्तेमाल ही नहीं करतीं। आज भी महिलाएं पुराने तौर तरीके अपना रही हैं, जो स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह साबित होता है। कुछ महिलाएं गरीबी की वजह से सैनेटरी पैड नहीं खरीद पातीं हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों तक में सरकार की ओर से सब्सिडी देकर पैड उपलब्ध कराए जा रहे हैं।

आइआइटी के दो छात्रों ने स्‍टार्टअप में कर दिखाया कमाल 

इन सभी समस्याओं का कारगर समाधान दिल्ली स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आइआइटी) के दो छात्रों के स्टार्टअप ने प्रस्तुत कर दिखाया है। टेक्सटाइल विषय में चौथे वर्ष की पढ़ाई कर रहे 21 वर्षीय अर्चित अग्रवाल और हैरी सेहरावत ने सांफे स्टार्टअप शुरू किया। दिल्ली आइआइटी ने इसे प्रारंभिक सहयोग (इन्क्युबेशन) मुहैया कराया। विशेषज्ञ प्राध्यापकों के मार्गदर्शन में छात्रों ने केले के तने से विशेष फैब्रिक विकसित करने में सफलता पाई। इससे बने सैनेटरी पैड को महिलाएं 121 बार इस्तेमाल कर सकेंगी।

पानी में धोकर सुखा दीजिए और फिर से इस्‍तेमाल कीजिए

छात्रों ने बताया कि केले के तने का इस्तेमाल भारत में फिलहाल कहीं भी दोबारा इस्तेमाल किए जाने वाले पैड बनाने में नहीं किया जा रहा है। हां, अफ्रीका में यह युक्ति सफल रही है, जहां दोबारा इस्तेमाल किए जा सकने वाले नैपकिन नि:शुल्क बांटे जाते हैं। खास बात यह है कि इस नैपकिन को आसानी से आठ घंटे इस्तेमाल के बाद सिर्फ ठंडे पानी में धोकर सुखा देना है और डेढ़ घंटे बाद वह दोबारा इस्तेमाल योग्य हो जाएगा।

केले के तने में सोखने की क्षमता सर्वाधिक

दो साल में भी इसकी गुणवत्ता खराब या कम होने के सवाल पर अर्चित कहते हैं, लगातार इस्तेमाल के बावजूद सेहत पर भी कोई असर नहीं होगा। केले के तने में सोखने की क्षमता सर्वाधिक होती है, लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि हमारे देश में केले के इस तने का इस्तेमाल न के बराबर ही होता है। इसे सिर्फ निर्यात कर दिया जाता है।

एक तने से बनता है 10 हजार पैड

हम केरल, महाराष्ट्र और तमिलनाडु के किसानों से केले का तना खरीद रहे हैं, 200 से 300 रुपये किलो की कीमत पर। एक तना करीब 60 किलो को होता है और इससे 10 हजार पैड बनाए जाते हैं। इस स्टार्टअप को प्रोत्साहित करने वाली कंपनी हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (एचपीसीएल) के चीफ जनरल मैनेजर संजय कुमार कहते हैं, आइआइटी जैसे संस्थान और उनके अंतर्गत आने वाली कंपनियां धारणा को तोड़ने का काम कर रही हैं। यह महिलाओं के हाइजीन और उनके कल्याण के क्षेत्र में एक बेहद ही उत्कृष्ट और जिम्मेदार सहयोग है।

लांचिंग के बाद से ही है डिमांड 

वहीं पर्यावरण को शुद्ध बनाए रखने में इससे बेहतर क्या सहयोग हो सकता है। अर्चित ने बताया कि लांचिंग के पांच दिन के भीतर ही 5000 से अधिक पैड ऑनलाइन सेल हो गए। गांवों तक इस उत्पाद को पहुंचाने के लिए कुछ एनजीओ और सरकार की तरफ से गांवों में हर माह कम दाम पर नैपकिन बांटने वाली संस्थाओं से बात की गई है।

डॉक्‍टर की राय

प्लास्टिक से बने सैनिटरी नैपकिन में नमी एकत्र हो जाती है, जिसके कारण त्वचा में फंगल संक्रमण की संभावना होती है। प्लास्टिक का इस्तेमाल शरीर और पर्यावरण के लिए नुकसानदेह भी होता है। जबकि यह पैड पूरी तरह रोगाणु रहित हैं। आइआइटी दिल्ली के छात्रों द्वारा की गई यह पहल वाकई सराहनीय है।

डॉ. रीता बख्शी, स्त्री रोग विशेषज्ञ और आइवीएफ एक्सपर्ट, इंटरनेशनल फर्टिलिटी सेंटर, दिल्ली

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Posted By: Prateek Kumar

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