दिल में बसता है दिल्ली के छोटे भटूरे और पराठों का स्वाद, फेमस बॉलीवुड एक्टर ने और क्या कुछ कहा
कुमुद मिश्रा ने दैनिक जागरण से बातचीत में दिल्ली से जुड़ी यादें साझा कीं। उन्होंने बताया कि कैसे दिल्ली में रहते हुए उन्होंने एनएसडी में पढ़ाई की और थियेटर में काम किया। मिश्रा ने अपने फिल्मी करियर के बारे में भी बात की और बताया कि कैसे उन्होंने स्क्रिप्ट के लिए कई कहानियां छोड़ी हैं। उन्होंने कहा कि थियेटर और नाटकों से दिल्ली का पुराना नाता रहा है।

जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। हाल ही में दिल्ली आए प्रसिद्ध फिल्म व थियेटर कलाकार कुमुद मिश्रा ने दैनिक जागरण से की बातचीत। दिल्ली में कनाट प्लेस, पुरानी दिल्ली और मंडी हाउस से जुड़ी कई यादें की साझा। कहा आज भी दिल्ली आकर महसूस होती है अलग सी खुशी।
एनएसडी में रहते हुए उस दौर की खास यादें जुड़ी हैं दिल्ली से। कभी पैदल सड़कों पर घूमते थे आज पूरी तरह बदल गया है दौर। बेसब्री से रहता है दिल्ली में परफार्म करने का इंतजार। इस साल के अंत तक दिल्ली में लेकर आएंगे अगला नाटक।
दिल्ली की जनता से हमेशा बेशुमार प्यार मिलता है। इस वीकेंड सांप-सीढ़ी का मंचन किया है। इससे पहले पुराने चावल, कौमुदी और पटना का सुपरहीरो के भी कई शो यहां किए हैं। सारे शो हाउसफुल रहते हैं और दर्शक काफी रिस्पॉन्सिव है।
थियेटर और नाटकों से दिल्ली का रहा पुराना नाता
इसलिए बतौर कलाकार यहां शो करने में अलग ही खुशी मिलती है। थियेटर और नाटकों से दिल्ली का पुराना नाता रहा है और थियेटर ग्रुपों ने यहां हमेशा अस्तित्व बनाए रखा है। सालों तक जब अच्छा काम होता है तो अच्छी ऑडियंस भी बनती है।
यही वजह है कि दिल्ली में नाटक में लोग आज भी बेहद दिलचस्पी लेते हैं। इस वीकेंड हुए नाटक सांप-सीढ़ी में मैने जो किरदार निभाया है, ये मेरे वास्तविक व्यक्तित्व से बिल्कुल अलग है और एक कलाकार के लिए ऐसा अलग किरदार निभाने का मजा ही खास होता है।
'स्क्रिप्ट अगर अच्छी है तो छोटा किरदार भी सही'
मुझे इस नाटक की स्क्रिप्ट बेहद पसंद आई थी। बात फिल्मों की करें तो स्क्रिप्ट ही असली हीरो होती है। मैने ज्यादातर कहानियां स्किप्ट के लिए ही की है। स्क्रिप्ट अगर अच्छी है तो मेरे लिए छोटा किरदार भी चलता है। हां नाटकों में विकल्प चुनने और खुद को चैलेंज करने की कलाकार को ज्यादा छूट होती है।
सिनेमा में रीटेक होता है लेकिन नाटक की खासियत ये है कि आपको दर्शकों के आगे लाइव परफार्म करना होता है। नाटक मंचन से पहले हम कई बार रिहर्सल करते हैं और इस दौरान ये किरदार आपके माइंड और बाडी का हिस्सा बन जाता है।
'असफलताओं से सीखकर आप निखरते हैं'
लाइव परफॉर्मेंस में कई बार विपरित परिस्थितियों में भी बेहतर परफार्म करना चैलेंजिंग होता है यही थियेटर की विशेषता भी है। दर्शकों और किरदारों के बीच एक बेहद खूबसूरत रिश्ता होता है। दर्शक आपको पसंद करते हैं तो उनकी उम्मीदों और आपका उत्साह दोनों बढ़ जाते हैं।
आप जो भी काम करना चाहता हैं और उसे इंज्वाय लेकर करते हैं तो वो आसानी से किया जा सकता है। अभियन के क्षेत्र में बेहतर अदाकारी, खुद को साबित करने और दर्शकों को पसंद आने जैसी चुनौतियां जरूर आती है, लेकिन ये सब यात्रा का एक हिस्सा हैं। कई बार आपको सफलता नहीं मिलती है, लेकिन इससे भी सीखने को मिलता है। असफलताओं से सीखकर आप निखरते हैं और आगे बढ़ते हैं।
दिल में बसती है दिल्ली, मिलता है बेशुमार प्यार
दिल्ली में दर्शकों का बेशुमार प्यार मिलता है। मैं ज्यादातर मुंबई में रहता हूं, लेकिन दिल्ली मेरे दिल में बसती है। बंगाली मार्केट और नाथू स्वीट्स के छोले भटूरे मेरे लिए सिर्फ जायका नहीं एक परंपरा है। दिल्ली आता हूं तो ये खाए बिना मुंबई नहीं लौटता।
इसके अलावा कनाट प्लेस में काके दा होटल, आइटीओ के पराठे, हनुमान मंदिर की कचौड़ी का स्वाद आज भी जुबां पर ताजा है। एनएसडी का एक दौर था जब हम लोग जो नंगे पैर पूरे शहर में भटकते थे। क्यों भटक रहे थे, ये पता भी नहीं था, बस पागलपन था कुछ करने का।
होस्टल की लाइफ, लाइब्रेरी, क्लासरूम, एनएसडी का मंच और दिल्ली की गलियां भले ही आज सब कुछ बदल गया है, लेकिन यहां पहुंचकर एक सुखद गुदगुदी होती है। कमानी आडिटोरियम, श्रीराम सेंटर, मंडी हाउस जब भी आना होता तो सालों पुरानी यादें ताजा हो जाती है।
इस साल के अंत तक आएगा अगला नाटक
मेरे हिस्से जो भी किरदार आता है उसे पूरी ईमानदारी से निभाता हूं। सांप-सीढ़ी के बाद अभिषेक मजूमदार के सोलो नाटक विभूति रचनावली में मुख्य भूमिका में नजर आउंगा। ये नाटक इस साल के अंत तक दर्शकों के सामने होगा और दिल्ली में भी इसका मंचन करेंगे।
हर किरदार मेले लिए खास है फिर भी शेक्सपियर मेरी विशलिस्ट में है। मैं चाहता हूं कि शेक्सपियर के एक नाटक में मंचन का मौका मिले और पूरी उम्मीद है ऐसा होगा।
जो भी हूं थियेटर की वजह से हूं
थियेटर मेरी जरूरत है। एनएसडी के तीन सालों का मेरे व्यक्तित्व को निखारने में अहम योगदान रहा है। आज जो कुछ भी हूं दिल्ली और ड्रामा स्कूल की वजह से हूं। खुद को भाग्यशाली मानता हूं कि मुझे यहां सीखने का मौका मिला।पहले मैं थियेटर को ही ज्यादा इंज्वाय करता था, लेकिन अब फिल्मों और थियेटर दोनों में ही आनंद आता है।
मेरा मानना है कि थियेटर आपको मांझता है और अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण करना सिखाता है। लेकिन ये जरूरी नहीं है कि आप थियेटर कलाकार हैं तो ही इंड्रस्ट्री में बेहतर कर सकते हैं।
आज कई ऐसे सफल कलाकार हैं जिन्होंने बेहतर मुकाम बनाया है लेकिन थियेटर में कभी नहीं रहे।हर व्यक्ति अपनी यात्रा और अनुभवों से सीखता है। मैं यही कहना चाहूंगा कि अपनी यात्रा खुद लिखें और सफर के हर पहलू से सीखें।
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