नई दिल्ली (अभिनय उपाध्याय)। दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) से संबद्ध सेंट स्टीफंस कॉलेज को स्वायत्तता दिए जाने का वहां के शिक्षकों ने विरोध शुरू कर दिया है। 10 वरिष्ठ शिक्षकों ने कॉलेज प्रशासन को पत्र लिखकर कहा है कि वह कॉलेज की स्वायत्तता का समर्थन नहीं करते हैं। वहीं, डीयू शिक्षक संघ (डूटा) की पूर्व अध्यक्ष व सेंट स्टीफंस कॉलेज की शिक्षिका नंदिता नारायण ने भी इस बाबत विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के अध्यक्ष को पत्र लिखा है।

उन्होंने कहा है कि 58 में से 42 स्थायी शिक्षकों ने सेंट स्टीफंस की स्वायत्तता का विरोध किया है। यही नहीं, लगभग 700 छात्र भी अपनी आपत्ति जता चुके हैं। स्वायत्तता दिए जाने से कॉलेज न केवल फीस बढ़ाएगा बल्कि नए नियम भी थोपेगा। यह पूरी तरह से शिक्षा का निजीकरण है।

सेंट स्टीफंस कॉलेज के एक वरिष्ठ शिक्षक ने बताया कि बड़ी संख्या में यहां से शिक्षकों का पलायन हो रहा है। फिजिक्स के एक शिक्षक, इकोनॉमिक्स के विभागाध्यक्ष और अन्य विभागों के लोग संस्थान छोड़कर निजी विश्वविद्यालय की तरफ रुख कर रहे हैं।

अगर इस कॉलेज को स्वायत्तता दी जाती है तो धीरे-धीरे शिक्षक यहां से चले जाएंगे। यहां स्वायत्तता का मतलब केवल शैक्षणिक स्वायत्तता नहीं है, बल्कि कारपोरेट और मिशनरी का भरपूर हस्तक्षेप है। एक अन्य शिक्षक का कहना है कि सेंट स्टीफंस की सुप्रीम काउंसिल में कारपोरेट जगत के दो लोग घुस गए हैं, जो इस कॉलेज के नाम को भुनाकर पूरे देश में सेंट स्टीफंस कॉलेज खोलना चाहते हैं।

इसे व्यापार का माध्यम बनाना चाहते हैं। कॉलेज प्रशासन ने स्वायत्तता को लेकर न तो शिक्षकों और न ही छात्रों से सलाह की है। ज्ञात हो कि इस मामले में डीयू के शिक्षक बड़ी संख्या में यूजीसी के बाहर 27 अप्रैल को अपना विरोध जता चुके हैं।

प्रिंसिपल भी उठा चुके हैं सवाल

यूजीसी के अधिकारियों व डीयू के कॉलेजों के प्रिंसिपलों के बीच 27 अप्रैल को हुई बैठक में कई प्रिंसिपलों ने स्वायत्तता को लेकर सवाल उठाए थे। एक प्रिंसिपल का कहना है कि यूजीसी स्वायत्तता देने और फंड नहीं काटने की बात कह रहा है, लेकिन स्ववित्तपोषित कोर्स चलाने के लिए धन नहीं देगा। ऐसे में यह धन छात्रों से लेना पड़ेगा, जिससे पढ़ाई और महंगी हो जाएगी। हमलोगों ने कई सवाल बैठक में उठाए, लेकिन अधिकारियों ने कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया। 

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