नई दिल्‍ली, प्रेट्र। हमारे फोन में विभिन्न एप पर अक्सर हमारे पसंदीदा उत्पादों से जुड़े विज्ञापन आते हैं। ऐसे में कुछ लोगों के मन में यह सवाल भी आने लगता है कि कहीं फोन हमारी बातें सुनकर हमारे पसंदीदा उत्पादों के बारे में जानकारी तो नहीं जुटाता है। इसका जवाब है ‘नहीं’। स्मार्टफोन आपकी बातें नहीं सुनता है, लेकिन आपकी हर गतिविधि को देखता और समझता जरूर है। इसकी इसी समझ यानी आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (एआइ) की मदद से विभिन्न कंपनियां विज्ञापन देती हैं।

कुकीज में छिपे होते हैं फोन के आंख-कान: विभिन्न एप और वेबसाइट पर परमीशन देते समय या कुकीज को अनुमति देते समय हम अपनी कई जानकारियां उनसे साझा कर देते हैं। यही परमीशन और कुकीज ही असल में उनके लिए आंख और कान का काम करते हैं। फस्र्ट पार्टी कुकीज की मदद से कोई वेबसाइट उस पर हमारी कुछ निश्चित गतिविधियों को याद रखती है। इसमें लॉगिन डिटेल से लेकर कई जानकारियां होती हैं। इसी तरह कई बार थर्ड पार्टी कुकीज के लिए भी परमीशन मांगी जाती है। इसके जरिये उस वेबसाइट से गठजोड़ में काम कर रही कोई अन्य कंपनी आपकी गतिविधियों को ट्रैक करने लगती है और बाद में उसी के हिसाब से आपको विज्ञापन देती है।

अपने स्तर पर सतर्कता बरतना ही है बचाव का एकमात्र तरीका

  • किसी एप को परमीशन देते समय थोड़ा ठहरकर विचार करना चाहिए
  • ऐसी साइट्स पर लॉगिन के लिए अस्थायी ईमेल आइडी का प्रयोग भी समझदारी का कदम हो सकता है
  • बेहतर होगा कि प्रयोग के दौरान जरूरत पड़ने पर परमीशन दें। हर एप को सब तरह की परमीशन देना जरूरी नहीं है
  • जहां तक संभव हो किसी अन्य साइट पर लॉगिन के लिए अपने इंटरनेट मीडिया प्रोफाइल के इस्तेमाल से बचना चाहिए

कंपनियों के पास होती है आपके जीवन की पूरी तस्वीर: कुकीज और परमीशन की मदद से कंपनियां आपकी दिनचर्या और जरूरतों का पता लगाती हैं। कंपनियां देखती हैं कि उम्र, नौकरी, आदत, लंबाई, वजन और ऐसे ही अन्य कारकों के आधार पर कैसे उनके उत्पादों के प्रति लोगों की रुचि बदलती है। इन जानकारियों के आधार पर कंपनियां सटीक तरीके से ऐसे लोगों के पास अपना विज्ञापन पहुंचाती हैं, जिनमें ज्यादा रुचि की उम्मीद होती है। इसे ऐसे भी कह सकते हैं कि कंपनियां सही समय पर सही ग्राहक तक पहुंचती हैं।

जानकारियों के विश्लेषण में जुटी होती हैं मशीनें: एआइ में कई ऐसी मशीन लर्निग तकनीकें हैं, जिनकी मदद से आंकड़ों को वर्गीकृत किया जाता है। इसमें से एक रीएन्फोर्समेंट लर्निग (आरएल) तकनीक है, जो यूजर की ही आदतों से अपने लिए फीडबैक तैयार करती है। उदाहरण के तौर पर जैसे ही आप इंटरनेट मीडिया पर किसी पोस्ट को लाइक करते हैं, आरएल एजेंट यह मान लेता है कि आपको वह पोस्ट पसंद है या शायद पोस्ट करने वाला पसंद है। इस आधार पर कंपनी को आपकी पसंद पता चलती है और वह आपके लिए विज्ञापन तय करती है।

इन डाटा की अहम भूमिका

किसी डिजिटल प्लेटफार्म पर पहुंचकर आपके द्वारा किसी विज्ञापन पर क्लिक करना

किसी प्लेटफार्म पर दी गई निजी जानकारियां, जैसे- उम्र, ईमेल एड्रेस, लोकेशन और आपका डिवाइस

किसी ऐसी कंपनी या विज्ञापनदाता से आपके बारे में मिली जानकारी, जिसके आप पहले से ग्राहक हैं

किस तरह के पेज या ग्रुप आप बनाते हैं या उन्हें लाइक करते हैं, उससे भी आपकी पसंद तय होती है

फेसबुक कई बार आपको उन उत्पादों के विज्ञापन भी दिखाता है, जो आपके किसी करीबी दोस्त ने खरीदे हैं

Edited By: Sanjay Pokhriyal