राजस्थान (नीमली)/ नई दिल्ली [संजीव गुप्ता]। हमने दक्षिणी-पश्चिमी मानसून के दौरान चरम वर्षा वाली घटनाओं को तो महसूस किया ही है, पिछले दो महीनों में दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में बगैर मानसून लगातार हो रही वर्षा ने भी साबित कर दिया है कि अब जलवायु परिवर्तन का असर घातक होने लगा है। चिंताजनक यह है कि स्थानीय स्तर पर घट रही इन मारक घटनाओं को रोकने के लिए कोई ठोस नीति और कारगर उपाय अभी तक नहीं हैं।

यह चिंता शुक्रवार को राजस्थान में नीमली स्थित अनिल अग्रवाल एनवायरमेंट ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट (एएईटीआइ) में सेंटर फार साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) की ओर से आयोजित दो दिवसीय सम्मेलन मंथन-5 के दूसरे और अंतिम दिन सीएसई की महानिदेशक और पर्यावरणविद सुनीता नारायण ने जताई। उन्होंने कहा कि हाल ही में ग्लासगो में संपन्न कान्फ्रेंस आफ पार्टीज (कोप 26) से बहुत आशा या उम्मीद नहीं निकल पाई।

उन्होंने कहा कि भारत और अन्य विकासशील देशों ने दुनिया के सामने जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने के लिए फंड और तकनीक की मांग की, लेकिन विकसित देशों ने पहले की तरह ही इसे अनसुना कर दिया है। यह रवैया गरीब देशों के लिए बेहद घातक है, क्योंकि जलवायु परिवर्तन के सबसे आसान शिकार वही हैं।

उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन की समस्या देश के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग तरीके से व्यवहार कर रही है। इससे निपटने के लिए जरूरी है कि क्षेत्रवार तरीके से जलवायु परिवर्तन की रोकथाम की कार्ययोजनाओं को तैयार करें और उन्हें लागू करें। बाढ़, सूखा, तूफान और बारिश की फ्रीक्वेंसी के लिंक भी ढूंढने होंगे। उन्होंने कहा कि अब यह बात बिल्कुल नहीं रही कि जलवायु परिवर्तन होगा। बल्कि यह स्वीकार करना चाहिए कि जलवायु परिवर्तन हो रहा है और यह असली संकट बन चुका है।

दुनिया भर में कार्बन उत्सर्जन को लेकर रणनीतियां बनाई जा रही हैं लेकिन भारत में अब भी सस्ता और प्रदूषण फैलाने वाला ईंधन इस्तेमाल किया जा रहा है। हमें यह याद रखना होगा कि कोयले के इस्तेमाल को घटाए बिना हम न तो जलवायु परिवर्तन और न ही वायु प्रदूषण जैसी समस्याओं का समाधान करने में सक्षम हो पाएंगे। स्वच्छ और ईंधन सभी की पहुंच में लाना होगा। उन्होंने कहा कि देश में आबादी के अनुपात में वाहनों की बढ़ती संख्या जिस तरह से सड़कों का घेराव कर रही है और लोगों को पैदल चलने से हतोत्साहित कर रही है, यह एक असल चुनौती है। वाहनों की संख्या किस तरह से घटाई जा सके, हमें इसके बारे में बहुत ही प्रभावी तरीके से सोचना होगा।

यह एक कठोर कदम हो सकता है लेकिन हमारे और भविष्य के लिए काफी फायदे वाला साबित हो सकता है। सम्मेलन को सीएसई की एनवायरमेंटल रिसोर्स यूनिट की कार्यक्रम निदेशक किरण पांडेय और डाउन टू अर्थ के सहायक संपादक रजित सेनगुप्ता ने भी संबोधित किया। उन्होंने अपने वक्तव्य में जलवायु परिवर्तन से जुड़ी घटनाओं के आंकड़ों की तस्वीर पेश की।

दिल्ली की समस्या लचर परिवहन और पार्किंग

सुनीता नारायण ने कहा कि दिल्ली के वायु प्रदूषण की जड़ लचर सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था है। पिछले करीब 15 साल में बमुश्किल 600 नई बसें आई हैं। आज तक भी वहां लगभग 50 प्रतिशत ठोस कचरे का प्रबंधन नहीं हो पा रहा है। पार्किंग अपर्याप्त है और लोगों को निजी वाहनों के प्रति हतोत्साहित करने की दिशा में पार्किंग शुल्क भी नहीं बढ़ाए जा रहे जबकि वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग भी इसकी वकालत कर चुका है।

Edited By: Pradeep Chauhan

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