नई दिल्ली, जागरण संवाददाता। जेएनयू प्रशासन की सख्त चेतावनी के बावजूद भी जेएनयू छात्र संघ (JNUSU) कार्यालय पर इकट्ठे होकर वामपंथी छात्र संगठनों से जुड़े छात्रों ने 2002 के गुजरात दंगों पर बनी इंडिया: द मोदी क्वेश्चन (India: The Modi Question) नामक बीबीसी की डॉक्युमेंट्री को देखा। डॉक्युमेंट्री देख रहे छात्रों ने आरोप लगाया कि उन पर विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं ने पत्थर भी फेंके। मामला इतना बढ़ा कि छात्रों ने ने वसंत कुंज में एक पुलिस स्टेशन के बाहर विरोध प्रदर्शन किया।

25 लोगों के खिलाफ दर्ज कराई शिकायत

हालांकि, बाद में छात्रों ने अपने प्रदर्शन को रोक दिया। JNUSU अध्यक्ष आइशी घोष ने कहा कि हमने 25 लोगों के खिलाफ शिकायत दर्ज करवाई है, पुलिस ने आश्वासन दिया है कि वे तहकीकात करेंगे। जिन लोगों को चोट लगी है वे भी इलाज के बाद आज पुलिस स्टेशन में अपना बयान देंगे। जेएनयू प्रशासन से भी हम शिकायत करेंगे। हम फिलहाल हमारे प्रदर्शन को अभी रोकते हैं, पुलिस प्रशासन से अपील है कि वे इसकी तहकीकात करें।

इंटरनेट सेवाएं भी बाधित कराई

छात्र डॉक्युमेंट्री की स्क्रीनिंग छात्र संघ कार्यालय में लगे प्रोजेक्टर पर ना कर सकें इसके लिए जेएनयू प्रशासन ने कार्यालय के आसपास की बिजली भी कटवा दी थी।  इसके साथ ही वहां जैमर लगवा कर इंटरनेट सेवाएं भी बाधित करा दी थी। इसके बावजूद वहां मौजूद वामपंथी छात्रों ने अपने फोन और लैपटॉप में पहले से डाउनलोड की गई डॉक्युमेंट्री को सामूहिक रूप से देखा। वहीं कुछ छात्रों ने जेएनयू परिसर से बाहर निकलकर भी मोबाइल का इंटरनेट चला कर डॉक्युमेंट्री को डाउनलोड किया।

कार्यालय में की डॉक्युमेंट्री की स्क्रीनिंग

उल्लेखनीय है कि जेएनयू छात्रसंघ की योजना मंगलवार रात नौ बजे इस डॉक्युमेंट्री की स्क्रीनिंग अपने कार्यालय में करने की थी। सोमवार को जेएनयू प्रशासन ने स्क्रीनिंग पर रोक लगा दी थी। इसके बावजूद छात्र डॉक्युमेंट्री की स्क्रीनिंग पर आड़े रहे। रात नौ बजे स्क्रीनिंग के समय पर छात्र छात्रसंघ कार्यालय पर स्क्रीनिंग के लिए जमा हुए।

कार्यालय की काट दी गई बिजली

मगर स्क्रीनिंग दिखाने की योजना पर पानी फिर गया, क्योंकि छात्र संघ कार्यालय के आसपास बिजली काट दी गई थी। छात्रों ने प्रशासन की अस्वीकृति के बावजूद इसे आगे बढ़ाने की योजना बनाई थी। जब बिजली चली गई तो एकत्र हुए छात्रों ने इसे मोबाइल और लैपटॉप पर साथ बैठ कर देखा।

पुलिसकर्मी भी रहे तैनात

इस दौरान मुख्य गेट के बाहर पुलिसकर्मी भी तैनात रहे। कुछ पुलिसकर्मी सदा वर्दी में भी परिसर के अंदर मौजूद रहे। मीडिया को भी गेट के बाहर ही रोक दिया गया था। उल्लेखनीय है कि वामपंथी छात्र संगठन स्टूडेंट फेडरेशन आफ इंडिया (एसएफआई, SFI) की केंद्रीय कार्य समिति ने अपनी सभी राज्य इकाइयों को इस डोक्यूमंट्री की स्क्रीनिंग कराने का निर्देश दिया था।

आइशी घोष ने लिया स्क्रीनिंग का फैसला

जेएनयू छात्र संघ अध्यक्ष आइशी घोष ने एसएफआई की दिल्ली प्रदेश उपाध्यक्ष होने के चलते केंद्रीय कार्य समिति के निर्देश पर डॉक्युमेंट्री की स्क्रीनिंग कराने का निर्णय लिया था और स्क्रीनिंग को लेकर इंटरनेट मीडिया पर पोस्टर और परिसर में पैम्फलेट भी बांटे गए थे।

इस पर संज्ञान लेते हुए जेएनयू प्रशासन ने एडवाइजरी जारी कर कार्यक्रम रद करने की सलाह दी थी और ऐसा न करने पर स्क्रेनिंग में शामिल होने वाले छात्रों पर सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई करने की भी चेतावनी दी थी। इस एडवाइजरी का जवाब देते हुए जेएनयू छात्र संघ ने प्रशासन से ही सवाल पूछे थे कि जेएनयू एक्ट में ऐसा कहीं नहीं लिखा हुआ कि यहां किसी फिल्म या डॉक्युमेंट्री की स्क्रीनिंग नहीं हो सकती।

विद्यार्थी परिषद ने स्क्रीनिंग की निंदा करते हुए भारत की छवि को खराब करने के लिए वामपंथी छात्र संगठनों पर बीबीसी का साथ देने की बात कही।

पत्थरबाजी का लगाया आरोप

डॉक्युमेंट्री देख रहे छात्रों ने आरोप लगाया कि उन पर विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं ने पत्थर फेंके। हालांकि, विद्यार्थी परिषद ने इससे इनकार किया है। खबर लिखे जाने तक पुलिस भी पत्थरबाजी को लेकर छात्रों से पूछताछ करने में जुटी थी। इस दौरान किसी भी छात्र की डॉक्युमेंट्री की स्क्रीनिंग को लेकर गिरफ्तारी नहीं हुई थी और ना ही पत्थर लगने से कोई चोटिल हुआ था। जेएनयू छात्र संघ के नेतृत्व में वामपंथी छात्र पत्थरबाजी की एफआईआर दर्ज कराने के लिए पुलिस स्टेशन की ओर पैदल मार्च कर रहे थे।

क्या है बीबीसी की विवादित डॉक्युमेंट्री विवाद?

बता दें कि केंद्र सरकार ने पिछले सप्ताह कई YouTube वीडियो और डॉक्युमेंट्री के लिंक साझा करने वाले ट्विटर पोस्ट को ब्लॉक करने का निर्देश दिया था। मालूम हो कि दो पार्ट में बनी बीबीसी डॉक्युमेंट्री, जो दावा करती है कि उसने 2002 के गुजरात दंगों से संबंधित कुछ पहलुओं की जांच की थी। हालांकि इसे विदेश मंत्रालय द्वारा प्रोपेगेंडा बताकर खारिज कर दिया गया। विदेश मंत्रालय ने बताया कि इसमें निष्पक्षता की कमी है और औपनिवेशिक मानसिकता को दर्शाता है। वहीं, केंद्र सरकार के इस कदम को कांग्रेस और टीएमसी जैसे विपक्षी दलों से तीखी आलोचना मिली है।

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Edited By: Geetarjun

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