नई दिल्ली [राजीव तुली]। समय के साथ चीजें विकसित होती हैं और इसी प्रकार ‘हिंदुत्व’ का भी विकास हुआ और वह विकसित होती चली गई। संविधान में सामूहिक मूल्य और राष्ट्र की अपेक्षाएं निहित होती हैं। यह इन्हीं लक्ष्यों को हासिल करने की रूपरेखा प्रस्तुत करता है और साथ ही सरकार के अधीन काम करने वाले प्राधिकारियों को अपने कर्तव्यों को पूरा करने के लिए सशक्त करता है। इसी प्रकार भारत का संविधान है, जो सभ्यातगत मूल्यों पर आधारित है और जो 5,000 वर्षों की भारत भूमि पर विकसित हुआ है।

भारतीय संविधान के बुनियादी मूल्यों में स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व, शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व, लोकतंत्र, प्रकृति के प्रति सम्मान, प्राकृतिक संसाधन और अन्य चीजें शामिल हैं। इन सांस्कृतिक सभ्यतागत मूल्यों की उत्पत्ति हिंदू संस्कृति के बुनियादी मूल्यों से हुई है, जो दुनिया की सबसे पुरानी समृद्ध सभ्यता है।

संविधान में निहित मूल्यों ने हिन्दुत्व के सांस्कृतिक मूल्यों से बहुत कुछ अपनाया है। इतना कि देश के नाम तक की उत्पत्ति हिंदू किंवदंतियों से हुई है। तीन बुनियादी क्षेत्र ऐसे हैं, जिन्हें सर्वोच्च न्यायालय से आधारभूत ढांचे के रूप में सुरक्षा मिली हुई है। इनमें प्रस्तावना, मौलिक अधिकार और नीति निर्देशक तत्व और मौलिक कर्तव्यों के अलावा कुछ अन्य प्रावधान हैं।

संविधान का पहला ही अनुच्छेद 1 (1) कहता है, ‘‘भारत, अर्थात इंडिया, राज्यों का संघ होगा।’’ भारतीय संविधान ने हमारे देश का नाम भारत दिया है जो कि अपने मुस्लिम-पूर्व और अंग्रेज-पूर्व (प्री-मुस्मिल और प्री ब्रिटिश) के गौरवमयी इतिहास का संकेत है। भारत नाम प्राचीन हिन्दू परंपराओं के पुरोधाओं से निकला है। हमारा देश पारंपरिक रूप से आर्यों की उत्पत्ति से ही भारत या भारतवर्ष के रूप में जाना जाता है। विष्णु पुराण के मुताबिक, ‘‘जो देश महासागर के उत्तर और बफीर्ली पर्वतों के दक्षिण में स्थित है उसे भारत कहा जाता है, क्योंकि वहां भारतवंशी निवास करते हैं।’’ प्रधानमंत्री ने हाल ही में लोकसभा में दिए अपने एक भाषण में भी इसे उद्धृत किया था।

महाभारत कालीन राजा भरत के नाम से ही इंडिया का नाम भारतवर्ष पड़ा। भरत एक प्रसिद्ध शासक थे और वह भरत वंश के संस्थापक थे। उन्हें महाभारत के पांडवों और कौरवों का वंशज भी कहा जाता है। वह हस्तिनापुर के राजा दुष्यंत और महारानी शकुंतला के पुत्र थे। महान राजा भरत ने संपूर्ण भारतवर्ष (आज के भारतीय उपमहाद्वीप) पर विजय प्राप्त की थी।

संविधान में भारत को राज्यों का संघ कहा गया है। इसका तात्पर्य है कि भारत में हिंदू सभ्यता बहुसांस्कृतिक, मिश्रित और सहिष्णु समाज की रही है, जहां बहुत सारी सह-संस्कृतियों का अस्तित्व रहा और वे यहां पनपी भी। यह इस देश की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक सच्चाई के महत्व को दर्शाता है। बहुत सारी सह-संस्कृतियों का जन्म हिंदुत्व से हुआ है या फिर वे उससे बहुत ज्यादा प्रभावित रही हैं।

कुछ उप-सूक्ष्म, लेकिन बहु-संस्कृतियों के अस्तित्व के बावजूद भारत में सदियों से राजनीतिक, भौगोलिक और सांस्कृतिक एकता रही है। इन्हें एकजुट रखने वाली ताकत है हिन्दुत्व की सांस्कृतिक रीति नीति, जो कि ना सिर्फ एक धर्म है, बल्कि एक जीवन पद्धति है। यह मूलभूत एकता कई बार विकेंद्रीकृत शक्ति के रूप में राजनीतिक तौर पर भी दिखी है, लेकिन वह अक्सर अन्तर्निहित रही तो कभी प्रभावकारी भी साबित हुई। उसने कभी भी क्षेत्रीय उप-संस्कृतियों की प्रगति, उनके विकास और उनके जीवन को बाधित नहीं किया।

संविधान की प्रस्तावना में भाईचारे का बुनियादी मूल्य उपनिषद के ‘‘वसुधैव कुटुंबकम’’ के आदर्श वाक्य से लिया गया है, जिसका मतलब होता है कि पूरा ब्रह्मांड एक है। संविधान निर्माताओं ने बड़ी ही गहराई से कहा है कि भारतीय मूल्यों का चरित्र वास्तव में हिंदू रहा है, लेकिन वे मूल्य सभी अन्य धर्मों के अंतर्निहित सम्मान और उनके प्रति सहिष्णुता में निहित हैं। भारतीय संविधान में मौलिक कर्तव्य वे हैं, जो भारत देश अपने नागरिकों से अपेक्षा करता हैं। हालांकि, इसे राज सत्ता द्वारा लागू नहीं किया जा सकता।

संविधान का भाग चार क और अनुच्छेद 51-क भारत के सभी लोगों में समान भातृत्व का निर्माण करने, उत्कृष्टता के लिए प्रयास करने और पर्यावरण की रक्षा करने की बात करता है। वसुधैव कुटुंबकम शब्द, जो कि हिन्दुत्व का बुनियादी मूल्य है , वह भी अन्य धर्मों के प्रति सहिष्णुता, सद्भाव और भारत के सभी लोगों के बीच, चाहे वे किसी भी धर्म, भाषा, क्षेत्र या वर्ग के हों, समान भाईचारे की भावना की बात करता है।

हिन्दुत्व एक जीवन पद्धित रहा है, जहां प्रकृति के साथ इंसान का सह-अस्तित्व जीने का एक स्वाभाविक तरीका है। हम मंदिरों में जब नित्य प्रार्थना करते हैं, तब हम ‘प्राणियों में सद्भावना हो’, ‘विश्व का कल्याण हो’ की बात करते हैं। संविधन का अनुच्छेद 51-क (ग) देश के हर नागरिक से कहता है कि प्राकृतिक पर्यावरण की, जिसके अंतर्गत वन, झील, नदी और वन्य जीव हैं, उनकी रक्षा, उसका संवर्धन तथा प्राणि मात्र के प्रति दयाभाव रखना मौलिक कर्तव्य है।

जीवन की हिन्दू पद्धति ना सिर्फ इंसान, बल्कि जानवरों के सम्मान की भी बात करती है। भारतीय हिंदू समाज में वैदिक युग से ही गाय की पूजा की पूजा होती रही है और उनका एक मां के रूप में सम्मान किया जाता है। गाय की पूजा हिन्दू संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है। हिंदू गाय को अपने परिवार को हिस्सा मानते हैं ओर कई सारे ऐसे सांस्कृतिक और धार्मिक त्योहार हैं, जो गायों व उनकी पूजा पर केंद्रित हैं। राज्य के नीति निदेशक तत्वों में भी गायों की महत्ता का उल्लेख है। ये नीति निदेशक तत्व राज्यों को कानून बनाने के लिए एक मार्गदर्शक के रूप में होते हैं।

संविधान के अनुच्छेद 48 के मुताबिक राज्य, कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने का प्रयास करेगा और विशिष्टत्या गायों और बछड़ों तथा अन्य दुधारू और वाहक पशुओं की नस्लों के परिरक्षण और सुधार के लिए और उनके वध का प्रतिषेध करने के लिए कदम उठाएगा। यह अनुच्छेद विशेष रूप से राज्यों को गाय व बछड़ों की हत्या को कानूनों के जरिए प्रतिबंधित करने का निर्देश देता है। इसलिए, महात्मा गांधी के आदर्शों का अनुपालन करते हुए, राज्य के नीति निदेशक तत्व राज्यों को ऐसे कानून बनाने को कहता है कि गायों और बछड़ों के वध का प्रतिषेध करने के लिए कदम उठाएं।

सबसे पुरानी सभ्यता हिन्दुत्व की अपनी एक भाषा भी है और वह है संस्कृत। संस्कृत एक ऐसी भाषा है, जिसने हिन्दुत्व को एक डोर में बांधने का काम किया है। उसे भगवान की भाषा भी कहा जाता है। वेद, रामायण, भागवत गीता, महाभारत और योग सूत्र इत्यादि सभी संस्कृत भाषा में ही लिखे गए हैं या संकलित किए गए हैं।

संविधान के अनुच्छेद 343 और 351 के तहत हिन्दी को भारत की राजभाषा के रूप में स्वीकारा गया है और राज्यों को निर्देशित किया गया है कि ने हिंदी भाषा का प्रसार करें और उसका विकास करे जिससे वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके और उसकी प्रकृति में हस्तक्षेप किए बिना हिंदुस्थानी में और आठवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट भारत की अन्य भाषाओं में प्रयुक्त रूप, शैली और पदों को आत्मसात करते हुए और जहां आवश्यक या वांछनीय हो वहां उसके शब्द-भंडार के लिए मुख्यतः संस्कृत से और गौणतः अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए उसकी समृद्धि सुनिश्चित करे। यह स्पष्ट तौर पर राज्यों को आदेश देता है कि वे जोड़ने वाली यानी एकीकृत करने वाली भाषा हिंदी का प्रसार करें, जिसके शब्द-भंडार मुख्यतः संस्कृत से हैं।

हिन्दुत्व एक ऐसा धर्म है, जो हमेशा विकसित होता रहा है। कुछ समय ऐसा भी आया, जब चोरी-छुपे इसे विकृत करने की चेष्टा हुई और इसके लिए संविधान संशोधन का सहारा लिया गया। उदाहरण के तौर पर, अस्पृश्यता को अनुच्छेद 17 के जरिए समाप्त करने की कोशिश की गई, जबकि वास्तव में यह अनुच्छेद अस्पृश्यता को सभी रूपों में और प्रथाओं में समाप्त करता है। 

(लेखक एक स्वतंत्र स्तंभकार और टिप्पणीकार हैं। इस आलेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं।)

Edited By: Jp Yadav