रेणु जैन। होली अब करीब है। इस दिन सारे गिले-शिकवे निकालकर दोस्त-दुश्मन गले मिल जाते हैं, जो भारतीय संस्कृति का मूलमंत्र है। ऐसे ही होली का नाम जबान पर आता है तो पूरे मौसम में जैसे गुलाल फैल जाता है। विभिन्न रंग फैलने लगते हैं और प्रकृति जीवन का एक मीठा संदेश देती है। ऐसा ही एक मीठा व्यंजन, जिसे गुझिया कहा जाता है, जिसे होली के अवसर पर बनाया जाता है। कहते हैं कि गुझिया नहीं खाई तो क्या होली मनाई। अर्द्धचंद्र जैसी दिखने वाली गुझिया जिसे पकवानों की रानी भी कहा जाता है इसीलिए भारत में ठेठ गांवों से लेकर तकरीबन सभी शहरों में गुझिया अपनी मिठास बिखेर रही है। इसीलिए इस मिठाई के अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग नाम भी हैं जैसे बिहार में गुझिया को पिड़ुकिया, महाराष्ट्र में करंजी, गुजरात में घुघरा, आंध्रप्रदेश में कज्जिकयालु, छत्तीसगढ़ में कुसली, तमिल में कचरिका और कन्नड़ और तेलुगु में कज्जीकई कहा जाता है।

पहले सिर्फ खोया और सूजी की गुझिया ही मिलती थी लेकिन अब चाकलेट से लेकर जैम, सारे ड्रायफू्रट्स तक की ढेरों स्वाद वाली गुझिया मिलने लगी है। आहार विशेषज्ञों की मानें तो भारत में त्योहारों के अवसर पर बनाए जाने वाले व्यंजन लजीज स्वाद के साथ कैलोरी वाले भी होते हैं। गुझिया मिलाए जाने वाले सूखे मेवे, नारियल, गुड़ तथा अन्य सामग्री स्वास्थ्य के लिए पोषक होती है। सूखे मेवे में जो वसा, एंटीआक्सीडेंट्स, विटामिन ई, कैल्शियम, मैग्नेशियम, पोटेशियम से भरपूर होते हैं। वहीं नारियल के अपने ढेरों फायदे हैं। गुड़ तथा घी भी भरपूर कैलोरी वाले होते हैं। अब तो लो कैलोरी गुझिया तथा शुगर फ्री गुझिया, रोस्टेड गुझियज्ञ भी खासतौर पर बनने लगी हैं। कई दुकानदारां ने तो समोसा, मटर शेप, चंद्रकली, लौंग जैसे आकार भी दिए हैं।

नवाबों के शहर लखनऊ की गुझिया की कीमत सुनकर हैरानी होगी क्योंकि इसे खाने के लिए आपको 42 से 48 हजार रुपए प्रति किलोग्राम खर्च करने होंगे। एक मजेदार बात यह भी है कि आपको इसे खाने के लिए बाकायदा पहले से आर्डर देना पड़ेगा। खासियत यह भी है कि इसके इतने मंहगे होने का राज यह है कि इस गुझिया को सोने के वर्क तथा भस्म डालकर बनाया जाता है। विदेशों में इस गुझिया की काफी डिमांग हैं। उपहारस्वरूप भी इसे दिया जाता है। मेहनत की बात करें तो इस गुझिया को तैयार करने के लिए 16 से 17 घंटे का समय लगता है तथा इसे खास गिफ्ट पैक में तैयार किया जाता है जिसकी कीमत 6 हजार रुपए से शुरू होती है।

बिहार में पिड़ुकिया नाम से मशहूर गुझिया का एक दिलचस्प किस्सा यूं भी है कि जब पुराने समय में 13-14 साल की उम्र में लड़कियों की शादी हो जाया करती थी तब लड़की पाक-कला का परिचय उसके गुझिया बनाने के ढंग से होता था। हांलाकि गुझिया मध्यकाल का पकवान है। गुझिया के बारे में कहा जाता है कि यह मिठाई मुख्य रूप से पश्चिमी देशों में मध्य एशिया होते हुए भारत आइ्र। आज गुझिया बनाने के लिए तरह-तरह के सांचे मिलते हैं, लेकिन मध्यकाल में गुझिया बनाने के लिए महिलाएं होली के कुछ दिनों पूर्व से ही नाखून काटना बंद कर देती थीं। गुझिया को किनारे से मोडऩे के लिए अपने नाखून का ही प्रयोग करती थीं।

Edited By: Prateek Kumar