12 बरस बाद दिल्ली से जान बचाकर भागा था इब्न बतूता, मुहम्मद बिन तुगलक ने सुनाई थी खौफनाक सजा
History of Ibn Battuta 14वीं सदी में सबसे बड़ा और रोमांचकारी यात्री हुआ करता था। नाम था इब्न बतूता। आज भले ही एक से बढ़कर एक विश्व भ्रमण करने वाले हो जाएं लेकिन इब्न बतूता का नाम खानाबदोशों में सबसे पहले लिया जाता है।

नई दिल्ली, जागरण डिजिटल डेस्क। लंबे सफर के लिए मशहूर इब्न बतूता (Ibn Battuta) का पूरा नाम आम नामों की तुलना में काफी लंबा है। इसका पूरा नाम, इब्न बतूता मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह बिन मुहम्मद बिन इब्राहीम अललवाती अलतंजी अबू अबुल्लाह है। इतिहासकारों का कहना है कि अपने समय के इस जांबाज यात्री ने सिर्फ 28 साल की उम्र में 75 हजार मील का सफर तय किया था। इब्र बतूता का दिल्ली से भी काफी लगावा रहा है।
इब्न बतूता का जन्म 24 फरवरी 1304 ई. को उत्तर अफ्रीका के मोरक्को के तांजियर में हुआ था। अपनी यात्रा के दौरान वह मक्का-मदीना, ईरान, क्रीमियां, खीवा, बुखारा होता हुआ अफगानिस्तान के रास्ते भारत के सिंध प्रांत में 1334 ई. में पहुंचा। उस वक्त दिल्ली में सुल्तान मुहम्मद बिन तुलगक (Muhammad bin Tughlaq) का शासन चल रहा था।
दिल्ली दरबार में बना शाही काजी
इब्न बतूता को मुहम्मद बिन तुगलक ने 12 हजार दिनार की तनख्वाह पर शाही काजी (Imperial Qazi) का पद सौंपा था। कहा जाता है कि इस्लामिक दुनिया में तुगलक सबसे अमीर शासक हुआ करता था। मुहम्मद बिन तुगलक के बारे में इब्न बतूता ने लिखा है कि, "सम्राट सबके लिए एक जैसा है। वह हर रोज किसी ना किसी भिखारी को अमीर बना देता है। साथ ही हर रोज एक ना एक आदमी को मृत्युदंड भी जरूर देता है। एक बार उसने अपने ही किए पर खुद को 21 छड़ी से मार खाने की सजा दी थी।"
जब तीन हफ्ते रहना पड़ा नजर बंद
एक किस्सा बड़ प्रचलित है। कहा जाता है कि एक बार मुहम्मद बिन तुगलक ने एक सूफी संत को बुलावा भेजा तो संत ने आने से मना कर दिया। अपनी शान में गुस्ताखी देख तुगलक ने संत का सिर धड़ से अलग करवा दिया था। साथ ही रिश्तेदारों और दोस्तों की एक लिस्ट बनवाई। इस लिस्ट में इब्न बतूता का नाम भी शामिल था। तुगलक ने इब्न बतूता को 3 हफ्ते तक नजर बंद रहने की सजा दी थी।
जान बचाकर भागा इब्न बतूता
तीन हफ्ते नजर बंद रहने के बाद इब्न बतूता को शक हो गया कि अब सुल्तान उसे जान से मरवा देगा। अब वह किसी तरह दिल्ली से निकलने की सोचने लगा। कई बार की कोशिश में नाकाम होने के बाद 1341 में उसे वह मौका मिल गया। इब्न बतूता ने तुगलक को सलाह दी कि उसे चीन के राजा के पास दूत भेजना चाहिए। इस बात पर तुगलक राजी हो गया और इब्न बतूता को तोहफे देकर चीन रवाना कर दिया।
12 बरस भारत में रहने के बाद आखिरकार इब्न बतूता यहां से सही सलामत निकल गया। खानाबदोशों के दुनिया में इब्न बतूता का नाम हमेशा याद रखा जाएगा। इसलिए सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने लिखा, "इब्न बतूता पहन के जूता निकल पड़े तूफान में, थोड़ी हवा नाक में घुस गई, घुस गई थोड़ी कान में।"
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