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    यूपी में 22 मई, 1987 को जो लोग गायब हुए, फिर भी नहीं लौटे, जानिये क्या है पूरा मामला

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    Updated: Thu, 01 Nov 2018 03:01 AM (IST)

    दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि प्रोविजनल आ‌र्म्ड कांस्टेबलरी (पीएसी) के जवानों का कृत्य क्रूरता और हड्डियां कंपा देने वाला था।

    यूपी में 22 मई, 1987 को जो लोग गायब हुए, फिर भी नहीं लौटे, जानिये क्या है पूरा मामला

    नई दिल्ली [सुशील गंभीर]। हाशिमपुरा नरसंहार के दोषियों को सजा सुनाते वक्त दिल्ली हाई कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी की। दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि प्रोविजनल आ‌र्म्ड कांस्टेबलरी (पीएसी) के जवानों का कृत्य क्रूरता और हड्डियां कंपा देने वाला था। दोषियों की यह हरकत कुछ पन्नों में दबकर अंधेरे में रही और पीड़ित परिवारों को न्याय के लिए 31 साल का लंबा इंतजार करना पड़ा। देरी से न्याय मिलने से पीड़ित परिवार अपना विश्वास खो सकते हैं। साथ ही कहा कि शवों की पहचान कराए बिना उनका निपटान करके भी गलत किया गया।

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    दिल्ली हाई कोर्ट ने इस कृत्य को हिरासत में हत्या मानते हुए कहा कि लोगों को गिरफ्तार करने के बाद नियमों के तहत कार्रवाई करने के बजाए उन्हें ट्रक में भरकर ले जाया गया। अवैध तरीके से दो अलग-अलग स्थानों पर ले जाकर उनके सिर झुका दिए गए और न हिलने का आदेश दिया गया। हाई कोर्ट ने कहा कि इस कृत्य को अवैध मानने के लिए इतना सब काफी है।

    हाई कोर्ट मानता है कि मौजूदा केस में पीड़ितों की मौत हिरासत में की गई हत्या है। राज्य को चाहिए कि वह जवाबदेही तय करें। हाई कोर्ट ने सभी राज्यों की कानून सेवा प्राधिकरण को निर्देश देते हुए कहा कि एक नोडल अधिकारी तैनात किया जाए, जो इस तरह की हिरासत में हत्या के पीड़ित परिवारों की जरूरतों का ध्यान रखे।

    हाई कोर्ट ने फैसला सुनाने के दौरान मानवीय भावनाओं का भी जिक्र करते हुए कहा कि 22 मई, 1987 को जो लोग गायब हुए, फिर भी नहीं लौटे। कई मृतकों के तो शव भी उनके परिजनों को नसीब नहीं हुए। अगर कोई गायब हो जाए तो उसके बारे में जानने का, अगर किसी की मौत हो जाए तो उसका शव या अस्थियां पाने का अधिकार परिवार को होता है। हाई कोर्ट ने कहा कि शवों का डीएनए कराकर उनकी पहचान की जा सकती थी।