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    इस साल रिकॉर्ड स्‍तर पर था फोस्सिल फ्यूल जनित कार्बन एमिशन, रिसर्च में सामने आई जानकारी

    By sanjeev GuptaEdited By: Abhishek Tiwari
    Updated: Wed, 06 Dec 2023 03:41 PM (IST)

    रिपोर्ट में अनुमान लगाया है कि वर्ष 2023 में वैश्विक स्‍तर पर 40.0 बिलियन टन सीओ2 का एमिशन होगा। यह वर्ष 2022 के स्‍तरों के लगभग बराबर ही है और यह 10 साल से चल रहे तकरीबन इसी ढर्रे का हिस्सा है। दरअसल यह एमिशन में तेज गिरावट वाली बात कतई नहीं है जबकि जलवायु संबंधी लक्ष्यों को हासिल करने के लिये ऐसा तत्‍काल करना जरूरी है।

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    इस साल रिकॉर्ड स्‍तर पर था फोस्सिल फ्यूल जनित कार्बन एमिशन

    राज्य ब्यूरो, नई दिल्ली। फोस्सिल फ्यूल या जीवाश्म ईंधन यानी कोयला , तेल और गैस से वैश्विक स्‍तर पर होने वाले एमिशन में वर्ष 2023 में एक बार फिर उछाल आया है और अब यह रिकॉर्ड स्‍तर पर पहुंच गया है। ग्‍लोबल कार्बन प्रोजेक्‍ट की विज्ञान टीम के एक नये शोध में यह बात सामने आयी है।

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    ग्‍लोबल कार्बन बजट के सालाना अनुमान के मुताबिक वर्ष 2023 में 36.8 बिलियन टन कार्बन डाई ऑक्‍साइड (सीओ2) के एमिशन का अनुमान लगाया है। यह वर्ष 2022 के मुकाबले 1.1 बिलियन टन ज्‍यादा है।

    यूरोप और अमेरिका समेत कुछ क्षेत्रों में फॉसिल फ्यूल जनित सीओ2 के एमिशन में गिरावट आयी है मगर कुल मिलाकर यह बढ़ ही रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि फोस्सिल फ्यूल के इस्‍तेमाल में कमी लाने के लिये वैश्विक स्‍तर पर उस रफ्तार से काम नहीं हो रहा है जितना कि खतरनाक हो चुके जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिये किया जाना चाहिये।

    भू-उपयोग परिवर्तन (जैसे कि वनों का कटान) के कारण होने वाले एमिशन में हल्‍की गिरावट आने की सम्‍भावना है लेकिन अब भी पुनर्वनीकरण और वनरोपण के मौजूदा स्तर से इसकी भरपाई नहीं की जा सकती है।

    रिपोर्ट में अनुमान लगाया है कि वर्ष 2023 में वैश्विक स्‍तर पर 40.0 बिलियन टन सीओ2 का एमिशन होगा। यह वर्ष 2022 के स्‍तरों के लगभग बराबर ही है और यह 10 साल से चल रहे तकरीबन इसी ढर्रे का हिस्सा है। दरअसल यह एमिशन में तेज गिरावट वाली बात कतई नहीं है, जबकि जलवायु संबंधी लक्ष्यों को हासिल करने के लिये ऐसा तत्‍काल करना जरूरी है।

    यह अध्‍ययन करने वाली टीम में यूनिवर्सिटी ऑफ एक्‍जीटर, यूनिवर्सिटी ऑफ ईस्‍ट एंग्लिया (यूएई),सिसेरो सेंटर फॉर इंटरनेशनल क्‍लाइमेट रिसर्च(CICERO), लुडविग-मैक्सिमिलियन-यूनिवर्सिटी म्‍यूनिख तथा दुनिया के 90 अन्‍य संस्‍थानों के विशेषज्ञ शामिल हैं।

    इस अध्‍ययन के नेतृत्‍वकर्ता और एक्‍जीटर के ग्‍लोबल सिस्‍टम्‍स इंस्‍टीट्यूट के प्रोफेसर पियरे फ्रीडलिंगस्‍टीन ने कहा, “जलवायु परिवर्तन के प्रभाव हम सबके सामने जाहिर है मगर फोस्सिल फ्यूल से निकलने वाले कार्बन के एमिशन को कम करने के लिये की जा रही कार्रवाई की रफ्तार चिंताजनक रूप से बेहद धीमी है।”

    “अब यह अपरिहार्य लगता है कि हम पेरिस समझौते के तहत ग्‍लोबल वार्मिंग में वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के लक्ष्य का उल्‍लंघन कर जाएंगे। ऐसे में हमें कॉप28 में शामिल हो रहे

    वैश्विक नेताओं को दो डिग्री सेल्सियस के लक्ष्य की उम्‍मीदें जिंदा रखने के लिए भी जीवाश्म ईंधन उत्सर्जन में तेजी से कटौती पर सहमत होना पड़ेगा।”

    तो कब हम ग्लोबल वार्मिंग के 1.5 डिग्री सेल्सियस को पार कर लेंगे?

    इस अध्‍ययन में पिछले अनेक सालों में डेढ़ डिग्री सेल्सियस की उम्मीदों को सिर्फ एक साल ही नहीं बल्कि लगातार घायल किये जाने के बाद बचे कार्बन बजट के बारे में भी अनुमान लगाया गया है।

    ग्‍लोबल कार्बन बजट की टीम ने एमिशन के मौजूदा स्‍तरों पर अनुमान लगाया है कि ग्लोबल वार्मिंग लगभग सात वर्षों में लगातार 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक हो जाने की 50% आशंका है।

    यह अनुमान बड़ी अनिश्चितताओं के अधीन है। मुख्य रूप से गैर-CO2 तत्वों से आने वाली अतिरिक्त वार्मिंग से जुड़ी अनिश्चितता की वजह से, विशेष रूप से 1.5 डिग्री सेल्सियस लक्ष्य के लिए जो वर्तमान

    वार्मिंग स्तर के करीब पहुंच रहा है।

    हालांकि, यह साफ है कि बचा हुआ कार्बन बजट बहुत तेजी से खत्म हो रहा है। ऐसे में ग्‍लोबल वार्मिंग में वृद्धि को डेढ़ डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने और जलवायु परिवर्तन के सबसे भयानक परिणामों को टालने की संभावनाएं भी बहुत तेजी से क्षीण हो रही है।

    यूएई के स्‍कूल ऑफ एनवायर्नमेंटल साइंसेज में रॉयल सोसाइटी रिसर्च प्रोफेसर कॅरिन लॅ क्‍वैरे ने कहा, ‘‘सीओ2 के ताजा आंकड़ों से जाहिर होता है कि वर्तमान प्रयास इतने गहरे या व्यापक नहीं हैं कि वैश्विक उत्सर्जन को नेट जीरो की ओर ले जा सकें, लेकिन उत्सर्जन में कुछ रुझान दिखने लगे हैं, जिससे पता चलता है कि जलवायु नीतियां प्रभावी हो सकती हैं।

    वर्तमान में वैश्विक एमिशन के स्‍तरों की वजह से वातावरण में कार्बन डाई ऑक्‍साइड बहुत तेजी से बढ़ रही है। नतीजतन और भी ज्‍यादा जलवायु परिवर्तन हो रहा है और उसके परिणामों की गम्‍भीरता भी बढ़ रही है।”

    “जलवायु परिवर्तन के बुरे प्रभावों से बचने के लिए सभी देशों को अपनी अर्थव्यवस्थाओं को वर्तमान की तुलना में और भी ज्‍यादा तेजी से डीकार्बनाइज करने की जरूरत है।