नई दिल्ली, जागरण संवाददाता। जिंदगी की न टूटे लड़ी, प्यार कर ले घड़ी दो घड़ी.., इक प्यार का नगमा है.. जैसे गीत वर्षों बाद आज भी लोगों की जुबान पर हैं। शब्दों के जादूगर यानि गीतकार, शायर व कवि संतोष आनंद ने हिंदी फिल्मों के लिए ऐसे सैकड़ों गीत लिखे। अपनी रचनाओं के माध्यम से उन्होंने देश-दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई है। दक्षिणी दिल्ली के सुखदेव विहार में रहने वाले प्रसिद्ध गीतकार संतोष आनंद ने की पहचान ऐसे गीतकार के रूप में है जिनके गानों ने दर्जनों फिल्मों को भी बुलंदियों तक पहुंचा दिया।

दिल्ली में बतौर लाइब्रेरियन के तौर पर भी किया था काम

यूपी के सिकंदराबाद जिले में जन्मे संतोष आनंद ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से लाइब्रेरी साइंस की पढ़ाई की थी। शुरू में उन्होंने दिल्ली में बतौर लाइब्रेरियन काम भी किया। उन्हें बचपन से ही कविताओं का शौक था। पढ़ाई व नौकरी के दौरान समय निकालकर वह दिल्ली में होने वाले कवि सम्मेलनों व मुशायरों में भी हिस्सा लेते रहते थे।

हिंदी फिल्मों के लिए लिखे गीत

संतोष आनंद ने हिंदी फिल्मों के लिए एक से बढ़कर एक गीत लिखे। मोहब्बत है क्या चीज, इक प्यार का नगमा है, मेघा रे मेघा रे मत जा तू परदेस, ¨जदगी की न टूटे लड़ी.. जैसे गीत आज भी लोगों की जुबान पर चढ़े हुए हैं। संतोष आनंद ने अपने करियर की शुरुआत फिल्म पूरब और पश्चिम से की थी। वर्ष- 1972 में आइ फिल्म शोर के लिए उन्होंने अपना पहला गाना 'इक प्यार का नगमा है..' लिखा था जिसे मुकेश और लता मंगेशकर ने गाया था। इस फिल्म के गीत ''मैं न भूलूंगा'' के लिए उन्हें करियर का पहला फिल्म फेयर अवार्ड मिला था। उन्होंने वर्ष-1981 में आई फिल्म क्रांति के गीत लिखे थे। यह उस वर्ष की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म थी। इसी साल उन्होंने फिल्म प्यासा सावन के लिए गीत तेरा साथ है तो.. और मेघा रे मेघा.. लिखा था। उन्हें प्रेम रोग फिल्म के गीत के लिए फिल्म फेयर अवार्ड से सम्मानित किया गया।

तीन दर्जन से ज्यादा फिल्मों के लिए लिखे गाने

संतोष आनंद ने बालीवुड की करीब तीन दर्जन फिल्मों के लिए 100 से अधिक गाने लिखे हैं। उनके लिखे गीतों को लता मंगेशकर, महेंद्र कपूर, मोहम्मद अजीज, कुमार शानू और कविता कृष्णमूर्ति आदि गायकों ने आवाज दी है। अभिनेता राज कपूर और मनोज कुमार की कई फिल्मों में संतोष आनंद ने गाने लिखे हैं। वह टीवी रियलिटी शो में भी उपस्थिति दर्ज कराते रहे हैं।

जब तक नई सोच कायम है तभी तक आप जिंदा हैं

संतोष आनंद का मानना है कि आप तभी तक जिंदा हैं जब तक आपमें नई सोच कायम है। यह बात व्यक्ति पर भी लागू होती है और संस्थान पर भी। यही नई सोच समाज को नई दिशा देने, समाज के विभिन्न वर्ग के लोगों में समानता लाने, मानव के उत्थान के लिए काम करने और अपने साथ ही अन्य लोगों के जीवन को रचनात्मक बनाने का काम करती है। उनका मानना है कि जब आप नई सोच के साथ जीते हैं तो आपके लिए बचपन, जवानी या बुढ़ापे की सारी शर्तें खत्म हो जाती हैं।

सपने कभी नहीं मरते

उम्र के ये पड़ाव तो इंसानों ने ही बनाए हैं। हमारे सपने कभी नहीं मरते हैं। हर उम्र में, हर दिन, हर पल इंसान अपने सपनों के साथ जीता है। उन्हें साकार करने के लिए अपना सर्वोत्तम प्रयास करता है वह सही मायने में युवा है, सचेत है और सार्थक है। जब तक जीना है अपने सपनों के साथ जीना है। उन्हें साकार करना है। बचपन, बुढ़ापा, जवानी.. इन सब को अलग नहीं किया जा सकता है। यह सब तो ¨जदगी का कंप्लीट पैकेज है। उम्र के ये पड़ाव तो इंसानों ने ही बनाए हैं।

Edited By: Prateek Kumar