नई दिल्ली, जागरण संवाददाता। पर्यावरण अनुकूल घर नहीं बनने से भी राजधानी में बिजली की मांग में बढ़ोतरी हो रही है। कोरोना महामारी के दौरान बिजली की मांग को लेकर सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) के अध्ययन में यह बात सामने आई है। लॉकडाउन शुरू होने पर बिजली की मांग में काफी कमी आई थी, लेकिन उसके बाद गर्मी बढ़ने के साथ ही इसमें तेजी से वृद्धि हुई है। बिजली बिल कम करने और पर्यावरण को बचाने के लिए इमारतों के बनावट में बदलाव की जरूरत है। सीएसई ने लॉकडाउन और अनलॉक के विभिन्न चरणों में बिजली की मांग का विश्लेषण किया है। इसके अनुसार लॉकडाउन के दौरान एक डिग्री तापमान बढ़ने पर बिजली की मांग में 187 मेगावाट की बढ़ोतरी दर्ज की गई है जो कि पिछले वर्ष की तुलना में छह फीसद अधिक है।

आर्थिक गतिविधियां बंद होने या सीमित दायरे में शुरू होने के बावजूद बिजली की मांग में इस तरह से बढ़ोतरी से स्पष्ट है कि घरों में चलने वाले उपकरण की वजह से लोग ज्यादा बिजली खपत करते हैं। दरअसल पर्यावरण अनुकूल घर नहीं बनने की वजह से गर्मी के दिनों में एसी, कूलर आदि पर निर्भरता बढ़ रही है। साथ ही अध्ययन में यह भी कहा गया है कि ऊर्जा की खपत बढ़ने के लिए संपन्न वर्ग ज्यादा जिम्मेदार हैं। क्योंकि, भारी संख्या में कामगारों के दिल्ली से बाहर जाने के बावजूद इस गर्मी में बिजली की मांग बढ़ी है।

सीएसई की कार्यकारी निदेशक अनुमिता रॉय चौधरी का कहना है कि जलवायु परिवर्तन से भविष्य में तापमान में वृद्धि होगी। इसे ध्यान में रखते हुए घरों की बनावट में बदलाव नहीं किया गया तो एसी व अन्य उपकरणों पर निर्भरता बढ़ेगी। ऊर्जा दक्षता से कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने के उपाय करने के साथ ही पर्यावरण अनुकूल इमारत बनाने की भी जरूरत है।

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