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    उच्च शिक्षा का भगवाकरण करने की कोशिश का आरोप, DU में सिलेबस बदलाव होने पर विवाद

    दिल्ली विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान पाठ्यक्रम में प्रस्तावित बदलावों पर विवाद हो रहा है। कुछ संकाय सदस्यों ने राजनीतिक हस्तक्षेप का आरोप लगाया है जबकि अन्य ने भारतीय ज्ञान प्रणालियों को शामिल करने की आवश्यकता बताई है। पाठ्यक्रम में बुद्ध गांधी और गीता जैसे ग्रंथों को शामिल करने का प्रस्ताव है जिसका उद्देश्य राष्ट्रीय अखंडता को बनाए रखना है।

    By Ritika Mishra Edited By: Rajesh KumarUpdated: Tue, 06 May 2025 05:12 PM (IST)
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    डीयू के मनोविज्ञान पाठ्यक्रम में बुद्ध, गांधी और गीता को शामिल करने का प्रस्ताव। फाइल फोटो

    जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) में स्नातक मनोविज्ञान पाठ्यक्रम में प्रस्तावित संशोधनों ने विवाद को जन्म दे दिया है। कुछ संकाय सदस्यों ने राजनीतिक हस्तक्षेप और उच्च शिक्षा का भगवाकरण करने का प्रयास करने का आरोप लगाया है। जबकि अन्य ने इस कदम का बचाव करते हुए कहा है कि राष्ट्रीय अखंडता को बनाए रखने और भारतीय ज्ञान प्रणालियों को शामिल करने के लिए यह आवश्यक है।

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    पेपर में बदलाव की सिफारिश

    डीयू की अकादमिक मामलों की स्थायी समिति ने मनोविज्ञान पाठ्यक्रम में प्रस्तावित शांति का मनोविज्ञान नामक पेपर में बदलाव की सिफारिश की है। समिति के अध्यक्ष ने पेपर में इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष, कश्मीर, भारत-पाकिस्तान तनाव और पूर्वोत्तर के मुद्दों जैसे केस स्टडीज को शामिल करने पर आपत्ति जताई है।

    उन्होंने शांति स्थापना और संघर्ष समाधान पर पेपर के तहत पाठ्यक्रम में गौतम बुद्ध, महात्मा गांधी और जैन दर्शन की परंपराओं के साथ महाभारत और भगवद गीता जैसे ग्रंथों को शामिल करने का प्रस्ताव दिया है।

    एसआरसीसी में वाणिज्य के प्रोफेसर और स्थायी समिति और अकादमिक परिषद के सदस्य प्रोफेसर हरेंद्र तिवारी ने पाठ्यक्रम में भारतीय क्षेत्रों को संघर्ष क्षेत्र के रूप में चित्रित करने पर सवाल उठाए। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि पाठ्यक्रम में कश्मीर, नागालैंड और मणिपुर को संघर्ष क्षेत्र बताया गया है। क्या कोई भारतीय यह स्वीकार करेगा कि कश्मीर विवादित भूमि है या पूर्वोत्तर एक संघर्ष क्षेत्र है?

    उन्होंने कहा कि कश्मीर कानूनी रूप से भारत का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि शांति स्थापना और संघर्ष समाधान को पाठ्यक्रम में पढ़ाया जाना चाहिए। लेकिन समाधान कहीं भी शामिल नहीं है। इसके लिए भारतीय ग्रंथ मूल्यवान मनोवैज्ञानिक अंतर्दृष्टि प्रदान कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि महाभारत या गीता से उदाहरण लिए जाने चाहिए थे, ये ग्रंथ पूरी दुनिया में स्वीकार किए जाते हैं और अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालयों में भी इनकी चर्चा होती है।

    एक अन्य सदस्य ने कहा कि गांधी और बुद्ध से बड़े कोई प्रतीक नहीं हैं, वे शांति और सार्वभौमिक मूल्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं। उन्होंने कहा कि पाठ्यक्रम में बदलाव का प्रस्ताव पश्चिमी विचारकों के अति-प्रतिनिधित्व को कम करने और भारतीय दृष्टिकोण लाने के उद्देश्य से किया गया है।

    राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के तहत स्नातक (सातवें और आठवें सेमेस्टर) और स्नातकोत्तर मनोविज्ञान पाठ्यक्रम में संशोधन के लिए 2 मई को एक बैठक के दौरान सुझावों पर चर्चा की गई।

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