नई दिल्ली, संजीव कुमार मिश्र। चलो सड़कों को भी अवसर मिला, वर्ना कहां हर वक्त वाहनों के बोझ तले दबी रहती थीं, फिलवक्त खाली सड़कों की थकावट दूर हो रही है। हमारी धरोहर भी सुस्ता रही हैं, प्रकृति मुस्करा रही है... देखो कैसा सुकून इनके चेहरे पर खिल खिला रहा है। इस सन्नाटे में प्रकृति की गुनगुनाहट को धैर्य से सुनो...फिर महसूस करना कि ये लॉकडाउन मुसीबत है कि आपकी सेहत का तोहफा है। अब तो हम सुविधा संपन्नता के साथ घरों में वक्त बिता रहे हैं, दिल्ली का तो इतिहास रहा है हर बड़ी बीमारी से ...असुविधाओं के दौर में भी पार पा लिया था। 

दिल्ली हारती नहीं है, मात देना जानती है...। दिलों पर राज करना जानती है...हर किसी को दिल में बसा लेना जानती है...। अभी दिल्ली-एनसीआर सहित देश महामारी की तकलीफ से गुजर रहा है, ऐसे में भी देखिए, दिल्ली खामोशी से मुस्करा रही है...। सड़कें सुकून में हैं, प्रकृति खुलकर सांस ले रही है, धरोहर की धरा अलग आनंद ले रही है। वैसे भी दिल्ली के चुनौतियों भरा इतिहास रहा है प्लेग, कॉलरा, इंफ्लुएंजा, पोलियो, डेंगू, चिकनगुनिया हर बीमारी को मात दे फिर उठ खड़ी हुई...जी उठी है। इसी जिजीविषा के साथ दिल्ली आज फिर तत्पर है।  फिलहाल पूरे देश के साथ दिल्‍ली-एनसीआर कोरोना जैसी गंभीर और खतरनाक बीमारी से जूझ रहा है।

बैलफोर मानते थे कि दिल्ली हेल्दी है : बीमारियों की बात करें तो भारत में 19 वीं से 21वीं सदी के बीच कॉलरा (हैजा), प्लेग, पोलियो, स्मॉल पॉक्स समेत कई बीमारियां फैलीं। कॉलरा सबसे पहले 1817 में फैला। इसके बाद 1829, 1852, 1863, 1881 और 1899 में भी इसने मानवजाति को काफी नुकसान पहुंचाया। दिल्ली में भी कॉलरा बहुत से लोगों का काल बना। करीब 1861 में तैयार हुई कमिश्नर की रिपोर्ट दिल्ली में कॉलरा बीमारी व उससे लड़ने के जज्बे के बारे में काफी कुछ बताती है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि ‘1857 से पहले दिल्ली, ब्रितानियों के रुकने के लिहाज से सबसे अस्वास्थ्यकर जगह थी। उत्तर भारत में बाकि मिलिट्री स्टेशन के मुकाबले इसे सबसे ‘अनहेल्दी मिलिट्री स्टेशन’ कहा जाता था। इसी अस्वास्थ्यकर माहौल की वजह से ही ब्रितानियां सिपाही का लंबे समय तक प्रवास मुमकिन नहीं होता था। शहर यमुना के किनारे स्थित है, उत्तर की तरफ रिज एरिया, छोटी पहाड़ी भी थी। जिसे 1857 की क्रांति के दौरान नष्ट कर दिया गया। कमिश्नर की इसी रिपोर्ट में डॉ बैलफोर के हवाले से दिल्ली में उन दिनों फैली बीमारी कॉलरा का जिक्र भी है। डॉ बैलफोर दिल्ली में बतौर सिविल सर्जन कई सालों तक रहे थे।

दिल्ली अनहेल्दी है, यह विचार भी शायद ब्रिटिश छावनी में बीमार पड़े सैनिकों की वजह से ही आया होगा। इसमें कोई संदेह नहीं कि दिल्ली में बहुत सी बीमारियों का प्रकोप रहा है। इसमें बुखार सबसे ऊपर है। लेकिन यदि समय पर इलाज हो तो बुखार बहुत खतरनाक नहीं है। लेकिन कई अन्य बीमारी मसलन सनस्ट्रोक, स्मॉल पॉक्स हैं। लेकिन फिर भी मुझे लगता है कि अन्य शहरों की तुलना में कॉलरा से निपटने में दिल्ली का प्रदर्शन बेहतर रहा है। 1845 से 1856 के बीच यहां कॉलरा के मामले बहुत नहीं आए। जबकि इसी दौरान दोआब के क्षेत्र काफी प्रभावित रहे। डॉ बैलफोर मानते थे कि दिल्ली के लोग हेल्दी हैं। हां, वो चौड़ी सड़कों वाले इलाकों से तो प्रभावित थे लेकिन बावजूद इसके कॉलरा समेत अन्य बीमारियों से निपटने के लिए घनी आबादी वाले इलाकों को दुरुस्त करने, ड्रेनेज सिस्टम को सुधारने पर बल दिया था। रिपोर्ट में जिक्र है कि 1857 की क्रांति के बाद भी बहुत से सिपाही कॉलरा से ग्रसित हुए थे।’

रैबिज से निपटने को अपनाई थी आइसोलेशन की प्रक्रिया : दिल्ली में महामारी पर पंजाब की रिपोर्ट काफी कुछ जानकारी देती है। पंजाब ने बकायदा डॉ स्मिथ की अगुवाई में इस पर काफी शोध किया एवं रिपोर्ट प्रकाशित की। जिसमें कहा गया है कि सबसे पहले महामारी कुदसिया बाग में फैलनी शुरू हुई। वह एक टूटा फूटा मकान था, जिसमें एक बुजुर्ग और बच्चे थे। उन्हें तत्काल चिकित्सकीय सुविधा मुहैया कराई गई थी। यह 11 जून का दिन था, जब पहला कॉलरा का मामला सामने आया था। इसके बाद दूसरा केस 18 जून को आया। जबकि इसके बाद महज 19 दिनों में 32 मामले सामने आए थे। इनमें से 32 लोगों की मौत हो गई थी। बाद में मामले पांच हजार से भी ज्यादा हो गए थे।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 28 जून को जेल में एक व्यक्ति को भी महामारी ने अपनी चपेट में लिया था। यह व्यक्ति दो दिन पहले ही गुड़गांव (अब गुरुग्राम) से आया था। इसी दिन एक महिला भी बीमारी की चपेट में आई और 19 घंटे के बाद उसकी मौत हो गई। लेकिन इन घटनाओं के बीच बीमारी से निजात के लिए युद्धस्तर पर उपाय शुरू किए जा चुके थे। पुराने जीर्णशीर्ण घरों को दुरुस्त किया जाने लगा। लोगों को कैंपों में रखा गया। साफ सफाई का ध्यान दिया गया। लोगों में पैनिक ना फैले इसका विशेष ध्यान दिया गया था। दिल्ली अभिलेखागार विभाग के हेड ऑफ आफिस संजय गर्ग कहते हैं कि दिल्ली में कॉलरा ही नहीं प्लेग, इंफ्लुएंजा यहां तक की रैबिज से निपटने के लिए भी एक तरह के आइसोलेशन की प्रक्रिया अपनाई गई थी। सबसे प्रभावी कदम तो लोगों को अपने घरों में रहने की सलाह ही देना था। उन दिनों लोग इस सलाह पर अमल भी करते थे।

फोड़ा जिसे कहते थे औरंगजेब बीमारी : 1861 की कमिश्नर की रिपोर्ट में दिल्ली की एक अन्य बीमारी का जिक्र है। जिसे आमबोलचाल की भाषा में फोड़ा अथवा जिसे औरंगजेब बीमारी का नाम भी दिया गया था। रिपोर्ट की मानें तो 1859-60 के बीच ब्रितानिया सिपाही बड़ी बुरी तरह इससे प्रभावित हुए थे। सिपाही लगभग सभी मौसम में इससे प्रभावित होते थे लेकिन स्थानीय निवासी अधिकतर गर्मियों में ही इससे पीड़ित होते थे।

गालिब ने जब कहा प्लेग खत्म हो जाएगा तब मरूंगा : प्लेग को लेकर एक कहावत बहुत प्रसिद्ध थी। कहा जाता था कि प्लेग सिंधु नदी नहीं पार कर सकता, पर 19वीं शताब्दी में प्लेग ने भारत पर आक्रमण कर दिया। सन् 1815 में तीन वर्ष के अकाल के बाद गुजरात के कच्छ और काठियावाड़ में इसने डेरा डाला। अगले वर्ष यह बीमारी हैदराबाद और अहमदाबाद पहुंच गई। 1836 में पाली और मेवाड़ भी पहळ्ंची। लेकिन रेगिस्तान के बालू में अधिक चल न पाया। 1823 में केदारनाथ पहुंचा व इसके बाद 1836 के बाद उत्तर भारत पहुंचा। दिल्ली भी प्लेग से जूझी। काफी जानमाल का नुकसान हुआ। दिल्ली में प्लेग से मिर्जा गालिब भी डर गए थे? उन्हें भी मौत का खतरा लगने लगा था? लेकिन इतिहासकार इससे भिन्न राय रखते हैं।

अजमल सिद्दकी कहते हैं कि गालिब ने कुल दो तीन पत्रों में जिक्र किया था। यह एक विधा होती है किता-ए-तारीख। पत्र में किसी भी बीमारी का जिक्र नहीं है, कि क्या बीमारी थी, कितना प्रभाव था। हां, गालिब को एक अंदाजा था कि 1860 में वो मर जाएंगे। लेकिन यह समय आकर चला गया। गालिब सकुशल थे। इस पर उनके दोस्त मीर मेंहदी मजरूह ने खत लिखा, बड़े मजाकिया अंदाज में कहा कि गालिब, तुम तो मरने वाले थे लेकिन मरे नहीं? गालिब ने पत्र लिखा, 1860 वाली बात गलत नहीं थी। मैंने सही भविष्यवाणी की थी, लेकिन मैं मरता उसके पहले ही प्लेग फैल गया। अब मेरे नसीब में नहीं था कि ऐसी जलील मौत मरूं। अब जब प्लेग खत्म हो जाएगा तब मरूंगा।

धैर्य-संयम का परिचय देती रही है दिल्ली : इतिहासकार आरवी स्मिथ कहते हैं कि दिल्ली में समय-समय पर बहुत सी बीमारियों ने जान माल का नुकसान पहुंचाया। कफ्र्यू तो नहीं पता लेकिन 1900-1905 में दिल्ली ने इंफ्लुएंजा का भी दंश झेला। इसमें बहुत से लोगों की मौत हुई थी। एक-एक इलाके में छहसात लोग मर रहे थे। इसी तरह प्लेग भी फैला था। प्लेग के दौरान तो मकानों में आग लगा दी गई थी। जिस जगह प्लेग का प्रभाव ज्यादा था वहां बहुत से मकानों को जला ही दिया जाता था। लोग कैंपों में रहने लगे थे। स्वास्थ्य सुविधाएं कम तो थी लेकिन लोगों ने धैर्य व संयम का परिचय दिया था। जिसकी वजह से दिल्ली प्लेग ही नहीं अन्य बीमारियों को हराने में कामयाब हो पाई। लेकिन यह सिलसिला यहीं नहीं थमा।

जब देश आजादी के बाद खुली हवा में सांस ले रहा था तो दिल्ली एक बार फिर बीमारी की चपेट में आई। इस बार संक्रामक हेपेटाइटिस ने दिल्ली को जकड़ा। जोसेफ एम डेनिस ने इस बाबत एक रिपोर्ट तैयार की थी, जिसे सैन फ्रांसिस्को में हुए वार्षिक मेडिकल कान्फ्रेंस में पेश किया गया था। जिसमें कहा गया है कि 1955 दिसंबर महीने में दिल्ली में अचानक संक्रामक हेपेटाइटिस फैल गया। यह किसी ब्लास्ट की तरह था, जब अचानक मरीज सामने आने लगे। रोकथाम के साथ ही अध्ययन के लिए एक कमेटी भी गठित की गई थी। जिसने पाया कि यह दिल्ली के ट्रीटेड वाटर सप्लाई की वजह से हुआ। करीब सात हजार केस आए थे, 29 हजार 300 केस तो पीलिया के भी थे।

अनुमान लगाया गया था कि करीब लाखों की संख्या में लोग प्रभावित हुए थे। हालांकि इस बार भी दिल्ली ने दम लगाकर मुकाबल किया और बीमारी को शिकस्त दी थी। लोग पानी उबाल कर ही पीते थे और साफ सफाई का ध्यान देते थे। डॉक्टरों का परामर्श मानते थे। तभी एक समय के उपरांत मामले कम हो गए थे। अभी भले ही कोरोना संक्रमण एक महामारी की शक्ल अख्तियार कर चुका है। दिल्ली-एनसीआर भी इसकी चपेट में आ गया है लेकिन जिस तरह लोग डॉक्टरों से राय शुमारी कर रहे हैं। खुद को घरों में क्वारंटाइन किए हुए हैं। उससे यह भी संभावना बलवती होती है कि बहुत जल्द इसपर अंकुश लगा लिया जाएगा।

123 साल पुराना कानून : कोरोना से निपटने के लिए 123 साल पुराना कानून हथियार बना है। महामारी बीमारी कानून 1897 में बना। जो 4 फरवरी को लागू किया गया। महामारी कानून 1897 संभवत सबसे छोटा कानून है, जिसमें सिर्फ चार धाराएं हैं। महामारी वाली खतरनाक बीमारियों को फैलने से रोकने और इसकी बेहतर रोकथाम के लिए अंग्रेजी हुकूमत के दौरान यह कानून बनाया गया था। आजादी के बाद महामारी कानून को एक नवंबर 1956 को कुछ राज्यों में छोड़कर पूरे भारत में लागू किया गया था।

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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