इस साल गर्मी का सीजन वैज्ञानिकों के लिए बना पहेली, पहले वर्षा-फिर तपिश; आखिर क्या है मौसम का पैटर्न
इस साल गर्मी का मौसम वैज्ञानिकों के लिए पहेली बना हुआ है जिसे वे जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग से जोड़कर देख रहे हैं। मानसून की चाल थमने और शुष्क हवाओं के चलने से तापमान और उमस बढ़ी है। लू अब नए क्षेत्रों में भी फैल रही है और शहरी इलाकों में स्थिति और भी खराब है। जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए प्रभावी योजनाएं और सुरक्षा इंतज़ाम ज़रूरी हैं।

संजीव गुप्ता, नई दिल्ली। इस साल गर्मियों का मौसम जहां आज जन के लिए पहेली बना हुआ है वहीं मौसम विज्ञानी इसकी वजह जानने में लगे हैं। उन्होंने इसे सीधे तौर पर जलवायु परिवर्तन एवं ग्लोबल वॉर्मिंग से जोड़ा है। उनका कहना है कि इससे मौसम का पैटर्न बदलता जा रहा है।
पहले वर्षा, फिर तपिश- बदलता मौसम पैटर्न
इस सीजन में पहले वर्षा व बादलों के कारण तापमान सामान्य से कम बना रहा। दिल्ली में तो इस साल मई में रिकॉर्ड 186.4 मिमी वर्षा हुई। लेकिन जून के पहले हफ्ते से हालात अचानक बदल गए। पश्चिमी विक्षोभ की कमी एवं थार रेगिस्तान से उठती सूखी गर्म हवाएं पूरे उत्तर भारत को तपाने लगीं। हालांकि रविवार अल सुबह से मौसम ने वापस करवट ली है।
जलवायु परिवर्तन से बदला मौसमी सिस्टम
जलवायु विशेषज्ञों का मानना है कि इस साल की भीषण गर्मी सिर्फ मौसमी उतार-चढ़ाव नहीं है, बल्कि ग्लोबल वार्मिंग के चलते मौसम प्रणाली में हुए बदलाव का नतीजा है। स्काइमेट वेदर के उपाध्यक्ष (मौसम विज्ञान एवं जलवायु परिवर्तन) महेश पलावत कहते हैं, “इस बार मानसून की चाल बीच में थम गई तो शुष्क उत्तर-पश्चिमी हवाएं लगातार चलती रहीं। इससे न सिर्फ तापमान बढ़ा है बल्कि आर्द्रता भी बहुत ज्यादा हो गई।
मौसम विभाग के पूर्व महानिदेशक डॉ के जे रमेश का कहना है, ग्लोबल वार्मिंग से हवा में नमी पकड़ने की क्षमता हर एक डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ने पर सात प्रतिशत बढ़ जाती है। इसीलिए अब सूखे इलाकों में भी उमस बढ़ रही है और गर्मी का असर भी ज़्यादा जानलेवा बन गया है।
नए इलाके भी आ गए चपेट में
एक नए अध्ययन के मुताबिक लू अब राजस्थान या विदर्भ तक सीमित नहीं रही। अरुणाचल प्रदेश, केरल, और जम्मू-कश्मीर जैसे पारंपरिक रूप से ठंडे माने जाने वाले राज्यों में भी पिछले दो दशकों में लू देखी गई है। 1981 से 2019 के बीच उत्तर इंडिया में अत्यधिक गर्मी से असहनीय दिनों की संख्या में लगातार वृद्धि हुई है।
हवा की चाल भी बनी आफत
नए शोध बताते हैं कि उत्तर भारत में प्री-मानसून के महीनों (मार्च से मई) में हवा की रफ्तार घट गई है, जिससे ठंडी हवाएं गर्म क्षेत्रों तक नहीं पहुंच पा रहीं। वहीं, दक्षिण भारत में तेज़ हवाएं नमी को बेहतर ढंग से फैला रही हैं। ये हवा के बड़े पैमाने पर हो रहे बदलाव का संकेत हैं, जो शायद मानसून प्रणाली की चाल को भी प्रभावित कर रहे हैं।
शहरी इलाकों में अलग संकट
शहरों में ''अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट'' और लोकल माइक्रोक्लाइमेट बदलाव से हालात और खराब हो रहे हैं। जलवायु शोधकर्ता डा पलक बाल्यान के अनुसार, हीट स्ट्रोक के मामले बढ़ रहे हैं। मौसमी बदलाव अब मानसून के महीनों तक लू को खींच रहे हैं। हमें अब स्थानीय स्तर पर ठोस प्लानिंग और हेल्थ रिस्पांस की ज़रूरत है।
मौसम की मार से बचाव के सुझाव
जलवायु विशेषज्ञों का कहना है कि प्रभावी हीट एक्शन प्लान, मजबूत अर्ली वार्निंग सिस्टम और शहरों के लिए जलवायु परिवर्तल झेलने वाले ढांचागत विकास की जरूरत है। साथ ही लू के सामाजिक-आर्थिक असर को कम करने के लिए गरीब, बच्चों, बुज़ुर्गों व बाहरी काम करने वाले लोगों के लिए विशेष सुरक्षा इंतज़ाम भी आवश्यक हैं।
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