जागरण संवाददाता, नई दिल्ली : जश्न ए रेख्ता के दूसरे दिन साहिर लुधियानवी पर आयोजित सत्र 'पल दो पल का शायर हूं' में गीतकार जावेद अख्तर ने कहा कि अपनी कविताओं के जरिये सच्चाई बयां करने और सही बात के लिए लड़ते समय कई बार उग्र रवैये के लिए पहचाने जाने वाले साहिर असल जिदगी में बिल्कुल विपरीत थे। अख्तर ने कहा कि वह विरोधाभासी व्यक्तित्व वाले इंसान थे। यदि मैं कहूं कि वह अच्छे व्यक्ति थे, तो उनके बारे में इससे अधिक उबाऊ बात और कोई नहीं हो सकती। जब वह अच्छे होते थे तो उनकी अच्छाई की कोई सीमा नहीं थी और जब वह किसी से गुस्सा होते थे, तो उसकी भी कोई सीमा नहीं होती थी।

मेजर ध्यानचंद स्टेडियम में आयोजित जश्न-ए-रेख्ता में जावेद अख्तर ने कहा साहिर एक अमीर जमींदार की इकलौती संतान थे। साहिर जब बच्चे थे तभी उनके माता पिता का तलाक हो गया था, जिसके बाद वह अपनी मां के साथ रहे और उन्होंने एक सफल कवि एवं गीतकार बनने से पहले गरीबी में जीवन बिताया। लुधियानवी ने जीवन में जो कुछ सहा, उसे देखकर यह सोचना गलत होगा कि इतने सफल कवि का जीवन आसान रहा होगा। अख्तर ने कहा, क्या आपको लगता है कि एक आसान जीवन जीने वाला व्यक्ति अपनी पुस्तक का नाम 'तल्खियां' रखता, यह संभव नहीं है। अख्तर ने बताया कि लुधियानवी का अपनी मां के साथ जो लगाव और रिश्ता था, वैसा मां-बेटा का रिश्ता उन्होंने कहीं नहीं देखा। उन्होंने बताया कि लुधियानवी कहीं भी मुशायरे के लिए कार से जाते थे तो अपनी मां को भी ले जाते थे। लुधियानवी मंत्रियों को झिड़क सकते थे, निर्देशकों, निर्माताओं एवं संगीतकारों से लड़ सकते थे, लेकिन दूसरी ही तरफ वह छोटी-छोटी बातों के लिए अपनी मां की मंजूरी लेते थे। उन्होंने कहा, वह केवल एक व्यक्ति नहीं थे, उनके भीतर कई इंसान रहते थे। --बाक्स--

प्रकृति को भूल गए हैं लोग

आजकल के गानों में प्रकृति की मौजूदगी संबंधी एक सवाल के जवाब में जावेद ने कहा कि प्रकृति को लोग भूल गए हैं। जरा दिमाग पर जोर देकर अपने आप से ही पूछिये कि आखिरी बार कब चौदहवीं का चांद देखा था। झरने के पास आखें बंद कर कब बैठे। पेड़ों की छांव में कब हवाओं को महसूस किया। दरअसल अब इंसान सीमेंट के जंगल में रहता है। प्रदूषण इतना है कि चांदनी भी नहीं दिखती। इसका असर संगीत पर भी पड़ा है। क्यों कि गीत संगीत समाज का ही हिस्सा है। साहिर के ताजमहल पर लिखी एक नज्म पर चर्चा के दौरान जावेद ने कहा कि इस नज्म को लिखने से पहले उन्होंने ताजमहल का कभी दीदार नहीं किया था। मुनव्वर राणा और राहत इंदौरी ने साझा किया मुशायरे का सफर

'मुशायरा और हम' सत्र में शायर मुनव्वर राणा और राहत इंदौरी ने अपने मुशायरे के सफर पर विस्तार से दर्शकों से अनुभव साझा किए। राहत इंदौरी ने जौन एलिया से जुड़े कई प्रसंग साझा किए। हिदी प्रकाशकों द्वारा उर्दू शायरों की किताबें बडे़ पैमाने पर छापे जाने का दोनों ही शायरों ने स्वागत करते हुए कहा कि यह भारत की गंगा जमुनी तहजीब को पुख्ता करता है। भारत में इन दिनों मुशायरे और कवि सम्मेलन का आयोजन एक साथ होने के नए चलन पर दोनों शायरों ने कहा कि मुशायरा और कवि सम्मेलन इसलिए भी एक साथ जरुरी है क्योंकि इससे खराब शायरी की गुंजाइश कम हो जाती है। वरना आमतौर पर हमारा मुशायरा मदरसिया हो गया है और कवि सम्मेलन सांप्रदायिक। यदि मुशायरे में 30 फीसद भी गैर मुस्लिम रहें तो मुशायरा अच्छा होने लगे। मुनव्वर राना ने दर्शकों से भी अपील की कि यदि कोई खराब शेर पढ़े तो उसका विरोध करें। उन्होंने नए शायरों को नसीहत दी कि फेसबुक, यूटयूब पर लाइक मिलने से अच्छा शायर नहीं बना जा सकता।

Posted By: Jagran

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