रामलीला मैदान में विपक्ष का जमावड़ा, लेकिन इंडिया गठबंधन की रैली से दूर दिखें 'Gen-Z'
दिल्ली के रामलीला मैदान में विपक्ष की रैली में कांग्रेस कार्यक्रता तो पहुंचे लेकिन विपक्ष की अपेक्षा के अनुरूप जेन-जी ...और पढ़ें

कांग्रेस नेता राहुल गांधी खुले वाहनों में मार्च निकालते। फोटो-दैनिक जागरण
HighLights
रामलीला मैदान में आइएनडीआइए की रैली में जुटी भीड़।
जेन-जी (युवा पीढ़ी) की भागीदारी अपेक्षा से कम रही।
विपक्षी नेताओं ने युवाओं को लोकतंत्र बचाने का आह्वान किया।
संजीव गुप्ता, नई दिल्ली। रामलीला मैदान में रविवार को आइएनडीआइए की रैली में भीड़ तो जुटी, लेकिन जिस जेन-जी (युवा पीढ़ी) को विपक्ष अपने आंदोलन का अहम हिस्सा बनाने की कोशिश कर रहा था, उसकी मौजूदगी अपेक्षाकृत कम नजर आई।
रैली में विभिन्न राज्यों से आए कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ समाजवादी पार्टी और वामपंथी दलों के समर्थकों का जमावड़ा भी रहा। विपक्षी नेताओं ने मंच से युवाओं और जेन-जी को लोकतंत्र की रक्षा के लिए एकजुट होने का आह्वान किया, लेकिन मैदान में पार्टी कार्यकर्ताओं की संख्या अधिक दिखाई दी।
विभिन्न राज्यों से पहुंचे कांग्रेस कार्यकर्ता
रैली में शामिल होने के लिए सुबह से ही विभिन्न राज्यों से कांग्रेस कार्यकर्ताओं के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया था। उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और अन्य राज्यों से आए कार्यकर्ताओं ने पार्टी के झंडे और बैनर लेकर खूब नारेबाजी भी की।
समाजवादी पार्टी और वामपंथी दलों के समर्थक भी बड़ी संख्या में पहुंचे। रामलीला मैदान के बाहर भी कार्यकर्ताओं की भीड़ जुटी रही और वे विभिन्न नेताओं के समर्थन में नारे लगाते रहे।
विपक्षी नेताओं ने खुले वाहनों में निकाला मार्च
रैली को एक अलग राजनीतिक स्वरूप देने के लिए विपक्षी नेताओं ने कनॉट प्लेस के मिंटो रोड जंक्शन से रामलीला मैदान तक खुले वाहनों में मार्च निकाला। इस दौरान कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, राहुल गांधी, सोनिया गांधी, ममता बनर्जी, अखिलेश यादव सहित कई प्रमुख नेता एक साथ नजर आए।
मार्च के दौरान सड़क के दोनों ओर खड़े कार्यकर्ताओं ने नेताओं का स्वागत किया और नारेबाजी की। रामलीला मैदान के बाहर भी नेताओं के पहुंचने के समय समर्थकों का उत्साह देखने को मिला।
युवाओं की भागेदारी कम
हालांकि, रैली में युवाओं की भागीदारी को लेकर विपक्ष की अपेक्षाएं पूरी होती नहीं दिखीं। मंच से जेन-जी और युवाओं को आंदोलन से जुड़ने का संदेश दिया गया, लेकिन मैदान में पारंपरिक राजनीतिक दलों के समर्थकों का दबदबा रहा। ऐसे में रैली की भीड़ विपक्षी दलों के संगठनात्मक जुटान का प्रदर्शन तो बनी, लेकिन युवा मतदाताओं तक पहुंच बनाने की चुनौती बरकरार रही।
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