दिल्ली में बेअसर है 'नैचुरल वॉशआउट', बारिश के 5 दिन बाद ही हवा में क्यों लौट आते हैं जहरीले कण?
दिल्ली में बारिश के बाद हवा साफ तो होती है, लेकिन प्रदूषण के कण पांच दिनों के भीतर वापस लौट ...और पढ़ें

दिल्ली में बारिश के बाद भी बढ़ जाता है प्रदूषण। फोटो-जागरण आर्काइव।
HighLights
बारिश के बाद दिल्ली में प्रदूषण 5 दिन में लौटता है।
अध्ययन में 2003 से 2024 तक 612 घटनाओं का विश्लेषण हुआ।
प्रदूषण का स्थायी समाधान उत्सर्जन नियंत्रण में है।
संजीव गुप्ता, नई दिल्ली। दिल्ली में बारिश के बाद भले ही हवा साफ हो जाती है, लेकिन यह राहत ज्यादा दिनों तक नहीं टिकती। बारिश थमने के पांच दिन के भीतर ही हवा में प्रदूषण के कण फिर पहले के स्तर पर पहुंच जाते हैं। यह एक नए अध्ययन में सामने आया है।
इसमें वर्ष 2003 से 2024 तक दिल्ली में हुई वर्षा की 612 घटनाओं का विश्लेषण किया गया। अध्ययन के मुताबिक, इनमें से 310 मामलों यानी आधे से अधिक में बारिश के पांच दिन के भीतर प्रदूषण के कण बारिश से पहले के स्तर पर लौट आए।
बारिश के बाद भी क्यों बढ़ जाता है प्रदूषण?
अध्ययन में साफ किया गया है कि वर्षा प्रदूषण का स्थायी समाधान नहीं है। वाहनों, उद्योगों, निर्माण गतिविधियों और दूसरे स्रोतों से लगातार होने वाला उत्सर्जन की हवा में प्रदूषण के कणों को दोबारा बढ़ा देता है।
इसके अलावा वातावरण में मौजूद गैसों के बीच रासायनिक प्रतिक्रियाओं से भी नए प्रदूषक कण बनते रहते हैं। यही वजह है कि तेज वर्षा भी प्रदूषण से लंबे समय तक राहत की गारंटी नहीं देती।
ज्यादा बारिश यानी प्रदूषण से छुटकारा?
शोधकर्ताओं के अनुसार, बारिश की मात्रा और प्रदूषण के दोबारा बढ़ने की गति के बीच कोई महत्वपूर्ण संबंध नहीं मिला। यानी ज्यादा वर्षा होने का यह मतलब नहीं है कि हवा लंबे समय तक साफ रहेगी। हालांकि, वर्षा की करीब 45 प्रतिशत घटनाओं में 30 दिन बाद भी प्रदूषण के कण वर्षा से पहले के स्तर पर नहीं पहुंचे थे।
अध्ययन में अलग-अलग मौसमों में प्रदूषण के दोबारा बढ़ने की अवधि भी अलग पाई गई। मानसून में यह औसतन छह दिन, गर्मी और सर्दी में पांच-पांच दिन और मानसून के बाद महज तीन दिन रही। ये आंकड़े मध्यिका पर आधारित हैं।
वातावरण के कणों का अध्ययन
शोधकर्ताओं ने 22 वर्षों के दौरान उपग्रह से मिले आंकड़ों के साथ बारिश और मौसम संबंधी आंकड़ों का विश्लेषण किया। इसमें पांच मिमी से अधिक दैनिक वर्षा वाली घटनाओं को शामिल किया गया।
प्रदूषण के कणों को मापने के लिए एयरोसोल आप्टिकल डेप्थ (एओडी) तकनीक का इस्तेमाल हुआ। यह वातावरण में मौजूद कणों द्वारा प्रकाश को रोकने या बिखेरने की मात्रा बताती है। यह सीधे जमीन पर दर्ज होने वाले एक्यूआइ का माप नहीं है।
प्रदूषण पर किया गया शोध
यह अध्ययन अमृता विश्व विद्यापीठम, केरल के अमृता-नेचुरल रिसोर्स मानिटरिंग लैब की गायत्री बालचंद्रन और डॉ. सुमित सतींद्रन ने किया है। व्हाई रेनफॉल अलोन कैननॉट मिटिगेट अर्बन पाल्यूशन शीर्षक से प्रकाशित यह शोध जर्नल ऑफ एटमास्फेरिक एंड सोलर-टरेस्ट्रियल फिजिक्स में प्रकाशित हुआ है।
शोधकर्ताओं का निष्कर्ष है कि बारिश से मिलने वाली अस्थायी राहत के बजाय प्रदूषण के स्रोतों से उत्सर्जन में लगातार कमी लाना जरूरी है।
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