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दिल्ली HC ने केवीएस शिक्षक का स्थानांतरण रखा बरकरार, बाइपोलर डिसऑर्डर को मेडिकल दिव्यांगता नहीं माना

Published: Sun, 29 Mar 2026 06:26 PM (GMT+05:30)

दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्रीय विद्यालय संगठन (केवीएस) के एक शिक्षक के स्थानांतरण को बरकरार रखा है। कोर्ट ने कहा ...और पढ़ें

कोर्ट ने फैसले में कहा कि बाइपोलर डिसऑर्डर के संबंध में लागू स्थानांतरण नीति मेडिकल दिव्यांगता वाले नियम के तहत नहीं आता।

कोर्ट ने फैसले में कहा कि बाइपोलर डिसऑर्डर के संबंध में लागू स्थानांतरण नीति मेडिकल दिव्यांगता वाले नियम के तहत नहीं आता।

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विनीत त्रिपाठी, नई दिल्ली। केंद्रीय विद्यालय संगठन (केवीएस) के एक शिक्षक के स्थानांतरण को दिल्ली हाई कोर्ट ने यह कहते हुए बरकरार रखा कि स्थानांतरण नौकरी का एक हिस्सा है और स्थानांतरण हो सकने वाले पद पर काम करने वाला कर्मचारी अपने अधिकार के तौर पर किसी खास जगह पर तैनाती की मांग नहीं कर सकता।

याचिका खारिज करते हुए न्यायमूर्ति अनिल क्षत्रपाल व न्यायमूर्ति अमित महाजन की पीठ ने कहा कि अगर दिव्यांगता प्रमाण पत्र न हो, तो बाइपोलर डिसऑर्डर के संबंध में लागू स्थानांतरण नीति मेडिकल दिव्यांगता वाले नियम के तहत नहीं आता।

कुछ खास मामलों में ही मान्यता दी

याचिकाकर्ता ने दिल्ली से बाबूगढ़ कैंट स्थित केंद्रीय विद्यालय में स्थानांतरण रोकने से इन्कार करने के केंद्रीय प्रशासनिक ट्रिब्यूनल (कैट) के आदेश को चुनौती दी थी।

केवीएस में प्राइमरी टीचर के तौर पर कार्यरत याचिकाकर्ता अपने स्थानांतरण में बदलाव की मांग करते हुए तर्क दिया था कि उन्हें बाइपोलर अफेक्टिव डिसआर्डर है और उन्हें लगातार मेडिकल इलाज के साथ-साथ परिवार के सहारे की भी जरूरत है।

यह भी तर्क दिया था कि अधिकारियों ने दिव्यांगता अधिनियम के तहत जरूरी उचित सुविधा मुहैया नहीं कराई। हालांकि, उनकी मांग को अदालत ने यह नोट करते हुए ठुकरा दिया कि 30 जून 2023 से लागू स्थानांतरण नीति में मेडिकल आधारों को सिर्फ कुछ खास मामलों में ही मान्यता दी गई है। इनमें 50 प्रतिशत से ज्यादा मानसिक दिव्यांगता वाली कोई दूसरी बीमारी भी शामिल है।

दिव्यांगता के संबंध में कोई दस्तावेज नहीं पेश किए

अदालत ने रिकाॅर्ड पर लिया कि याचिकाकर्ता की तरफ से बाइपोलर डिसआर्डर का इलाज होने के संबंध में चिकित्सकीय दस्तावेज पेश किए गए थे, लेकिन मानसिक दिव्यांगता के संबंध में कोई दस्तावेज नहीं पेश किए। पीठ ने कहा कि ऐसे में अधिकारियों एवं ट्रिब्यूनल का याचिकाकर्ता का मामला मेडिकल दिव्यांगता श्रेणी में नहीं आने का निष्कर्ष निकालने को मनमाना या गलत नहीं कहा जा सकता।

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