दिल्ली हाई कोर्ट ने 26 सप्ताह के गर्भ को समाप्त करने की नाबालिग को दी अनुमति, माता-पिता ने भी छोड़ा बेटी का साथ
दिल्ली हाई कोर्ट ने यौन उत्पीड़न की शिकार एक नाबालिग को 26 सप्ताह के गर्भ को समाप्त करने की अनुमति ...और पढ़ें

दिल्ली हाई कोर्ट ने यौन उत्पीड़न का शिकार नाबालिग को बड़ी राहत दी है।
HighLights
दिल्ली हाई कोर्ट ने नाबालिग को 26 सप्ताह का गर्भ गिराने की अनुमति दी।
यौन उत्पीड़न की शिकार नाबालिग को माता-पिता ने छोड़ दिया था।
कोर्ट ने नाबालिग के स्वास्थ्य जोखिमों और अधिकारों पर विचार किया।
जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट ने यौन उत्पीड़न का शिकार हुई एक ऐसी नाबालिग को अपने 26 सप्ताह के भ्रूण को समाप्त करने की अनुमति दे दी, जिसके माता-पिता ने उसे छोड़ दिया था।
16 साल की नाबालिग के मामा द्वारा याचिका पर न्यायमूर्ति मनमीत प्रीतम सिंह अरोड़ा की पीठ ने मंजूरी देते हुए कहा कि भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है और इसमें सम्मान के साथ जीने, निर्णय लेने की आजादी और प्रजनन संबंधी चुनाव का अधिकार शामिल है।
लगभग 25 सप्ताह और एक दिन की गर्भवती
कोर्ट ने नोट किया कि 2022 में माता-पिता द्वारा छोड़े जाने के बाद से वह अपने मामा और नानी की देखरेख में रह रही थी। अदालत ने लोक नायक अस्पताल को निर्देश दिया कि वह जरूरी सावधानियों, मेडिकल प्रोटोकाल और कानून द्वारा तय सुरक्षा उपायों का पालन करते हुए जल्द से जल्द गर्भावस्था खत्म करने की प्रक्रिया पूरी करे।
कोर्ट के आदेश पर गठित मेडिकल बोर्ड ने पीठ को सूचित किया कि , नाबालिग मानसिक रूप से अक्षम है और यौन उत्पीड़न या अपनी गर्भावस्था की बात को समझने में असमर्थ है। 28 सितंबर को दीन दयाल उपाध्याय अस्पताल में जांच के दौरान लगभग 25 सप्ताह और एक दिन की गर्भवती पाई गई थी।
फेफड़ों की जांच नहीं हो पा रही
इसके बाद अस्पताल में गठित मेडिकल बोर्ड ने राय दी कि गर्भावस्था को मेडिकल तरीके से खत्म करने की अनुमति दी जा सकती है। हालांकि, यह प्रक्रिया अधिक जोखिम वाली होगी।
बोर्ड ने बताया कि गर्भावस्था जारी रखने से नाबालिग के लिए अधिक जोखिम है क्योंकि वह कम उम्र में गर्भवती हुई थी। उसे रीढ़ की हड्डी में लार्डोटिक असामान्यता थी और फेफड़ों की कार्यक्षमता की जांच नहीं हो पा रही थी।
पिता की तलाश का इतजार करना सही नहीं
कोर्ट ने नोट किया कि भले ही गर्भावस्था मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट के तहत तय 24 सप्ताह के बाद भ्रूण को समाप्त करने पर कानूनी रोक है, लेकिन नाबालिग के मामले में हाई कोर्ट को अपने संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल करना चाहिए।
पीठ ने कहा कि मेडिकल बोर्ड की राय देखने से पता चलता है कि यह मामला जरूरी है और इसलिए इस पर फैसला करने के लिए नाबालिग पीड़िता के पिता की तलाश का इतजार करना सही नहीं लगता।
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