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    स्वास्थ्य मंत्री के दावे के बावजूद दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में दवाओं की भारी कमी, लोग बाहर से खरीदने को मजबूर

    Updated: Sun, 30 Nov 2025 05:30 AM (IST)

    दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में दवाओं की भारी कमी है, जिसके कारण मरीजों को बाहर से दवाएं खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। स्वास्थ्य मंत्री के दावों के विपरीत, अस्पतालों में आवश्यक दवाएं उपलब्ध नहीं हैं, जिससे मरीजों को परेशानी हो रही है। गरीब मरीजों के लिए यह समस्या और भी गंभीर है, क्योंकि वे महंगी दवाएं खरीदने में असमर्थ हैं। अस्पताल प्रशासन इस मामले पर चुप है।

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    दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में जीवन रक्षक दवाओं की भारी कमी।

    जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। स्वास्थ्य मंत्री डा. पंकज सिंह के इस दावे कि अस्पतालों में दवा की कोई कमी नहीं, के बावजूद दिल्ली सरकार के अस्पतालों में आवश्यक और जीवन-रक्षक दवाओं की भारी कमी गंभीर स्वास्थ्य संकट बनती जा रही है।

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    लाल किला विस्फोट वाले दिन अस्पताल में जब घायल लाए गए तो अस्पताल प्रबंधन को इलाज की व्यवस्था बनाए रखने के लिए परिसर स्थित जन औषधि केंद्र से दवा व सर्जिकल सामान तक उधार लाना पड़ा था। यह बताता है कि दिल्ली सरकार की सरकारी अस्पतालों में दवा व सामान की कहीं कोई कमी नहीं के दावों की जमीनी हकीकत इससे उलट है।

    गंभीर मानवीय समस्या

    दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में दवा संकट सिर्फ एक प्रशासनिक खामी नहीं, बल्कि गंभीर मानवीय समस्या बन गई है। सरकारी दावों और जमीनी हकीकत का अंतर पूरे तंत्र को कठघरे में खड़ा करती है। अस्पताल पहुंचे मरीजों का प्रश्न सीधा है, ‘जब अस्पतालों को दवा उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी है, तो फिर हमें दवा बाहर से क्यों खरीदनी पड़ रही हैं?’

    राष्ट्रीय राजधानी के बड़े सरकारी अस्पतालों में मरीजों को हृदय, मस्तिष्क, किडनी और संक्रमण से जुड़ी महत्वपूर्ण दवा नहीं मिल रही हैं। जो मिल रहीं हैं, वह भी पूरी नहीं है। इसका बड़ा कारण सेंट्रल परचेज सिस्टम की सुस्ती, टेंडर-प्रक्रिया में देरी और अस्पतालों की मांग समय पर पूरी न होना है।

    सरकारी अस्पताल का प्रबंखधन इसके लिए समय से दवा की आपूर्ति न होने को दोषी ठहराते हैं। महीनों पहले आवश्यक दवा की सूची भेजे जाने के बावजूद मांग के अनुरूप आपूर्ति नहीं हो रही। जो हो रही वह मांग से काफी कम है। सेंट्रल परचेज़ एजेंसी द्वारा समय पर टेंडर न करना, सप्लाई में लंबी देरी और अस्पतालों में स्टाक अपडेट न होने की कीमत मरीजों को चुकानी पड़ रही है।

    लोक नायक और GTB अस्पताल में संकट सबसे अधिक

    लोक नायक अस्पताल में मेरोपेनम, वैनकोमाइसिन, पाइपेरेसिलिन–टैजोबैक्टम जैसी जीवन-रक्षक एंटीबायोटिक आसानी से उपलब्ध नहीं हैं। अधिकांश मामलों में मरीजों को इन्हें बाहर से लाने को कहा जाता है, आइसीयू के चिकित्सक बताते हैं कि मरीज को बाहर से इंजेक्शन खरीदने पड़ते हैं, जबकि यह अस्पताल में निश्शुल्क मिलने चाहिए।

    जीटीबी भी कम चिंताजनक नहीं है। अस्पताल चिकिस्तकों के अनुसार हार्ट व स्ट्रोक के लिए आवश्यक क्लोपिडोग्रेल, एटोरवास्टैटिन, हिपैरिन इंजेक्शन और डायबिटीज मरीजों के लिए इंसुलिन तथा मेटफार्मिन का स्टाक बार-बार खत्म हो जाता है पर, आपूर्ति उस अनुरूप नहीं होती। चिकित्सकों के अनुसार कई बार तो स्थिति इतनी विकट हो गई कि दिल के मरीजों की दवा बंद होने होने की नौबत आ गई।

    दवाओं की कमी बनी मुसीबत

    जीबी पंत और डीडीयू अस्पताल पहुंचे मरीजों ने बताया कि तमाम मौकों पर किडनी की एरिथ्रोपोइटिन और फास्फेट-बाइंडर व न्यूरो मरीजों के लिए लेवीटिरासेटम तथा फेनोबार्बिटोन का न मिलना उनके लिए मुसीबत का सबब बना हुआ है। यही नहीं पैरासिटामोल सिरप, एमोक्सिसिलिन सिरप, कफ-सिरप और अस्थमा इलाज में जरूरी सालबुटामाल और फार्मोटेराल इन्हेलर जैसी दवा का मिलना तक मुश्किल हो जाता है।

    मरीजों और उनके तीमारदारों ने आरोप लगाया कि कुछ महत्वपूर्ण दवा जैसे लाइनजोलिड और इप्रावेंट सिरप को महत्वपूर्ण दवा सूची में शामिल ही नहीं किया गया है, जबकि इन्हें इनके जैसी दूसरी दवा को शामिल किया जाना चाहिए था। क्योंकि व्यावहारिक रूप से इनकी आवश्यकता सबसे अधिक है।

    इस मामले में दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य मंत्री से वाट्सअप पर तीन दिन पहले लिखित संदेश भेजकर इस संदर्भ में जानकारी मांगी तो उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया। प्रश्न का उत्तर देने की बजाए उन्होंने 24 घंटे में वाट्सअप मैसेज डिलीट करने का टाइमर अवश्य आन कर लिया।