'वॉल ऑफ ट्रुथ' पर दर्ज हैं सिख दंगे के खौफनाक निशान, 42 साल बाद भी दस्तावेजों के फेर में अटकी सरकारी नौकरियां
दिल्ली में 1984 के सिख विरोधी दंगों के 42 साल बाद भी पीड़ितों के जख्म हरे हैं। 2 नवंबर को ...और पढ़ें

दिल्ली में स्थित सच्चाई की दीवार। फोटो-दैनिक जागरण
HighLights
1984 सिख दंगों के 42 साल बाद भी दर्द बरकरार।
2 नवंबर को 'सच्चाई की दीवार' पर श्रद्धांजलि व न्याय की मांग।
पीड़ित परिवारों को नौकरी व पुनर्वास में अभी भी अड़चनें।
नेमिष हेमंत, नई दिल्ली। राष्ट्रपति भवन व संसद भवन से सटे ऐतिहासिक गुरुद्वारा रकाबगंज साहिब परिसर में एक रास्ता सच्चाई की दीवार पहुंचकर खत्म होती है। सामने दोनों ओर दीवारों का सिलसिला और सफेद पत्थरों पर काले अक्षरों में दर्ज हजारों नाम और चंद तस्वीरें।
तस्वीरें लूटती, जलती दुकानों, गाड़ियों, मोहल्ला और लोग, उन्मादी भीड़ और खून से सने चेहरे को है। यह ठंड ली हवा में शरीर में सिरहन पैदा करते हैं और उस खौफनाक और उन्मादी दिल्ली में ले जाते हैं, जिसकी भेंट चढ़ चुके लोग अब दीवार पर काले अक्षरों में महज एक नाम बनकर अंकित हैं।
दंगे के भेट चढ़े जवान
उसमें सेना के जवान के साथ वो लोग भी जो सिखों को बचाने में बलिदान हुए। शिव नगर के गुरदीप सिंह, शिवपुरी के होशियार सिंह, शक्तिनगर के अजैब सिंह समेत लेफ्टिनेंट कर्नल आरएस आनन्द, मेजर एसजे सिंह, कैंप्टन एसएस गिल जैसे कई नाम, जो दंगे की भेंट चढ़े।
दो नवंबर को फिर पहुंचेंगे परिवार के लोग
इस सच्चाई की दीवार को वर्ष 2017 को आकार दिया गया, जहां लोग अपनों को नम आंखों से श्रद्धांजलि देने पहुंचते हैं। दो नवंबर की शाम फिर वह मंजर होगा। तस्वीरें लगेंगी, जिसमें वह दंगा भयावह तरीके से सामने होगी। जान गंवाने वाले लोगों का परिवार जुटेगा।
बेहिसाब आंसू और सिसकियाें के बीच इंसाफ की दरकार, फिर 42 वर्ष बाद भी सवाल लिए सामने होगी। साथ में सरकारी सहायता व नौकरी का आश्वासन भी, जो पीढ़ियों से रास्ता देख रही।
प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश में दंगा
वह एक नवंबर ही था, पर वर्ष 1984। जब इतिहास ने एक ऐसा खौफनाफ और कभी न भर पाने वाले जख्म वाला मोड़ लिया, जो चार दशक बाद भी यथावत है। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के ठीक बाद दिल्ली समेत देश के कई हिस्सों में दंगा भड़का।
सरकारी आंकड़ों में दिल्ली में 2,733 लोग मारे गए थे। जबकि, संस्थाओं का दावा पांच हजार से अधिक का है। साथ ही सरेआम घरों, दुकानों और गुरुद्वारों को निशाना बनाया गया।
विधवा कॉलोनी का नाम बदलने की मांग
पिछले वर्ष पश्चिमी दिल्ली के तिलक विहार स्थित विधवा कॉलोनी का नाम बदलकर गुरु गोबिंद सिंह की मां माता गुजरी देवी के नाम पर रखा, पर दर्द यथावत है। कॉलोनी उन पीड़ित सिख परिवारों और महिलाओं के लिए बसाई गई थी जिन्होंने दंगों में अपने परिवार को खो दिया था।
यहां रहते बलवीर सिंह के परिवार में पांच लोगों की हत्या हुई थी। त्रिलोकपुरी के गुरमीत सिंह के सात लोगों ने जान गंवाई। जसप्रीत सिंह के घर में तो 21 लोगों की हत्या हुई, केवल जसप्रीत समेत दो तीन बच्चे ही बचे।
नंद नगरी में दंगे के दौरान हरबंश सिंह के घर में घुसकर पूरा परिवार साफ कर दिया था, तब 16 लोगों की हत्या हुई थी। दिल्लीभर में दंगा पीड़ितों के लिए ऐसी सात कालोनी बसी है, जहां जख्म हरे हैं।
नौकरी की मांग कर रहे पीड़ित परिवार
दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के उपाध्यक्ष व 1984 सिख नरसंहार कमेटी के चेयरमैन आत्मा सिंह लुबाना के अनुसार, न्याय के साथ पुनर्वास की मांग भी अधूरी है। पिछले वर्ष दिल्ली सरकार द्वारा 138 पीड़ित परिवार के सदस्यों को नौकरी का नियुक्ति पत्र मिला, पर दस्तावेजों के फेर में अब तक उसमें से 70 लोगों को ही नियुक्ति मिली है।
उसके बाद से अब तक 892 लोगों ने आवेदन किए हैं, जिसमें कई तकनीकी अड़चने पैदा कर दी गई है। मांग है कि उसे दूर कर सिंगल विंडो सिस्टम हो।
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