खुशहाल और आपसी भाईचारे वाले समाज का निर्माण करता है रमजान
रमजान मुबारक: फोटो: 31 डेल 501 रोजा सालाना इबादत का महीना है। इस माह में कुरान धरती पर
फरीदा खानम, चेयरमैन, सेंटर फॉर पीस एंड स्पिरिचूअलिटी इंटरनेशनल, रिटायर्ड प्रोफेसर, जामिया मिलिया इस्लामिया
रोजा सालाना इबादत का महीना है। इस माह में कुरान धरती पर उतरना शुरू हुआ था। यह माह आत्म अनुशासन का भी है। हर आदतों, व्यवस्थाओं, चरित्र और संयम को आंकने का महीना है। अगर सही तरीके से इस माह को अपने आप में उतारे और रोजा रखें तो जीवन को काफी बेहतर तरीके से जीया जा सकता है। इससे एक खुशहाल और आपसी भाई-चारे वाले समाज का निर्माण होगा।
सबसे पहले तो इसमें खाने-पीने का अनुशासन है। सुबह चार बजे से सहरी का समय शुरू होता है और देर शाम इफ्तार होता है। इस बीच कुछ नहीं खाना पीना होता है। शुरू में कुछ मुश्किलें आती हैं। बाद में दिनचर्या उसके मुताबिक ढल जाती है। इसके साथ ही पूरे माह हर बुरी चीजों से दूर रहना होता है। किसी से गलत बात नहीं करनी है। कोई बुरा बोल रहा है तो उसको गलत जवाब नहीं देना है। अपनी सारी इच्छाओं और भावनाओं पर नियंत्रण का महीना होता है। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि अगर कोई प्रयोग 30 से 40 दिनों तक किया जाए तो वह आदत में आ जाता है। अगर हम आत्म नियंत्रण के अनुशासन को सही तरीके से रमजान में अपनाएं तो जीवन जीना आसान हो जाएगा। यह व्यर्थ की भागदौड़ और विवाद खत्म हो जाएगा। धैर्य जब जीवन में आ जाएगा तब एक परिवार वाले समाज का निर्माण होगा। कुरान स्पष्ट कहता है कि कोई तुम्हारा दुश्मन नहीं है। अगर तुम्हारा कोई दोस्त नहीं है तो उससे रिश्ते प्रगाढ़ करें। आपस में सब भाई-भाई हैं।
यह कुदरत द्वारा प्रदत्त उपहारों के लिए उन्हें धन्यवाद का भी महीना है। जब हम एक निश्चित अवधि के लिए खाना-पीना छोड़ते हैं तो हमें उसका जीवन में सही मूल्य का पता चलता है तो हम इसका दुरुपयोग कम करते हैं।
यह अल्लाह से सीधे जुड़ने और खुद को आंकने का महीना होता है कि कहीं हम गलती तो नहीं कर रहे हैं। चारों तरफ आध्यात्म का माहौल होता है। दुनियावी चीजों से अलग होकर तब हम खुदा के करीब होते हैं और उनसे कहते हैं, ऐ अल्लाह तू माफ करने वाला है, माफी को पसंद करता है। मुझे माफ करना।
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