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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Oct 28, 2014 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

अहिंसा ही है सबसे बड़ा धर्म : आचार्य महाश्रमण

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Published: Tue, 28 Oct 2014 12:28 AM (IST)

जागरण संवाददाता, नई दिल्ली : किसी भी प्राणी को तन, मन, कर्म, और वाणी से नुकसान नहीं पहुंचाना चा

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जागरण संवाददाता, नई दिल्ली :

किसी भी प्राणी को तन, मन, कर्म, और वाणी से नुकसान नहीं पहुंचाना चाहिए। मन में किसी के बारे में अहित की भावना नहीं रखनी चाहिए। अहिंसा को सबसे बड़ा धर्म कहा गया है। यह बातें आचार्य महाश्रमण ने अध्यात्म साधना केंद्र छतरपुर में कहीं।

उन्होंने कहा कि भारत की गौरवशाली सास्कृतिक परंपरा को आगे बढ़ाने में अहिंसा उपयोगी है। सब जीवों के प्रति संयमपूर्ण व्यवहार अहिंसा है। उन्होंने कहा कि किसी भी जीवित प्राणी को या जंतु को न मारो, न उससे अनुचित व्यवहार करो और न ही उसे अपमानित करो। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पति ये सब अलग जीव हैं। सब जीव जीना चाहते हैं मरना कोई नहीं चाहता। उन्होंने बताया कि गत रविवार को राष्ट्रपति भवन सभागार में हुए कार्यक्रम में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा तुलसी स्मृति ग्रंथ का लोकार्पण किया गया। उन्होंने कहा कि आचार्य तुलसी बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे। उन्होंने शांतिदूत बनकर भारत के विकास में अहम योगदान दिया। उन्होंने पदयात्राओं द्वारा देश के लोगों को आत्मशुद्धि व व्यवहार शुद्धि का संदेश दिया। जाति प्रथा, पर्दा प्रथा छुआछूत जैसी कुरीतियों से समाज को छुटकारा दिलाया। वे बहुत श्रेष्ठ वक्ता थे। उन्होंने अशांत विश्व को शांति का संदेश दिया। उनकी यादों को सहेजे तुलसी स्मृति ग्रंथ समाज को आध्यात्म का प्रकाश देगा। इस ग्रंथ के दो भाग हैं प्रत्येक भाग में 800 पृष्ठ हैं। कुल 10 खंड व 11 तस्वीरें हैं। 4000 व्यक्तियों के विचार आए जिसमें से 700 व्यक्तियों के विचार लिए गए हैं। आचार्य महाश्रमण ने बताया कि वह 9 नवंबर 2014 से राजधानी में अहिंसा यात्रा प्रारंभ करने जा रहे हैं। उन्होंने लोगों से इसमें शामिल होने की अपील की।