कमर्शियल पेपर क्या होता है, जानिए
कमर्शियल पेपर मनी मार्केट का एक ऐसा प्रपत्र है, जो वचन-पत्र के तौर पर जारी किया जाता है
नई दिल्ली (हरिकिशन शर्मा)। बाजार से उधार लेने के लिए कंपनियां तरह-तरह के तरीके अपनाती हैं। यदि उन्हें लंबी अवधि के लिए उधार लेना होता है तो वे बांड जारी करती हैं, लेकिन जब थोड़े समय के लिए धनराशि की आवश्यकता पड़ती है तो कंपनियां कमर्शियल पेपर जारी कर पूंजी जुटाती हैं। इसके जरिये उन्हें बिना कुछ गिरवी रखे ही थोड़े समय के लिए उधार मिल जाता है। कमर्शियल पेपर क्या है? इसके क्या मायने हैं? ‘जागरण पाठशाला’ के इस अंक में हम यही समझने का प्रयास करेंगे।
पूंजी की जरूरत पूरी करने को कमर्शियल पेपर
कई बार ऐसा होता है कि कंपनियां किसी ग्राहक को सामान बेचती हैं या सेवा देती हैं और ग्राहक कुछ समय बाद उसका भुगतान करता है। ऐसी स्थिति में कंपनी को अपना काम चलाने के लिए पूंजी की आवश्यकता पड़ती है। इसलिए कंपनी थोड़ी अवधि के लिए पूंजी की जरूरत पूरी करने के उद्देश्य से कमर्शियल पेपर जारी कर बाजार से धनराशि उठाती हैं।
गारंटी रहित होता है यह पेपर
दरअसल कमर्शियल पेपर (वाणिज्यिक पत्र) मनी मार्केट का एक ऐसा प्रपत्र है, जो वचन-पत्र (प्रॉमिसरी नोट) के तौर पर जारी किया जाता है। यह अनसिक्योर्ड यानी गारंटी रहित होता है। इसका मतलब यह हुआ कि इसकेजरिये कंपनियों को पैसा उठाने के लिए किसी भी तरह की कोई संपत्ति गिरवी रखने की जरूरत नहीं पड़ती। कमर्शियल पेपर (सीपी) कम से कम सात दिन और अधिकतम एक साल तक के लिए जारी किया जा सकता है।
भारत में 1990 से हुई थी शुरुआत
भारत में इसकी शुरुआत 1990 में हुई थी। दरअसल, इसकी शुरुआत का मकसद उच्च रेटिंग वाली कंपनियों को अल्पावधि के लिए उधार लेने और निवेशकों को निवेश का एक अतिरिक्त जरिया प्रदान करना था। इसके बाद प्राइमरी डीलर और अखिल भारतीय वित्तीय संस्थानों (एआइएफआइ) को भी कमर्शियल पेपर जारी करने की अनुमति प्रदान कर दी गई ताकि वे भी थोड़े समय के लिए धनराशि उधार लेने को इसका इस्तेमाल कर सकें। आम लोग, बैंकिंग व अन्य कंपनियां, अनिवासी भारतीय और विदेशी संस्थागत निवेशक इसमें निवेश कर सकते हैं। हालांकि, एफआइआइ के लिए इसमें निवेश की सीमा निर्धारित है। वे कमर्शियल पेपर में उसी सीमा तक निवेश कर सकते हैं, जितना कि सेबी ने निर्धारित किया है। इस तरह बड़ी कंपनियां, प्राइमरी डीलर और वित्तीय संस्थान कमर्शियल पेपर जारी कर सकते हैं।
पर जारी करने की योग्यता
ऐसा नहीं है कि कॉरपोरेट जगत की हर कंपनी को कमर्शियल पेपर जारी करने का अधिकार हो। कोई भी कंपनी तभी कमर्शियल पेपर के जरिये उधार ले सकती है, जब उसकी टेंजिबल नेटवर्थ कम से कम चार करोड़ रुपये हो। उस कंपनी की बैलेंस शीट में भी इस निवल संपत्ति का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए। साथ ही उस कंपनी को बैंकों और वित्तीय संस्थानों से वर्किंग कैपिटल की सीमा भी मंजूर करानी जरूरी है। कंपनी जिस खाते में यह राशि उधार लेती है, उसे बैंक स्टैंडर्ड असेट के रूप में वर्गीकृत करते हैं। कंपनी को क्रिसिल और फिच जैसी रेटिंग एजेंसी से कमर्शियल पेपर जारी करने से पहले रेटिंग लेने की जरूरत भी होती है। भारत में कमर्शियल पेपर पांच लाख रुपये के मूल्यवर्ग (डिनॉमीनेशन) में जारी किया जाता है।
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