नई दिल्ली (बिजनेस डेस्क)। अमेरिका सहित कई देशों की संरक्षणवादी नीतियों के चलते प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के मध्य व्यापार युद्ध (ट्रेड वार) की स्थिति बन गई है। विभिन्न देश मुक्त व्यापार की राह में बाधाएं खड़ी करने लगे हैं। अंतरराष्ट्रीय व्यापार व्यवस्था को उदार बनाने के लिए स्थापित हुए विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) को अभूतपूर्व चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इसमें सुधार की मांग भी उठने लगी है।

बाहरी मोर्चे पर तेजी से बदल रहे घटनाक्रमों के मद्देनजर ‘दैनिक जागरण’ अंतरराष्ट्रीय व्यापार से संबंधित जटिल शब्दावली और अवधारणाओं को सरल रूप में प्रस्तुत करने जा रहा है। इसकी शुरुआत हम डब्ल्यूटीओ से कर रहे हैं। डब्ल्यूटीओ क्या है? यह कैसे काम करता है? इसमें सुधार की मांग क्यों उठ रही है? ‘जागरण पाठशाला’ के इस अंक में हम यही समझने की कोशिश करेंगे।

विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) एक बहुपक्षीय संस्था है जो अंतरराष्ट्रीय व्यापार का नियमन करती है। इसकी स्थापना पहली जनवरी 1995 को हुई और इसका मुख्यालय स्विटजरलैंड के जेनेवा शहर में है। फिलहाल 164 देश इसके सदस्य हैं। भारत शुरू से ही डब्ल्यूटीओ का सदस्य रहा है। आज विश्व का 98 फीसद व्यापार डब्ल्यूटीओ के दायरे में होता है। 2017 में पूरी दुनिया में 17.43 ट्रिलियन डॉलर (एक ट्रिलियन यानी एक लाख करोड़) मूल्य की वस्तुओं का व्यापार हुआ। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि डब्ल्यूटीओ कितना अहम संगठन है।

डब्ल्यूटीओ नया संगठन है लेकिन इसका इतिहास पुराना है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका और ब्रिटेन ने ब्रेटनवुड्स सम्मेलन कर विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की स्थापना की तो इसके एक साल बाद संयुक्त राष्ट्र ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार संगठन (आइटीओ) का विचार दिया। हवाना घोषणापत्र में इस पर सहमति भी बनी लेकिन विचार फलीभूत नहीं हो सका। आखिरकार 23 देशों ने मिलकर जनरल एग्रीमेंट ऑन टैरिफ एंड ट्रेड (गैट) पर हस्ताक्षर किए। इस तरह विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद 1948 से विभिन्न देशों के बीच व्यापारिक वार्ताओं का केंद्र गैट बन गया। गैट के तत्वावधान में कई दौर की व्यापारिक वार्ताएं चलीं। अंतत: गैट के अंतिम और सबसे बड़े दौर की वार्ता के बाद डब्ल्यूटीओ का जन्म हुआ। इस वार्ता को उरुग्वे राउंड (1986 से 1994) के तौर पर जाना जाता है। गैट और डब्ल्यूटीओ में फर्क यह है कि गैट मुख्यत: वस्तुओं के कारोबार का नियमन करता था जबकि डब्ल्यूटीओ वस्तुओं और सेवाओं के कारोबार के साथ बौद्धिक संपदा (इंटलेक्चुअल प्रॉपर्टी) जैसे आविष्कार, रचनाएं और डिजाइन के व्यापार का भी नियमन करता है।

डब्ल्यूटीओ का मकसद संरक्षणवाद (प्रोटेक्शनिज्म) को खत्म कर भेदभावरहित, पारदर्शी और मुक्त व्यापार व्यवस्था बनाना था ताकि सभी देश एक-दूसरे के साथ बिना किसी बाधा (अत्यधिक टैरिफ या प्रतिबंध) के व्यापार कर सकें। साथ ही व्यापारिक विवादों को हल करने में भी इसे भूमिका निभानी थी। डब्ल्यूटीओ की कार्यप्रणाली संयुक्त राष्ट्र की तुलना में अधिक लोकतांत्रिक है। संयुक्त राष्ट्र में जहां पांच स्थायी सदस्यों को वीटो पावर (विशेष शक्तियां) प्राप्त है, वहीं डब्ल्यूटीओ में किसी भी राष्ट्र को विशेषाधिकार प्राप्त नहीं है। सबके मत बराबर हैं। डब्ल्यूटीओ के सदस्य देशों की हर दो साल पर मंत्रिस्तरीय बैठक होती है जिसमें आम राय से फैसले होते हैं। अब तक 11 बैठकें हो चुकी हैं। अगली बैठक कजाखस्तान के अस्ताना में 2020 में होगी।

डब्ल्यूटीओ काफी हद तक अपना मकसद पूरा करने में सफल रहा है। लेकिन हाल के वर्षों में कई देशों में आयात पर शुल्क बढ़ाकर संरक्षणवादी नीतियां अपनाई गई हैं जो डब्ल्यूटीओ की भावना के विरुद्ध हैं। यही वजह है कि अब इसमें सुधार की मांग जोर पकड़ने लगी है। असल में संरक्षणवाद हमेशा भारी पड़ता है। इससे लोगों का रहन-सहन महंगा हो जाता है। उदाहरण के लिए दक्षिण कोरिया में संरक्षणवादी नीतियों के चलते आयातित कार 43 फीसद महंगी हो जाती है। जब संरक्षणवादी नीतियां खत्म होती हैं और मुक्त व्यापार के रास्ते खुलते हैं तब लोगों की आय बढ़ती है। डब्ल्यूटीओ का अनुमान है कि व्यापार खुलने से अमेरिका में 1945 से 2012 के बीच प्रति परिवार आय सालाना 9000 डॉलर बढ़ गई।

Posted By: Surbhi Jain

डाउनलोड करें जागरण एप और न्यूज़ जगत की सभी खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस