खबरों से रूबरू रहने वाले सभी लोग पिछले महीने अमेरिकी सरकार का कामकाज बंद होने की घटना से वाकिफ होंगे। साथ ही, उन्हें यह भी पता होगा कि इस बंदी में ओबामाकेयर के नाम से मशहूर हुए स्वास्थ्य बीमा सुधारों की अहम भूमिका रही है। विकसित देशों में स्वास्थ्य सेवाएं सबसे ज्यादा अमेरिका में ही महंगी हैं। स्वास्थ सेवाओं की सबसे खराब गुणवत्ता भी अमेरिका में ही है। साथ ही, यहां के स्वास्थ्य बीमा तंत्र का रवैया उपभोक्ताओं से दुश्मनी निकालने वाला है। यह बात केवल बिजनेस अखबारों के पाठक ही नहीं, बाकी लोग भी जानते हैं। ब्रेकिंग बैड (अमेरिकी अपराध धारावाहिक) का हर प्रशंसक जानता है कि कैसे अमेरिका के हाई स्कूल की केमिस्ट्री टीचर को जब कैंसर होता है तो उसे कीमोथैरेपी के खर्च के लिए नशीले पदार्थ बनाने का काम शुरू करना पड़ता है और कैसे वह एक बड़ी ड्रग डीलर बनती है।

भारत में लोगों को ऐसा करने की जरूरत नहीं पड़ती। हमारे आसपास हमेशा केंद्र या राज्य सरकारों द्वारा उपलब्ध कराई जाने वाली मुफ्त स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध होती हैं। अब देश में ऐसा स्वास्थ्य तंत्र विकसित हो चुका है, जिसमें हर स्तर पर उच्च गुणवत्ता की चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकती हैं। फिर चाहे वह गावों के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हों या पूरे देश में मौजूद स्पेशलिटी हॉस्पिटल। क्या अमेरिका में ऐसा किया जा सकता है? नहीं। लेकिन स्वास्थ्य सेवाओं की लागत और हेल्थ बीमा को लेकर चिंता लगभग सभी अमीर भारतीयों में तेजी से बढ़ रही है। सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं मूल रूप से मौजूदा और सेवानिवृत्त कर्मचारियों पर केंद्रित हैं। निजी स्वास्थ्य सेवाओं की न सिर्फ गुणवत्ता संदिग्ध है, बल्कि ये इतनी महंगी हैं कि यदि परिवार का कोई एक सदस्य गंभीर बीमारी से पीड़ित हो जाए तो कई लोग आसानी से दीवालिया हो जाते हैं। इनमें ऐसे लोग भी शामिल होते हैं जिनके पास औसत राशि का स्वास्थ्य बीमा होता है।

जिस रफ्तार से इन सेवाओं की कीमतें बढ़ रही है, उससे जल्दी ही भारत में भी स्वास्थ्य लागत और हेल्थ इंश्योरेंस अमेरिका की तरह ही बड़ा वित्तीय मसला बन सकता है। फिलहाल कोई इस क्षेत्र के वास्तविक महंगाई सूचकांक की गणना नहीं कर रहा, लेकिन इसके पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध हैं कि कई अस्पतालों में इलाज खर्च दस साल पहले की तुलना में कम से कम पांच गुना बढ़ चुका है। देश में मेडिकल केयर जल्दी ही एक बड़ा वित्तीय मुद्दा बनने वाला है। यही स्थिति इन सुविधाओं की गुणवत्ता को लेकर भी है। यदि आप आज किसी भी अस्पताल में लोगों से बात करें (जैसा कि हाल ही में मैंने किया) तो पाएंगे कि तनाव का सबसे बड़ा कारण बीमारी नहीं, बल्कि बीमा कवर की रकम बेहद कम पड़ना है।

यह निश्चित रूप से फाइनेंशियल प्लानिंग की कमी है। इससे साफ है कि बचत करने वालों और पर्सनल फाइनेंस सलाहकारों को स्वास्थ्य बीमा पर उससे ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है, जितना अभी वे दे रहे हैं। हालांकि इस मामले में नियमन से जुड़े मसले पर भी उतना ही ध्यान देने की दरकार है। मसला यह है कि अस्पतालों मे ओवरचार्जिग और बीमा कंपनियों में कवरेज से बाहर करने व सीमित करने की बीमारी बढ़ रही है। वर्ष 1990 के बाद से अमेरिका में स्वास्थ्य बीमा कारोबार उचित दरें निर्धारित करने के बजाय कवरेज से बचने के तरीकों पर केंद्रित हो गया है। अब ज्यादा से ज्यादा लोगों को बीमा कवर देने के बजाय कम से कम लोगों को कवर करने पर जोर बढ़ गया है। यानी केवल स्वस्थ लोगों को बीमा पॉलिसियां बेचो और मुनाफा बढ़ाओ। ये कार्यशैली भारत में भी खासी पैठ बना चुकी है। इस समस्या के दो समाधान हैं। एक तो ओबामाकेयर, जिसमें कहा गया है कि हेल्थकेयर और स्वास्थ्य बीमा को निजी व मुनाफा-केंद्रित कारोबार बनाए रखते हुए नियमों, लागत तथा कवरेज से इन्कार की समस्याओें पर ध्यान दिया जाएगा। दूसरी तरह का समाधान उन सभी देशों में लागू किया जा रहा है जहां स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर हैं। इसके तहत माना गया है कि चिकित्सा क्षेत्र बाजार की दक्षता बनाए रखने के लिए एक अपवाद है। यह ऐसा क्षेत्र है जहां ग्राहक जानकारी या तार्किक आधार पर विकल्प का चयन करने की स्थिति में नहीं होता। इसलिए इस क्षेत्र में केवल समाजवादी समाधान लागू हो सकता है। भारत में भी यही सिद्धांत लागू रहना चाहिए, अन्यथा बड़ी संख्या में भारतीयों को चिकित्सा खर्च से जुड़ी वित्तीय आपदा का शिकार बनना पड़ेगा। महज चंद लोग ही यह खर्च वहन कर पाएंगे।

फंड का फंडा: धीरेंद्र कुमार

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