'Vicco टर्मरिक नहीं कॉस्मेटिक...' सिर्फ जिंगल नहीं, इससे जुड़ी है 31 साल तक चली कानूनी लड़ाई की कहानी; सरकार को दी मात
Vicco ने दशकों तक अपने उत्पादों को आयुर्वेदिक दवा या कॉस्मेटिक मानने को लेकर सरकारी विभागों से कानूनी लड़ाई लड़ी। ...और पढ़ें

विको की सरकार से कानूनी लड़ाई कई दशकों तक चली (AI फोटो)
HighLights
Vicco ने उत्पादों की आयुर्वेदिक पहचान के लिए दशकों संघर्ष किया
सरकारी विभागों से टैक्स और वर्गीकरण पर लंबी लड़ाई चली
सुप्रीम कोर्ट तक अदालतों ने Vicco के पक्ष में फैसले दिए
बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली। भारत में Vicco की पहचान सिर्फ आयुर्वेदिक उत्पाद बनाने वाली कंपनी की नहीं रही, बल्कि इसकी कानूनी लड़ाइयों का इतिहास भी खासा लंबा है। खास तौर पर Vicco Vajradanti और Vicco Turmeric को लेकर कंपनी और सरकारी विभागों के बीच कई दशकों तक यह सवाल अदालतों में घूमता रहा कि इन्हें आयुर्वेदिक दवा माना जाए या कॉस्मेटिक।
मामला 1970 के दशक में शुरू हुआ और अलग-अलग नोटिस, टैक्स विवाद, अपील और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। कई मौकों पर अदालतों ने Vicco के पक्ष में फैसला दिया और विभागों को पहले से तय मुद्दे को दोबारा खोलने से रोका। आज जानिए कैसा रहा इसका इतिहास।
1976 में सरकार ने कहा - ये दवाएं नहीं, कॉस्मेटिक्स हैं
कहानी की शुरुआत 8 नवंबर 1976 के शो-कॉज नोटिस से हुई। केंद्रीय उत्पाद शुल्क अधिकारियों ने Vicco से पूछा कि Vicco Vajradanti और Vicco Turmeric को आयुर्वेदिक दवा की जगह कॉस्मेटिक क्यों न माना जाए? विभाग ने 4 जून 1977 को इन्हें कॉस्मेटिक्स के रूप में क्लासिफाई कर दिया।
Vicco ने इसका विरोध किया और 1978 में ठाणे के सिविल जज के सामने अपना पक्ष रखा। कंपनी ने अपने उत्पादों को आयुर्वेदिक औषधीय वस्तु बताते हुए कहा कि उनकी प्रकृति और इस्तेमाल केवल सौंदर्य प्रसाधन जैसी नहीं है।
1982 में पहला बड़ा फैसला और फिर हाईकोर्ट की मुहर
6 मई 1982 को ठाणे की अदालत ने Vicco के पक्ष में फैसला दिया। अदालत ने माना कि Vicco Vajradanti और Vicco Turmeric आयुर्वेदिक औषधीय वस्तु हैं और उन्हें उस समय लागू एक्साइज टैरिफ के तहत सामान्य टूथपेस्ट, टूथपाउडर या कॉस्मेटिक की तरह नहीं देखा जा सकता।
सरकार ने इस फैसले को बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी। 27 अप्रैल 1988 को हाईकोर्ट ने ठाणे की अदालत के फैसले को बरकरार रखा कि उत्पादों को कॉस्मेटिक्स के रूप में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और सरकार की SLP 6 सितंबर 1990 को वहां भी खारिज हो गई।
1986-1993 के दौरान कानून बदला, लेकिन विवाद फिर शुरू हुआ
इसके बाद मामला खत्म नहीं हुआ। 1986 में Central Excise Tariff Act लागू हुआ और Vicco ने अपने उत्पादों को Chapter 30 के तहत वर्गीकृत करने की मांग की, जिसे शुरुआती स्तर पर स्वीकार भी किया गया। लेकिन 3 जुलाई 1987 को फिर शो-कॉज नोटिस जारी हुआ और उत्पादों को Chapter 33 यानी कॉस्मेटिक्स में रखने की कोशिश की गई।
यह नोटिस बाद में वापस ले लिया गया। फिर 1996 में विभागीय नीति बदलने के बाद 1997 में तीन नए शो-कॉज नोटिस जारी हुए। Vicco ने तर्क दिया कि जिस मुद्दे पर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट फैसला दे चुके हैं, उसे बार-बार नए नाम से नहीं खोला जा सकता।
1993 में सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही में भी आयुर्वेदिक वर्गीकरण को लेकर पिछला फैसला कायम रहा, हालांकि रिफंड का सवाल कानून की शर्तों से जोड़ा गया।
1991-1994 के दौरान मुंबई में ऑक्ट्रॉय का अलग विवाद
इसी दौर में एक दूसरा टैक्स विवाद भी सामने आया। मुंबई में Vicco के उत्पादों पर 30 अप्रैल 1979 से ऑक्ट्रॉय लगाया जा रहा था। कंपनी ने इसे चुनौती देते हुए कहा कि उसके उत्पाद आयुर्वेदिक औषधीय वस्तु हैं और उन्हें ऐसे सामान की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता जिस पर संबंधित ऑक्ट्रॉय लगाया जाए।
22 फरवरी 1991 को बॉम्बे हाई कोर्ट ने मामले में Vicco के पक्ष में महत्वपूर्ण फैसला दिया और कहा कि उत्पादों में औषधीय गुण होना उनके नेचर के आकलन में महत्वपूर्ण है। बाद की कार्यवाही में भी ऑक्ट्रॉय वर्गीकरण का यह विवाद अदालतों तक चलता रहा।
2001-2004 के दौरान फिर वही सवाल - क्या पुराने फैसले को दोबारा खोला जा सकता है?
2001 में एक बार फिर उत्पादों के वर्गीकरण को लेकर विभागीय कार्रवाई हुई। 14 मई 2001 को Vicco के उत्पादों को कॉस्मेटिक्स बताने वाला आदेश आया। Vicco ने अपील की और 10 जनवरी 2002 को Commissioner (Appeals) ने कंपनी के पक्ष में फैसला दिया।
विभाग CEGAT पहुंचा, लेकिन 3 फरवरी 2003 को वहां भी उसे सफलता नहीं मिली। इसके बाद सरकार फिर से सुप्रीम कोर्ट गई। 7 दिसंबर 2004 को सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की अपीलें खारिज कर दीं। यानी लगातार कई स्तरों पर अदालतों ने यह माना कि विभाग के लिए पहले से तय वर्गीकरण को आसानी से दोबारा खोलना उचित नहीं था।
2005-2007 के दौरान आखिरी बड़ी लड़ाई और सुप्रीम कोर्ट का संदेश
फिर 29 अप्रैल 2005 को फिर एक शो-कॉज नोटिस जारी हुआ, जिसे Vicco ने बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी और कहा कि सरकार पहले से तय मुद्दे को फिर से मुकदमेबाजी में ला रही है। हाईकोर्ट ने Vicco के पक्ष में फैसला दिया। सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची, लेकिन 26 नवंबर 2007 को सुप्रीम कोर्ट ने भी Vicco के पक्ष में फैसला बरकरार रखा।
अदालत के सामने मुख्य सवाल यही था कि क्या इतने पुराने और पहले से तय विवाद को बार-बार नए सिरे से खोला जा सकता है। इस लंबे घटनाक्रम ने Vicco की कानूनी रणनीति की एक खास बात सामने रखी - कंपनी ने उत्पादों की संरचना, उनके आयुर्वेदिक स्वरूप, उपयोग और पहले के न्यायिक फैसलों को लगातार आधार बनाया।
इसीलिए Vicco की यह कहानी सिर्फ एक कंपनी की टैक्स लड़ाई नहीं, बल्कि एक ही उत्पाद की कानूनी पहचान तय करने के लिए लगभग तीन दशकों तक चली मुकदमेबाजी की मिसाल बन गई।
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